आर्यसमाज के इंद्रमणि

नमस्ते,

कुछ दिन पूर्व से कुछ नीच कोटि के लोग मेरे प्रति दुर्भावना युक्त शब्दों का प्रयोग करके अपने को बहुत बड़ा शोधकर्ता सिद्ध करने की बात कर रहे थे । मेरे साथियों से ऐसा धर्म की हानि का नंगा नाच देखा नहीं गया और उन कथित शोधकर्ताओं को खुली चुनौती भेज दी गयी । उन्होंने हमारा पता पूछ लिया और संपर्क भी ले लिया किन्तु कुछ समय पश्चात् पोस्ट डालकर हमसे चतुरतापूर्वक क्षमा मांग ली । फिर हमने कहा कि आप नहीं आ रहे तो हमें अपना पता बताइए किन्तु उन महाशय ने कुछ कुछ बहाने बनाने प्रारंभ कर दिए । वास्तव में, उनको पता था कि जो ब्लॉग उन्होंने 2015 में डाला था उसको प्रमाणित नहीं किया जा सकता है । इसी लिए बात को दबाने में लग गये किन्तु हमने कभी झूठ, प्रपंच तथा चालाकी का सहारा नहीं लिया और बात दबाने के स्थान पर बात बढ़ाने पर जोर दिया ताकि सत्य आर्यों तक पहुँच सके । इन लोगों ने बहुत दुष्प्रचार किया है कि राहुल आर्य की वीडियो इनके दूषित लेख के आधार पर बनी है । दुर्भाग्य है कि इस लेख के शोधकर्ता के कुछ चेले सीना तानकर कह रहे थे कि यह लेख शोधपूर्ण है तथा इसमें कोई त्रुटी नहीं है ।  कमेंटों में हमारे कुछ आर्यों ने उनके लेख की गलतियों की जानकारी भी दे दी गयी थी और चुनौती भी । अब हमसे जानकारी मिलते ही चतुरतापूर्वक सामने आने के स्थान पर उसने एक पोस्ट डालकर कंप्यूटर की त्रुटी कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया है । अब यदि उस पुस्तक का प्रमाण किसी अन्य लेख के लिए था तो भी उसकी पृष्ठ संख्या किसी अन्य लेख में (उस समय का इनका कोई दूसरा लेख होना चाहिए जो ये प्रमाण लिए हुए हो) भी गलत ही होगी । अभी भी सत्य स्वीकार नहीं कर रहे हैं । कोरी नेल्सन की बात पर तो बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया क्योंकि उनका लेख इनके लेख के लगभग 1 वर्ष बाद का है अर्थात कोरी नेल्सन ने तथाकथित शोधकर्ता के भ्रष्ट लेख से कॉपीपेस्ट कर लिया।

वैसे मुझे तो इन स्वघोषित लोगों पर दया आ रही है । इन सबके हाथ पैर फूल गए हैं । बुद्धि सुन पड़ गयी है । अन्यथा कोरी नेल्सन को कोरी निकोल्सन नहीं लिखते । एक स्थान पर कोरी निकल्सन लिख रहे हैं । इनके चेलों ने अब भी ध्यान नहीं दिया और कॉमेंट में लग गए वाह जी करने कि आपने तो बहुत अच्छी शोध करके अपने नए प्रमाण दे दिए । जिनको लेखक का भी नाम ना पता हो वो क्या प्रमाण देंगे । लगता है विद्वानों, सज्जनों और सरल हृदय वाले मनुष्यों को अपशब्द बोलते बोलते इन सबकी बुद्धि बिक चुकी है । अब नीचे स्वयं पढ़ लीजिए इनकी नई शोध जो 5 साल बाद हुई है ।

ये पंक्तियां कोरी नेल्सन के लेख में 2016 से इंटरनेट पर है किन्तु वहां पर अंतिम पंक्ति में urban के स्थान पर some शब्द का प्रयोग होने से इनका 5 साल में शोध करने वाला नया प्रमाण भी गलत सिद्ध हुआ । क्या पता ये सब भी कम्प्यूटर ने ही किया हो ! शोधकर्ता ने कहा था कि शोध करने में आंखे बाहर आ जाती है किंतु यहां तो बुद्धि भी बाहर घास चरने चली गयी लगता है । आप भी पढ़ सकते हैैं ।

https://www.google.com/amp/s/nonpareilonline.com/news/local/history/the-dodge-connection-graveyard-symbolism/article_5f6bcc57-fa11-5f2f-a56f-be0f600977e3.amp.html

वास्तव में, यदि कहीं कोई त्रुटी है तो उसको दबाने के स्थान पर बाहर निकालना चाहिए किन्तु ये लोग क्षमा मांगकर मामले को दबाना चाहते थे क्योंकि इनका 5 साल पुराना ब्लॉग अप्रमाणिक सिद्ध हो जाता ।

खुली चुनौती देकर और कमेंट में इसके लेख को कॉपीपेस्ट कहके तथा फोन करके इसकी गलती बताकर हमने इनको दोबारा सोचने पर विवश कर दिया और आर्यों के समक्ष है कि शोधकर्ता चतुरता से कंप्यूटर की त्रुटी बता रहे हैं ।

वास्तव में मेरे प्रति इन चंद लोगों के दुर्भावनापूर्ण प्रचार का ये अंत होगा इन्होंने कभी सोचा नहीं होगा । हमने करोड़ों लोगों तक वैदिक धर्म तथा आर्यसमाज को पहुँचाया है । जब कोई व्यक्ति सफल नहीं होता तो वह या तो दूसरे की सफलता पर अपना अधिकार ज़माने का प्रयास करता है अथवा दूसरे को मूर्ख सिद्ध करके अपने को महान सिद्ध करने का प्रयत्न करता है । जिस लेख की चर्चा यहाँ हो रही है वह लेख शवदाह से सम्बंधित है तथा मेरी वीडियो भी उसी से सम्बंधित है । इन्होंने कहा कि वीडियो इनके लेख के आधार पर बनी है । अतः वीडियो की समीक्षा प्रारभ करते हैं ।

वीडियो में मैंने सर्वप्रथम International cremation statistics के आंकड़े उसी वेबसाइट (https://www.cremation.org.uk/statistics#International) के प्रमाण देकर दिए हैं । मेरे आंकड़े 2015 तथा 2016 के थे जबकि वीडियो 2018 में बनी थी । अब इन लोगों ने दुष्प्रचार किया कि राहुल आर्य ने 2018 के आंकड़े क्यों नहीं दिए । अब इनको कौन समझाये कि जो वर्ष चल रहा है उसके आंकड़े नहीं मिलते हैं । वास्तव में, इस वेबसाइट पर 2018 में 2016 के ही नवीनतम आंकड़े थे । 2017 के आंकड़े भी वहां उपलब्ध नहीं थे । उदाहरण स्वरुप आप में से कोई भी https://www.cremation.org.uk/statistics#International इस link को खोलेगा तो अब 2020 में आपको 2018 के ही latest आंकड़े मिलेंगे, जबकि 2019 समाप्त हो चुका है ।

अतः जो भी बुद्धिमान है वह समझ गया होगा कि वीडियो में वेबसाइट के प्रमाण सहित सत्य आंकड़े दिए गये हैं ।

  • अब कुछ स्वघोषित बड़े विद्वानों ने कमेंट किये थे कि वीडियो में दिए आंकड़े उनके 2015 के लेख से लिए गये हैं । अब इनके लेख के आंकड़ों को देख लेते हैं । यह लेख 2015 में लिखा गया और आंकड़े 2008 के दिए गये । क्यों ? सामान्य बुद्धि की बात है कि इन्होंने कहीं से कोई पुराना लेख अथवा आंकड़ा उठा लिया था । इतना ही नहीं 2008 के Internation cremation statistics का आधार बताते हुए इन्होंने भारत में 85% दाह होने की बात लिख दी जबकि वेबसाइट पर 2008 के आंकड़े में भारत का स्थान खाली छोड़ा गया है जो आप https://www.cremation.org.uk/rearrange-by-deaths-2008 पर जाकर देख सकते हो । कहीं पर किसी वर्ष का आंकड़ा, कहीं पर किसी वर्ष का आंकड़ा देकर इनके लेख से स्पष्ट पता चलता है कि इन्होंने लेख लिखते समय वेबसाइट देखी भी नहीं थी । 7 साल पुराने आंकड़े देने वाले कैसे दूसरों पर झूठ बोलते हैं ये आप स्वयं नीचे देख सकते हैं ।

 

इन सभी ने ये भी कहा था कि मैंने भी वीडियो में 2008 के आंकड़े दिए हैं ये बात पूर्णतः 100% असत्य है ये आप जान गये होंगे क्योंकि हमने नवीनतम 2016 के (https://www.cremation.org.uk/international-statistics-2016) आंकड़े दिए थे जो आप वीडियो में देख सकते हैं । वीडियो में दिए आंकड़े कहीं से भी इनके आंकड़ों से नहीं मिलते हैं । इन्होंने 2008 में जापान में 99.85% शवदाह का आंकड़ा दिया जबकि मैंने 2015 में 99.97% का आंकड़ा दिया । बिना वीडियो देखें इनमें से एक ने ऊपर लिखा है कि जापान के आंकड़े इनसे मिलते हैं । अब क्या ये और इनके समर्थक हमसे क्षमा मांगने का साहस दिखाएंगे । वहीं 2016 के जापान के आंकड़े हमने 99.98% दिए हैं । कोई भी आंकड़ा कहीं मिलता ही नहीं लेकिन कॉमेंट में लोगों को बहकाने हेतु सरेआम झूठा प्रचार करने वाले अत्यंत ही दुष्ट प्रवृत्ति के होंगे । हमने भारत का तो आंकड़ा दिया ही नहीं, जबकि इन्होंने ये भी झूठ बोला । इन्होंने 3 देशों के आंकड़े दिए हैं वहीं हमने अनेक देशों के नाम तथा पूरी लिस्ट डाली है । पता नहीं कैसे सार्वजनिक मंच पर ऐसी बातों का प्रचार कर देते हैं जिन बातों का कोई सिर पैर ही नहीं है । हाँ, स्मरण रखें ये आंकड़े ना मेरे घर बने हैं और ना ही किसी तथाकथित स्वघोषित विद्वान के घर, अतः इनपर किसी का एकाधिकार नहीं और लाखों लोग इन आकड़ों से प्रतिवर्ष नवीनतम सन्दर्भ देते रहते हैं ।

अब बात करते हैं उस पुस्तक की जिसको पढ़ने में तथाकथित स्वघोषित विद्वान को 2 वर्ष लग गये थे ।

वह पुस्तक “The incorruptibles : a study of the incorruption of the bodies of various Catholic saints and beati” है । इसके लेखक Joan Carroll Cruz हैं । इस स्वघोषित विद्वान ने अपने 2 वर्ष तक किये शोध में पता लगाया कि इस पुस्तक के 362 पृष्ठ पर शवदाह से सम्बंधित “The sheer stench from decomposing corpses, even when buried deeply, was over overpowering in areas adjacent to the urban cemetery” ये लाइने लिखी हुई हैं । हम पहले ही दिन ये जान गये थे कि यह पृष्ठ संख्या पूर्णतः असत्य है और हमने इनको खुली चुनौती दे दी थी किन्तु इन्होंने भावनात्मक खेल रचना प्रारंभ करके ना आने के लिए कह दिया था अर्थात् ये बात को दबाने में जुट गये थे । वास्तव में, इस पुस्तक में यह पृष्ठ संख्या है ही नहीं ।

चुनौती के बाद मामला दबाने का प्रयास किया गया, और अपनी पुरानी पोस्ट delete करने की बात की गई । कानूनी कार्यवाही तो तब हो जब इस भ्रष्ट लेख का कोई पेटेंट हो । अभी भी झूठ बोल रहे हैं । एक कल पैदा हुआ छोकरा तो कह रहा था कि राहुल आर्य के घर नोटिस भेजेंगे । अबे, पहले अच्छे से पैदा तो हो ले । इनको ना तो देश के नियम पता हैं और ना ही व्यवहारिक नियम पता है कि समाज में मनुष्यों की भांति रहा कैसे जाता है ।

फिर अपनी माता जी के बीमार होने की बात की । इनके पिताजी का देहावसान तो बहुत पहले हो चुका है किंतु कॉमेंट में ऐसे लिखा जैसे यह आज ही की बात हो । अरे, पिताजी तो कुछ समय पूर्व हमारे भी चल बसे और मां तथा दादी तो मेरी भी अस्वस्थ है, घर पर संभालने वाला भी मैं ही हूँ, कहीं स्वतंत्र होकर घूम भी नहीं सकता, परिवार पर भी मेरे कारण अधर्मियों तथा दुष्टों का खतरा है तो क्या? इतने ही बड़े धर्म प्रचारक हो ? लेखराम की बात करने वालों उन्होंने तो अपने पुत्र का भी बलिदान कर दिया था प्रचार के लिए । ना आये और ना हमें बुलाया । यह भावनात्मक खेल आर्यसमाज में खेलने वाले कायर और वीर्यहीन ना जाने कहाँ से आने लग गए ।

अब आते हैं मेरी वीडियो के विषय पर । सभी जानते हैं कि ईसाईयों पर बहुत कार्य किया है । ईसाईयों में एक प्रथा है Incorruptibility अर्थात् कुछ संतों तथा पादरियों के शरीर चमत्कार के कारण दबाने के बाद भी खराब नहीं होते ऐसी मान्यता वाली यह प्रथा है । कोई भी व्यक्ति गूगल पर Incorruptibility books लिखेगा तो Joan Carroll Cruz की पुस्तक अत्यंत प्रसिद्ध होने के कारण कई अन्य पुस्तकों के साथ ऊपर आती है । मैंने वीडियो में कहा कि यह पुस्तक शवदाह के क्षेत्र में शोध करने वाले अवश्य पढ़ें । यह नहीं कहा कि मैंने यह पुस्तक पढ़ी है । प्रतिदिन एक विषय की वीडियो सबकुछ पढ़कर नहीं बनाई जाती है यह सब जानते हैं और मैं तो सदैव अपनी लाइव में स्वीकारता ही हूँ कि मेरा उद्देश्य केवल सिद्धांतों की स्थापना करना है । यहाँ एक बात और महत्वपूर्ण है कि मैंने इस पुस्तक की कोई पृष्ठ संख्या भी नहीं दी है । जो लोग आरोप लगा रहे थे उनको यह बात कहने में लज्जा आ रही थी क्या ?

अब जो पंक्तियाँ वीडियो में दी गयी (The sheer stench from decomposing corpses…) उनका विवरण देता हूँ । ये पंक्तियाँ wikipedia पर भी उपलब्ध हैं तथा वहां पर footnote में एक पुस्तक का विवरण दिया गया है । पुस्तक है Exploring everyday landscapes 1997, p. 131–132. मैं कोई भी वीडियो बनाता हूँ तो उनमें आधिकारिक वेबसाइट, wikipedia तथा प्रचलित सूचना वाली विश्व स्तरीय संस्थाओं तथा संबंधित व्यक्तियों आदि से ही बातें लेता हूँ । ये कोई ऐसा ज्ञान नहीं है जो आत्मा में प्रकाशित हो । वीडियो में मैंने शवदाह के क्षेत्र में शोध हेतु Joan Carroll Cruz की पुस्तक पढ़ने की बात कही थी । उसके बाद मैंने कहा था कि यह पुस्तक 1997 में प्रकाशित हुए और ये पंक्तियाँ इस पुस्तक से सिद्ध होती हैं । वास्तव में 1997 में Exploring everyday landscapes प्रकाशित हुई थी और मुझे इसी पुस्तक का नाम बोलना था किन्तु वो प्रवाह में छुट गया । आर्यों को यह एकदम नई जानकारी मिल रही है क्योंकि इस Exploring everyday landscapes 1997, p. 131–132) पुस्तक के विषय में किसी ने अब तक एक शब्द नहीं कहा है । अतः (The sheer stench from decomposing corpses…) ये पंक्तियाँ wikipedia तथा कुछ अन्य स्थानों पर वर्षों से प्रचारित है किन्तु इनका मूल आधार किसी ने कहीं नहीं बताया है । अतः ध्यान पूर्वक पढ़े कि इन पंक्तियों का मूल आधार Exploring everyday landscapes 1997, p. 131–132) पुस्तक तथा सम्बंधित पृष्ठ हैं । इन पंक्तियों में urban cemetery के विषय में जो बात की गयी है वह ऊपर बताई हुई पुस्तक में निर्देशित पृष्ठों पर urban cemetery के विषय में अत्यंत विस्तार से लिखी गयी हैं । ये शब्द ज्यों के त्यों पुस्तक में कहीं नहीं हैं किन्तु इन शब्दों का पूरा का पूरा आधार इस पुस्तक के सम्बंधित पृष्ठ (urban cemetery p.131–132) से ही है जो wikipedia में दिया गया है । अब इस पुस्तक का गहरा नाता Joan Carroll Cruz की पुस्तक से है क्योंकि वह पुस्तक इसी विषय की है, अत्यंत प्रसिद्ध है तथा इस पुस्तक से पहले की है । मैंने वीडियो में यही कहा कि शवदाह पर शोध करने वाले cruz की पुस्तक अवश्य पढ़ें । इसके बाद मैंने 1997 में आई पुस्तक Exploring everyday landscapes का नाम लेना था जो प्रवाह में नहीं लिया गया । अब आपको यह पूरा विवरण तथा सम्बंधित तथ्य पूर्ण रूप से समझ आ गये होंगे । जो संशय था उसका सीधा अर्थ है कि ये पंक्तियाँ इन दोनों पुस्तकों में नहीं अपितु इन पुस्तकों के urban cemetery वाले प्रकरण को पढ़कर इंटरनेट पर लिखी हैं जो अलग अलग स्थानों पर वर्षों से इंटरनेट के चक्कर लगा रही हैं । इन पंक्तियों के सन्दर्भों में इन पुस्तकों को ही दिया गया है । उदाहरण स्वरुप मैं कहूँ मनुस्मृति में लिखा है कि “जन्म से सभी शुद्र है” और कोई कहे कि ये शब्द ज्यों के त्यों मनुस्मृति में दिखाइए तो यह संभव नहीं क्योंकि जन्मना जयते शुद्रः मनुस्मृति की नहीं अपितु पुराणों की बात है । अतः यह बात शब्दशः मनुस्मृति में नहीं है किन्तु यह बात मनुस्मृति से ली गयी है यह सत्य है । इसी प्रकार “The sheer stench from decomposing corpses, even when buried deeply, was over overpowering in areas adjacent to the urban cemetery” ये पंक्तियाँ ऊपर वाली दोनों पुस्तकों के आधार पर हैं किन्तु ज्यों की त्यों उनमें नहीं है ।

वैसे वक्ता प्रवाह में ऐसी त्रुटियाँ अनेक बार करता है । मेरी एक वीडियो साईं पर बनी है जिसमें मैंने साईं का जन्म 1938 कहा है जबकि वह 1838 होना चाहिए । ऐसा नहीं है कि ये गलती मुझे पता नहीं बल्कि मैंने तो आज से 8 वर्ष पूर्व लिखी अपनी पुस्तक “शैतान बने भगवान” में साईं का जन्म आदि एकदम ठीक ठीक लिखा है । भविष्य में भी ऐसी त्रुटियाँ व्याख्यान में अवश्य होंगी । ना मैं पूर्ण हूँ और ना ही कोई अन्य मनुष्य । विषय यहाँ सिद्धांत का है । मेरे प्रयास से शवदाह के सिद्धांत की प्रस्थापना लाखों लोगों में हुई ।

जिस स्वघोषित विद्वान ने 2 वर्ष पुरुषार्थ करके 2 पेज लिखे उसको तो यह भी नहीं पता कि जो पृष्ठ संख्या (362)  की वह बात कर रहा है वह किस पुस्तक में है । वास्तव में (The sheer stench from decomposing corpses…) ये पंक्तियाँ एक और पुस्तक से सिद्ध होती हैं । ये पंक्तियाँ Carroll, Andrew (2013), Here Is Where: Discovering America’s Great Forgotten History पुस्तक के 362 पृष्ठ से सिद्ध होती हैं । स्वघोषित विद्वान ने पृष्ठ संख्या इस पुस्तक की लिख दी और नाम किसी और पुस्तक का लिख दिया । 2 वर्ष में संसार की सबसे बड़ी शोध करने का दंभ भरने वालों की यही योग्यता है । यह भी स्मरण रखें कि वक्ता और लेखक में भी अंतर होता है । मैं घंटों तक धारा प्रवाह में बोलता हूँ तो त्रुटी संभव है किन्तु लेखक बुद्धि को संतुलित रखकर, इन्द्रियों को केंद्रित रखकर शांतचित बैठकर सब प्रत्यक्ष प्रमाण सामने रखकर कुछ भी लिखता है । मेरी 2-3 वीडियो में ऐसी प्रवाह वाली त्रुटियाँ भले ही हों किन्तु अब तक मेरे लिखे लेख में तथा पुस्तकों में ऐसी कोई तथ्यात्मक त्रुटी मेरे सामने नहीं आई है ।

श्रेय लेने के लिए प्रचारित किया गया कि राहुल आर्य ने इनके लेख से एक वीडियो बना दी । अरे, मैंने तो 700 से अधिक वीडियो बनाई है और करोड़ों लोगों तक आर्य समाज के सिद्धांत फैलाएं हैं । मेरी वीडियो से अनेकों बड़े पेज चलते हैं तथा चैनल भी चलते हैं । लोग पैसे भी कमाते हैं किन्तु मैंने कभी कोई कॉपीराईट नहीं रखा है क्योंकि मैं जानता हूँ कि संसार की सभी विद्याओं का मूल परमात्मा है बाकि सब कॉपीपेस्ट ही है ।

ये लोग कितने सिद्धांत वाले है ये इनकी असभ्य तथा भ्रष्ट भाषा से पता लगाया जा सकता है । ये अपनी पोस्ट पर चू…, सू…, साले…जैसी बातें बिना किसी बड़े कारण के भी लिखते रहते हैं और अपने को आज के लेखराम समझते हैं ।

  1. अब ये शब्द भले इन्होंने किसी के लिए भी प्रयोग में लाये हों किन्तु इससे इनके संस्कारों तथा विचारों का भली भांति पता चलता है । कोई भी व्यक्ति thanks bharat के किसी भी व्यक्ति का एक भी प्रमाण दिखा दे जिसमें सार्वजनिक गलत भाषा का प्रयोग हुआ हो । वास्तव में सज्जनों गलत शब्दों के प्रयोग का अर्थ यह है कि उनके पास शब्दों का अभाव है अथवा उनको शब्द चयन करना आता ही नहीं है और फिर अपने को शोधकर्ता सिद्ध करने पर तुले हुए हैं ।

अब देखिये आर्यसमाज में दलित और एससी/एसटी के विरुद्ध कब से ऐसे शब्द बोले जाने लगे । क्या दलितों के पास बुद्धि, दो हाथ, दो पैर आदि नहीं हैं ? क्या सारे दलित अयोग्य है ? वास्तव में आर्यसमाज से दलितों को हटाने हेतु ये एक षड्यंत्र द्वारा कार्य किया जा रहा है । कितने दलित समाज से आने वाले लोगों ने आर्यसमाज को गति दी है इसका आंकड़ा निकालोगे तो बहुत अधिक संख्या आज भी इनकी ही मिलेगी । हाँ, आरक्षण पर बात करनी है, भीम आर्मी और भीमटो पर बात करनी है तो अलग है । 

लेखराम की लिखी ऋषि की जीवनी में एक प्रकरण आता है जो आर्ष साहित्य वाली में 93 पृष्ठ पर है । एक बार ऋषि ने किसी को थोड़ी मनुस्मृति पढाई । कुछ समय पश्चात् अपनी ही पढाई मनुस्मृति के कुछ श्लोकों को झूठा कहा तो पढ़ने वालों ने ऋषि का अपमान कर दिया कि पहले आप स्वयं सत्य तक पहुंचे । वक्ता और शिक्षा (बोलकर पढ़ाना) से त्रुटी होने की सम्भावना अधिक है किन्तु लेखक की कम सम्भावना होती है ।

अब इसके लेख में आंकड़े भी गलत और पुस्तकों की पृष्ठ संख्या तो ऐसी कि सम्बंधित पुस्तक में उतने पृष्ठ हैं ही नहीं । बस यही सब है इसके लेख में । अब जो आर्थिक पहलु की बात है वह तो अत्यंत सरल है । अनेकों मौलानाओं की वीडियो तथा आंकड़े सार्वजनिक है । दिल्ली में मैं अधिक रहा हूँ, वहीं पढ़ा हूँ और वह देश की राजधानी है । वहां की मुस्लिम आबादी तथा उनके दफ़नाने के स्थान सब ओर हैं । ये तथ्य इस देश के लाखों लोग जानते हैं और इसपर किसी के पिता का पैतृक अधिकार नहीं है । ये अत्यंत छोटी और नीच मानसिकता के लोगों की बातें हैं । इसके लेख और मेरी वीडियो में दी गयी बातों का क्रम (sequence) तथा तथ्य भी भिन्न हैं और वैसे भी इसका लेख ही भ्रष्ट और कॉपी पेस्ट है ये दूसरों पर किस आधार से आरोप लगा रहा था ये तो ईश्वर ही जाने । जहां उसने जिस पुस्तक की पृष्ठ संख्या दी, वह हमने कहीं नहीं दी और वीडियो के प्रारंभ में ही हमने विश्व भर के शवदाह के नवीनतम आंकड़े दिए वहीं इन्होंने कहीं से 7 साल पुराने आंकड़े अंत में अपुष्ट तथा अधूरे दे रखे हैं । अब आर्यसमाज में लोग प्रचार करने की सामग्री पर भी पैतृक अधिकार समझ रहें है ।

इनके साथ साथ 2-3 निर्मात्री सभा का प्रचार करने वालों ने भी स्वर में स्वर मिला दिया । एक अ… आर्य ने कहा कि राहुल आर्य के facebook पेज पर उसके द्वारा साईं पर लिखा गया लेख उसका नाम हटाकर डाल दिया गया । इस अमि.. आर्य की इन बातों को तथाकथित स्वघोषित विद्वानों ने बिना प्रमाणिकता जांचे, उसको अपना समर्थन दे दिया और प्रचारित करवा दिया कि ये एक लेख और चोर लिया । इनकी गैंग के एक व्यक्ति ने लिख दिया कि अब पता चला राहुल आर्य की शैतान बने भगवान का लेखक कौन है ? अर्थात् मेरी ही पुस्तकों को अपना बनाने का प्रयास किया जा रहा है किन्तु इनको यह नहीं पता था कि शैतान बने भगवान तो 2012 में लिखी थी और अब उसको thanksbharat.com पर दोबारा लाया गया है ज्यों का त्यों केवल मेरे प्राक्कथन को छोड़कर । आर्यों, यह सब एक षड़यंत्र के द्वारा किया जा रहा है । वास्तव में, जिस facebook पेज की बात की गयी है वह मेरा है ही नहीं ।

वहां पर मेरी youtube की कुछ पुरानी वीडियो डाली हुई हैं जिससे किसी व्यक्ति की कमाई होती होगी । मुझे उससे कोई आपत्ति भी नहीं है क्योंकि मेरे नाम से अनेकों लोग पेज चला रहें हैं जहाँ मेरी वीडियो डालकर facebook पर धनार्जन होता है क्योंकि मैंने youtube तथा facebook पर अपनी वीडियो का कॉपीराईट नहीं किया हैं अन्यथा कोई भी मेरी पूरी वीडियो ऐसे के ऐसे नहीं डाल सकता है ।  मेरे आधिकारिक account से अथवा thanks bharat पेज से कुछ डाला गया हो तो बताएं ।

अब आते हैं इसके लेख पर । जिस साईं बाबा पर इन्होंने अब लेख लिखा है उसपर मैं आठ वर्ष पूर्व पुस्तक लिख चुका हूँ ।

इतना ही नहीं, 2014 के मध्य में वह पुस्तक vedicpress.com पर निःशुल्क pdf में डाल दी गयी थी जो आज भी उपलब्ध है ।

उस पुस्तक के आधार पर अनेकों वीडियो बन चुकी हैं जिनको लाखों लोग देख चुके हैं । उस पुस्तक के आधार पर बनी वीडियो को 25-30 लाख से अधिक तो thanks bharat के विभिन्न मंचों से देख चुके हैं । हजारों whatsapp ग्रुप में उस पुस्तक को मेरा नाम हटाकर लेख के द्वारा डाला जाता है किन्तु मैंने कभी नहीं कहा कि मुझे श्रेय दो यह मैंने लिखी थी और इसका क़ानूनी कॉपीराईट भी मेरे पास है । अरे, विद्या पर किसका अधिकार है ? अब या तो ये निर्मात्री सभा वालों के संस्कार ही ऐसे हैं अथवा ये लोग निर्मात्री सभा में रहने लायक नहीं है । ऐसे मिथ्या भाषण, गाली-गलोच करने वालों का क्या होना चाहिए यह तो आर्य भली भांति जानते ही हैं । अब आते हैं इनके षड्यंत्रों पर । लगभग 15-20 दिन से सार्वजनिक मंच पर मेरे लिए अपशब्दों का प्रयोग करते रहे और अपने को शोधकार सिद्ध करते रहे । जब हमने खुली चुनौती भेजी तो सांप सूंघ गया । फिर पोस्ट करने लगे कि राहुल आर्य ने हमारे account की रिपोर्ट करवाई है ।

मैं पुनः कहता हूँ कि इन कायरों ने अपनी ही माँ का दूध पिया है तो यह बात सिद्ध करके दिखा दे कि हमने कोई रिपोर्ट करवाई है । अब दुष्प्रचार किया जा रहा है कि इनको धमकी दी जा रही है ।

अब यह बात भी इनको प्रमाणित करनी पड़ेगी क्योंकि बिना प्रमाण और कारण के आरोप लगाकर किसी के चरित्र का हनन क़ानूनी अपराध है । वैसे अपने को पंडित लेखराम जैसा धर्मप्रचारक बताने वाले धमकियों की बात कर रहें हैं, क्या यह जीवित ही मृत्यु जैसा आभास नहीं है । यह केवल और केवल भावनात्मक खेल है जो मुस्लिम और इसाई खेलते हैं । यदि रिपोर्ट ही करवानी होती तो कुछ माह पहले भी इन्होंने मेरे प्रति दुर्भावना निकाली थी । ऐसे सार्वजनिक झूठ बोलने वालों ने पहले भी अनेकों बड़े आर्यसमाज के विद्वान तथा कार्यकर्ताओं पर अपशब्द बोले और उनके कार्टून तक बनाये थे । दुर्भाग्य से आर्यसमाज में सब स्वार्थ से अपनी अपनी गैंग बनाकर काम कर रहें हैं । इन लोगों की एक विशेषता और है । ये रात को चोरों की भांति 12 बजे ऑनलाइन आते हैं और ३-३ बजे तक सेकड़ों कमेंट करके समय व्यतीत करते हैं । उल्लू और चोरों जैसी दिनचर्या जिनकी होवे उनसे क्या अपेक्षा की जा सकती है ।  कोई न मिले तो आपस में कचोड़ी खाने खिलाने की बातें करने लगते हैं और फिर अपने को आर्यसमाज के रक्षक सिद्ध करने लगते हैं ।

इनके द्वारा प्रयोग किये गये अपशब्दों तथा गालियों के फोटो, चुनौती देने पर पीछे हटने तथा चालाकी से शवदाह के विषय को दबाने के फोटो भी हमारे पास हैं तथा कोई भी देख सकता है । ये सोच रहे थे कि कैसे भी बात खत्म हो ताकि इनके लेख के गलत आंकड़े और वह पुस्तक की गलती किसी के सामने न आये किन्तु हम ऐसा नहीं होने देना चाहते थे और आमने सामने वीडियो बनाकर इसका पूर्ण समाधान करना चाहते थे जिसपर इन कायरों ने संज्ञान नहीं लिया । यह मामला तो कुछ ही मिनटों में सत्य तक पहुंच जाता किन्तु इनके बातें दबाने के चक्कर में ये सब हुआ ।

इससे पता चलता है कि ये एक वीर्यहीन लोगों की गैंग है जो केवल रातों रात सोशल मीडिया पर समय व्यतीत करके आर्यों के कार्यों में रुकावट डालते हैं और उसका आनंद लेते हैं ।

इसके अतिरिक्त जो मेरे प्रति तथा मेरे परिवार पर इनकी पोस्ट आदि पर चर्चाएँ हुई हैं जिनका आनंद इन सबने वहां लिया था, उन बातों का पूरा हिसाब आमने सामने बैठकर अवश्य लिया जायेगा क्योंकि हम कोई गाँधी नहीं हैं जो सामने वाला सार्वजनिक कीचड़ उछालता रहे और हम देखते रहें । इसमें मैंने किसी का कोई नाम नहीं लिया है क्योंकि मेरे ऐसे संस्कार नहीं है कि मैं सार्वजनिक किसी पर कीचड़ फैंक दूँ । जो इन लोगों ने मेरे प्रति व्यवहार दिखाया है वह किसी बाहर वालों के सामने दिखाते तो पता चलता उसका परिणाम क्या हो सकता है । ये मत सोचना कि अपने तो अपने है ।

कल फिर कोई मदारी आकर कहेगा कि इसका उत्तर दो, उसका उत्तर दो तो व्यर्थ समय नहीं लगाया जायेगा क्योंकि जीवन बहुत छोटा है और हमारे पास करने के लिए अनेकों कार्य हैं । यदि सामर्थ्य हो तो थैंक्स भारत जितना कार्य और करोड़ों लोगों तक बात पहुंचाने वाला कार्य करके दिखाओ, फिर बोलना अन्यथा द्वेषी का हिसाब ईश्वर की न्याय व्यवस्था में भी होगा हमारी में भी । सिद्धान्तिक त्रुटी अवश्य महत्वपूर्ण होती है किन्तु वह भी वक्ता किस प्रकरण पर क्या बोल रहा है, उस पर निर्भर है । अभी कुछ समय पूर्व जो स्वामी विवेकानंद परिव्राजक पर आर्यों में हंसी मजाक चल रहा था वह निश्चित रूप से नीच लोगों की हरकतें थी । जो अच्छे कार्य किसी विद्वान ने किये हैं उनका प्रचार आजीवन नहीं करते हैं किन्तु मानवीय अल्पज्ञता के कारण हुई छोटी बात को भी सार्वजनिक लाकर भले लोगों के चरित्र को धूमिल करना चाहते हैं । आज पुनः आर्यसमाज उठ रहा है और कुछ लोग सार्वजनिक आकर ऐसे ऐसे मुद्दे दुष्टों को देते हैं कि जिनसे अनेकों आर्यसमाज की ओर प्रेरित लोग दूर हट जाते हैं । ऐसे लोग आर्यसमाज में छुपकर आर्यों का पतन कर रहें है । यह लेख केवल किसी व्यक्ति अथवा विषय से सम्बंधित नहीं अपितु एक बहुत बड़ी समस्या हेतु लिखा है । सुधर गये तो ठीक अन्यथा समय के चक्र में परिस्थिति बदलते देर नहीं लगती हैं ।

महर्षि दयानंद के कारण हजारों लोगों में प्रसिद्ध हुए एक मुंशी इंद्रमणि थे जिन्होंने बाद में ऋषि जी की पीठ में छुरा घोंपा था । इंद्र सभा बनाई और ऋषि दयानंद पर पत्रिका निकाल कर पैसे खाने तथा मूर्खता पूर्ण व्यवहार वाले आरोप लगाए थे । आज भी आर्यसमाज में कुछ तथाकथित इन्द्रमणि हैं । एक तो इनमें से ऐसा है जिसने आर्यसमाज के नाम पर चैनल चलाने के लिए प्रार्थना की थी जिसको हमने हजारों लोगों तक पहुंचाया था । जब हमने किसी पर कोई व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं कि तो ये कितने बड़े गुंडे (बदमाश) है जो सार्वजनिक मुस्लिमों वाले शब्द प्रयोग कर गए । इन सबका व्यक्तिगत उत्तर जब तक मैं जीवित हूँ तब तक कहीं न कहीं अवश्य देना पड़ेगा । कहीं तो मिलना ही पड़ेगा, आज नहीं तो कल ।

हम अभी भी उस व्यक्ति से आमने सामने मिलने की आशा करते हैं ताकि भविष्य में आर्यसमाज की कोई हानि न होवे ।

राहुल आर्य