उपांग क्या और कितने है यह विद्या का प्रमाण कैसे है ?

उपांग क्या है ?

उपांग संख्या में कुल छ: है । उपांग को दर्शन और शास्त्र भी कहते है । उपांग समस्त सृष्टि विद्या का प्रमाण और तर्क के आधार पर सूत्र रूप में वर्णन करते है । संस्कृत साहित्य में यह अमूल्य निधि है । विश्व की किसी भी भाषा में इनकी कोटि का सूत्र रूप ग्रन्थ नहीं है । इन अध्ययन से बुद्धि का पूर्ण विकास होता है । ज्ञानकाण्ड के परम सहायक ये ग्रन्थ है । इनेक नाम ये है :- न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्वमीमांसा और वेदांत ।

सत्य बोलने वाले मनुष्यों को वेदों में क्या महत्व दिया गया है ?

न्यायदर्शन के प्रणोता गौतममुनि, वैशेषिक के कणाद, सांख्य के कपिल, योग के पतंजलि, पूर्व मिमासा के जैमिनी और वेदांत के रचियता व्यास मुनि है । इन छ: में सृष्टि विद्या के भिन्न भिन्न अंगों का वर्णन किया गया है । न्याय में परमाणु, वैशेषिक में काल, सांख्य में प्रकृति, योग में पुरुषार्थ, पूर्वमीमांसा में कर्म और वेदांत में ब्रह्म विद्या का वर्णन है । सृष्टि का ज्ञान लौकिक और मुक्तिज्ञान में आवश्यक है अत: इन दर्शनों का प्रतिपाद्य विषय मुक्ति ही है । ये समस्त दर्शन प्रत्यक्षादी प्रमाण और तर्क के आधार पर पूर्व उत्तरपक्ष बाँध कर निणाय प्रकाशित करते है । प्रमाण और तर्क से कोई आस्तिक अथवा नास्तिक दूर नहीं रह सकता । प्रत्येक दर्शन में अपने अपने अवांतर विषयों का वर्णन है । ये सब दर्शन वेद को परमप्रमाण स्वीकार करते है ।

  1. न्याय में प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्ड, हेत्वाभास्म, छल, जाति और निग्रहस्थान इन 16 पदार्थों के तत्व ज्ञान से मोक्ष प्राप्ति का वर्णन किया गया है । अवांतर विषय अनेक है । इसमें तर्क का प्राधान्य है ।
  2. वैशेषिक में द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय इन 6 पदार्थों के साधर्म्य और वैधर्म्य के तत्वज्ञान से मोक्ष प्राप्ति का वर्णन है । अवांतर विषय भी बहुत है । इस में भौतिक किम्बा विज्ञान का भी सिद्धांत रूप से वर्णन है ।

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  3. सांख्य में त्रिविध दुखों की अत्यंत निवृति को अत्यंत पुरुषार्थ मान कर मोक्ष प्राप्ति का वर्णन किया गया है । इसमें सत्व, रज: और तम: रूप त्रिगुणात्मिक प्रकृति के विकार रूप महान और अहंकार आदि भौतिक तत्वों की व्याख्या की गई है । पुरुष=चेतन को इस से पृथक-प्रतिपादित किया गया है । अवांतर विषय भी अनेक विध है ।
  4. योग में पुरुष की चित्त वृतियों के निरोध को योग बतलाते हुए कैवल्य=मुक्ति प्राप्ति के साधन रूप यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इन अष्टांगों की पूर्ण व्याख्या है । चित्त-शुद्धि का उपाय वर्णित है । जीव का अपने स्वरूप और ईश्वर में प्रतिष्ठित होना परम स्थिति बतलाई गई है । अन्य अवांतर विषय भी है ।
  5. पूर्व मीमांसा में धर्म-कर्म की शुद्धता का वर्णन किया गया है । विहित कर्मों का वैदिक यज्ञ-याग आदि आवश्य अंगों सहित करना प्रतिपादित है । वेदज्ञान के विना मनुष्य को कर्तव्य धर्म का बोध नहीं हो सकता । इसी लिए वेदप्रतिपादित याज्ञिक कर्मों का पूर्ण वर्णन है । इसमें वेदाध्ययन के विना पूर्वमीमांसा के कर्मकाण्ड रहस्य को मनुष्य जान ही नहीं सकता । इसमें वेद को परमप्रामाण्य सिद्ध किया गया है ।
  6. वेदांत में सृष्टि के निमित्त कारण ब्रह्म की पूर्ण व्याख्या है । वैदिकशास्त्रों और उपनिषदों के ब्रह्म परक वर्णों की जांच की गई है । अवांतर रूप में जीव की अवस्था, गति, जन्म मृत्यु अआदी का वर्णन किया गया है और सिद्ध किया है कि ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करके मनुष्य परांत काल तक मुक्त हो जाता है । मुक्ति अवस्था में सदा आनंद में रहता है । मुक्ति बीच में संसार में जन्म ग्रहण नहीं करता, इत्यादि अनेक विषयों को विशद रूप से प्रकाशित किया गया है ।

    सृष्टि के आरम्भ में ज्ञान और भाषा की उत्पत्ति क्यों और कैसे हुई ?

इन दर्शनों पर अनेक भाष्य, वार्तिक और टिकाये संस्कृत में उपलब्ध है । प्राचीन मुनियों की व्याख्या सरल और प्रतिपादन शैली सुगम है । नवीन विद्वान् पण्डितों ने जटिल भाषा की जटिलता ही इस का कारण है । प्रत्येक दर्शन पर सांप्रदायिक रंग भी चढ़ाया गया है । अत: मनुष्य को प्राचीन मुनियों के भाष्य सहित इन दर्शनों को पढ़ना उचित है । इसकी गणना नीचे दी जाती है –

न्याय पर-वात्स्यायन मुनिकृत भाष्य

वैशेषिक पर – प्रशस्तपाद भाष्य गौतम मुनिकृत

सांख्य पर – भागुरिमुनिकृत भाष्य

योग पर – व्यास्मुनिकृत भाष्य

पूर्वमीमांसा पर – व्यास्मुनिकृत व्याख्या

वेदांत पर – बोधायनमुनिकृत भाष्य । अन्य भाष्य समुपलब्ध नहीं है । इनमें भी कुछ भाष्य दुष्प्राप्य ही हैं ।

वेद भाष्य कौन से है और किस भाष्यकार के उत्तम भाष्य है ?

जहाँ तक हो सके आर्ष-भाष्यों को ही पढ़ना चाहिए, क्योंकि उनमें सांप्रदायिक नहीं होती । इन्हीं दर्शनों के विषयों पर संस्कृत में  नव्यन्याय और नवीन वेदांत आदि रूप में अनेक ग्रन्थ रचे गए हैं । वेदांत पर तो श्री शंकराचार्य का शंकर भाष्य, श्रीरामानुचार्य का श्री-भाष्य और श्री मध्वाचार्य का अणुभाष्य सांप्रदायिक टिका-टिप्पणियों के गढ़ है । वेदांत पर अद्वैत, द्वैताद्वैत आदि नवीन वेदांत के अनेक भेद प्रभेद है ।

बौद्ध, जैन और चार्वाक दर्शन भी संस्कृत में उपलब्ध है । इनकें भी अनेक ग्रन्थ है जिन में ईश्वरवाद का निराकरण किया गया है । वैदिक दर्शन सब ईश्वरवादी है । बौद्धों  और जैनों में भी अनेक अवांतर दार्शनिक भेद है । इन के ग्रन्थ भी परस्पर भिन्न-भिन्न मिलते है ।

स्मृति क्या है व मनुस्मृति कौन-से संविधान पर आधारित है ?

  • वैदिक धर्मी

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