ओउम् जाप से सभी समस्याओं का क्षण में समाधान

ओउम् की महत्ता

ओउम्

सर्वेवेदा: यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वन्ति ।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचरुर्थ चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ।।

कठो. १/२/१५

कठोपनिषद के ऋषि यमाचार्य उपदेश करते है कि हे नचिकेता । जिस शब्द की सब वेद परमात्मा की प्राप्ति के लिए साधन बताने के लिए बार-बार कहता है, जिसको प्राप्त करने के लिए वेदों ने हर प्रकार के तप और साधन बताएं है, जिसके जानने की इच्छा के लिए ब्रहमचर्यश्रम धारण किया जाता है अर्थात् समस्त इन्द्रियों को ब्रह्म अर्थात् वेद के नियमों  की पूरी पूरी आज्ञा पालन करते हुए वेदों की शिक्षा पाते हैं, जिससे वह बढ़ा जिसके कारण अपने में व्यापक ब्रह्म को भी जान नहीं सकते, दूर हो जय है  । जिस प्रकार दर्पण से ही आँख और अंजन-सुरमा दिखाई पड़ता है इसी प्रकार मन रूपी दर्पण से ही जीवात्मा और परमात्मा का ज्ञान हो सकता है परन्तु अँधेरी रात में कुछ नहीं दिखता अत: देखने के लिए प्रकाश की आवश्यकता पड़ती है । इसी प्रकार ब्रह्म ज्ञान के वास्ते जिस प्रकाश की आवश्यकता पड़ती है । इसी प्रकार ब्रह्म ज्ञान के वास्ते जिस  प्रकाश की आवश्यकता है । वह वेद विद्या है । जिसके यथावत् प्राप्त करने का साधन ब्रह्मचर्य आश्रम है । इसके बिना इस ज्ञान का प्राप्त करने का साधन नहीं जान पड़ता है । अत: जिस पद अर्थात् शब्द के जानने के वास्ते उपरोक्त साधन किये जाते है उस साधन को संक्षेप से बताया है वह पद केवा; ‘ओउम’ है । इस शब्द में अकार से व्यापक होने का, उकार से प्रकाशक होने का प्रमाण और मकार से बुद्धुमात्ता और प्रकाश स्वरूप होने का तथा इसके अतिरिक्त अन्य सब कामों का पता ओउम् से लग जाता है ।

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एतद्दयेवाक्षरं ब्रह्म एतद्दयेवाक्षरं परम् ।

एतद्दयेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ।।

कठो. १/२/१६

यमाचार्य उपदेश करते है कि ओउम् अक्षर हैं, इस का कभी नाश नहीं होता । यह सदा रहता है । यह सब से बड़ा और नाश रहित है ।यही मनुष्य जीवन का नियत मार्ग या सबसे बढ़कर जानने योग्य पदार्थ और ज्ञान की अंतिम सीमा है । सरे साधन इस ज्ञान के प्राप्त करने के लिए ही किये जाते है । जिस प्रकार रसोई की साडी सामग्री का मतलब पेट भरना ही होता है इसी प्रकार सम्पूर्ण साधनों की प्राप्ति केवल ओउम् के जानने के लिए ही है । और जो व्यक्ति उस अक्षर ओउम् को जान जाता है उसकी जो कुछ इच्छा होती है वह पूर्ण हो जाती  है । ओउम् के जान लेने के पश्चात् किसी इच्छा का होना कठिन ही नहीं असंभव है उसी ओउम् को आदि जगत से मनुष्य अबसे उत्तम कहते आये है । इस नाम के ज्ञान से हर प्रकार का कष्ट स्वयं दूर हो जाता है । सम्पूर्ण सुखों का स्त्रोत यही नाम है । जो लोग ओउम् के उपासक है उनको हर्ष, शोक भय आदि से कोई सम्बन्ध नहीं, जिस स्थान में सूर्य का प्रकाश हो वहां किसी प्रकार का अंधकार हो ही नहीं सकता । ऐसे ही जिस किसी ने ओउम् को जान लिया है उसको अज्ञान रह ही नहीं सकता जहाँ राग द्वेष में प्रवृति होती है अर्थात् भाले बुरे कर्मों के करने से पाप पुण्य होते है और पाप पुण्य से जन्म मरण होता है इसी से दुःख होता है । जहाँ अज्ञान नहीं वहां राग द्वेष हो ही नहीं सकता । जहां राग द्वेष नहीं वहां दुःख किसी प्रकार भी उत्पन्न नहीं होते । अत: एक ओंकार के स्वरूप को जान लेन से ही मानव सम्पूर्ण दुखो द्वेशों से मुक्त हो जाता है ।

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एतदालम्बनं श्रेष्टमेतदालम्बनं परम् ।

एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्म लोके महीयते ।।

कठो. १/२/१७

 

ओउम् की उपासना सर्वश्रेष्ठ मुक्ति का मार्ग है । ओउम् का आश्रय परम है । इस परम सहारे को जान कर तथा धारण करके साधक ब्रह्म लोक में महिमा को पाटा है । ओउम् की उपासना के योग्य बनने के लिए ज्ञान की आवश्यकता है । अविद्या, अज्ञान ओउम् को जानने के मार्ग में बढ़ा न डाल पाएं इसके लिए निष्काम कर्म की आवश्यकता है । मैला मन उपासना में लग ही नहीं सकता है उस शुद्ध करने की आवश्यकता है । और बिना निष्काम कर्म के मन शुद्ध हो नहीं सकता और बिना मन की शुद्धि के ओउम् की उपसना संभव ही नहीं है । अत: जितने साधन है सब पहले ही होते है । ब्रह्म के जानने केलिए वह सब से अंतिम साधन है । जिसने इस साधन अर्थात् ओउम् को जान लिया है वह ब्रह्म लोक के सुख अर्थात् ब्रह्म दर्शन के आनंद को प्राप्त होता है ।

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ओउम् जाप से कामना पूर्ति

तस्मै स होवाच । एतद्वै सत्यकाम ।

परं चापरं च ब्रह्म यदोंकार: ।

तस्माद विद्वाने तेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ।

प्रश्नो. ५-२

सत्यकाम द्वारा पूछे जाने पर कि भगवान । जो मनुष्य जीवन पर्यन्त ओउम् का जाप करता है- ध्यान करता है सिमरन करता है तो वह किस लोक को प्राप्त करता है का पिप्पलाद ऋषि उत्तर देते है कि हे सत्यकाम यह जो ओंकार है यहीं पर और अपर ब्रह्म है । इसी लिए विद्वान् तत्द्दर्शी भक्त इसी ओंकार के सहारे से पर अपर ब्रह्म में से एक को पा लेता है । ऋषि कहते है कि जगत में दो प्रकार की वासना है । एक तो मुक्ति की वासना दूसरी सांसारिक सुख की कामना अत: जो व्यक्ति ओंकार का नियम पूर्वक जीवन पर्यन्त ध्यान करता है उसकी जिस प्रकार की इच्छा हो वह पूरी हो जाती है । अर्थात् जो ग्यानी पुरुष है वह जिस विचार से ब्रह्म की उपासना करता है उसमें सफल होता है । उसको पुनर्जन्म की आवश्यकता नहीं होती वह इसी जन्म में सब सुखों को प्राप्त कर लेता है ।

 

ओंकार जाप से ब्रह्म प्राप्ति

य: पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभि

ध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्न: । यथा पादोदर

रसत्वचाविनिर्मुच्यते एवं ह बै सपाप्मना विनिर्मुक्त: स

सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम् स एतस्माञ्जीवधनातपरात् परं

पुरिशंय पुरुषमिक्षते । तदेतौ श्लोको भवत: ।

प्रश्नो. ५-५

ऋषि कहते है की जो साधक इस तीन मात्रा वाले ओउम् अक्षर से परब्रह्म पुरुष को मनसा वाचा भाव से चिंतन करता है । तो वह उपासक प्रकाश तथा सूर्य में सप्राप्त होता है । उसका आत्मा, आत्मिक प्रकाश से छूट जाता है निश्चय ऐसे ही वह उपासक पाप से मुक्त हो जाता है । उस अवस्था में वह साम मंत्रो द्वारा ओउम् नाम के कीर्तन से ब्रह्म लोक को ले जाया जाता है तब वह इस जीवमय लोक से ऊपर पर से पर अर्थात् परम ब्रह्माण्ड के पति पुरुष को देखता है । ऐसा ध्यानी उपासक परमेश्वर के पर स्वरूप वाचक से वाच्य को प्राप्त करता है । इस पर श्लोक प्रमाण है । जो वाद ज्ञान से पूर्ण है, वह परमात्मा को जान सकता है  जो वेद ज्ञान से शुन्य है वह परमात्मा को नहीं जान सकता । जिस का मन मल विक्षेप आवचरण से ग्रसित है वह भी परमात्मा के दर्शन नहीं कर सकता । परमात्मा ने सूर्य दिया है जिसका नाम वेद है । ज्ञान के द्वारा जब मन के दोष-मल विक्षेष  आवरण दूर हो जाते है तो मन के दर्पण में भगवान के दर्शन होते है अन्यथा नहीं ब्रह्म दर्शन ओंकार जाप से मन के शुद्ध दर्पण में होते है ।

 

ओउम् के जाप का फल

तिस्त्रो मात्रा मृत्युमत्य: प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ता: ।

क्रियासु बाह्याभ्यन्तर मध्यमांसु सम्यक प्रयुक्तासु न कम्पतेज्ञ: ।।

 

जो साधक ओउम् की तीन मात्राओं अर्थात् अर्थात् अकार उकार और मकार को मिला कर ठीक-ठीक उपसना करता है और जिसका कोई कर्म नियम विरुद्ध नहीं है । जिसकी आन्त्रिक और बाह्य क्रिया में अंतर नहीं । जो मन वचन कर्म में समान रहता है । जैसा मन से सोचता है वैसा ही बोलता है जैसा बोलता है वैसा कर्म भी करता है जिसको पाप के विचार की शंका भी नहीं होती ऐसा ओउम् का जाप करने वाला साधक कभी भय नहीं खाता वह निर्भय हो जाता है ।

यदि कोई संसार में नुर्भय विचार सकता हा तो वह केवल ऐसा साधक हो सकता है जिसे किसी का भय नहीं होता । सुख दुःख या भय अपने कर्मों से होता है जब हम पाप ही नहीं करेंगे तो हमें दुःख कैसे हो सकता है ।भय के तीन कारण होते है पहले स्वयं पाप करना दुसरे किसी अन्य से भय और तीसरे अविद्या अज्ञान से भय । जब मन वाचा कर्म से सही कार्य करेंगे और कर्म भी ज्ञान पूर्वक करेंगे तो भय किस प्रकार हो सकता है । अध्यात्मवाद में ओउम् नाम की तीन मात्राएँ वाचिक, मानस और भावमय जाप है । भावमय जाप का नाम ही एकाग्रता है । ध्याता ध्येय और समता ही भावमय जाप है । इस जाप में आत्मा स्थिर हो जाती है और अपर ब्रह्म नाम से परब्रहम जान को प्राप्त कर लेता है ।

ओउम् की अराधना

ओमित्येदक्षरमुदगीथमुपासीतोमिति ह्युद्गायति ।

तस्योपव्याख्यानम् ।

छान्दो. १/१/१/

साधक उपासना के समय ओउम् अक्षर उदगीय को अराधे ।

उद्गाता ओउम् कह कर ही गाया करता है । उस ओउम नाम का आगे व्याख्यान है । उपसना के नाम, जाप, नाम चिंतन तथा  नाम ध्यान का बड़ा माहत्म्य है । प्राचीन काल के संत नाम का गान किया करते थे । जब भगवान नाम ऊँचे स्वर से गाया जाय तो उसी को उद्गीथ कहते है ओउम् का अर्थ है रक्षा करने वाला उसी का ऊँचे स्वर से गान करना चाहिए वही रक्षक है । रक्षा करने वाला परमेश्वर ही उद्गीथ है ।

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ओउम् सब रसों का सार है

एर्षा भूतानां पृथिवी रस: पृथिव्या आपो रसोऽऽपामोषघयो रस: ।

ओषधीनां पुरुषो रस: पुरुषस्य वाग् रसो, वाच ऋग्

रस ऋच: साम रस:, साम्न उद्गीथो रस: ।

छान्दो. १/१/२

 

पांच महाभूतों का सार पृथिवी है । पृथिवी का सार जाल है । जलों का सार अन्नादि औषधियां है औषधियों का सार पुरुष है । मनुष्य देह है । पुरुष का सार उसकी वाणी है । वाणी का सार ऋग है-भगवान की स्तुति है । ऋग का सार साम है, सतुति को स्वर में गाना हैं, साम का सार भगवान का नाम गायन है । सब सारों का सार भगवान का नाम ओउम् है ।

 

सारों का सार है

स एष रसानां रसतम: परम: ।

पराध्र्योऽष्टमो यदुद्गीथ: ।

छान्दो. १/१/३

पहले मंत्र के सात सारों को जो आठवां सार-ओउम् है-भगवान का नाम है यह सब सारों का सार है । परम सार है, परमानन्द है, परमधाम है । सबसे उत्कृष्ट स्थान है । उस ओउम् की उपसना करनी । मनुष्य जन्म का सार भगवान की स्तुति है । स्तुति का सार उसे संगीत में गाना है । और साम संगीत का सार भगवान के नाम को जपना तथा गाना है । ओउम् भगवान का नाम परम सार है । परमेश्वर की प्राप्ति का सर्वोतम साधन होने से वह पमानंद है और परम स्थान है । उपसना में ओउम् नाम की उपसना परम उपसना है ।

 

ओउम् जाप से कामना पूर्ति

आपयिता ह वै कामनां भवति य एतदेवं

विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ।

छान्दो. १/१/७

जो उपासक ओउम् नाम की महिमा को इस प्रकार जनता हुआ इस अक्षर उद्गीथ की उपसना करता है । भगवान के ओउम् नाम को जपता है निश्चय वह कामनाओं को प्राप्त होता है । उसकी सब कामनाये पूर्ण हो जाती । भगवान के नाम की महिमा को जान कर ज्ञान पूर्वक सच्ची धारणा से और उपनिषद के परमार्थ से जो कर्म किया जाता है उसका संस्कार प्रबल होता है और फल भी अत्युत्तम होता है ।

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नाम उपासक के सब विरोध दूर हो जाते है

एवं यथाश्मानमाखण मृत्वा विध्वंसत एवं हैव स

विध्वंसते य एवं विदि पापं कामयते

यश्चैनमभिदासति । एषोऽश्मा रखण: ।

छान्दो. १/२/८

जिस प्रकार पत्थर से टकरा कर मिट्टी का ढेला चकनाचूर हो जाता है ठीक उसी पराक्र वह नष्ट हो जाता है जो इस प्रकार ओउम नाम की उपसना करने वाले की अनिष्ट कामना करता है । जो इस उपासक को हनन करना चाहता है वह स्वयं नष्ट हो जाता है । क्योंकि वह उपासक तो परमात्मा की उपसना के कारण एक अभेद्य शिला है । ओउम् नाम की उपसना करने वाले के सब विरोध दूर हो जाते है ।

ज्ञान प्राप्ति के मार्ग कौन-कौन से है ?

 

ओउम् का स्मरण करो

अराइव रथनौभो सहता यत्र नाङ्य: ।

स एषोऽन्तश्चरते वहुधा जायमान: ।

ओमित्येवंध्ययाथ आत्मानं स्वस्ति व:

पाराय तमस: परस्तात् ।।

 

रथ की नाभि में लगे हुए अरों की भांति जहाँ नडीयां जुडी हुई है वहां ह्रदय में वह यह आत्मा अनेक विकासों से साधनाओं से भीतर प्रकट होता है । ऐसे इस आत्मा ओउम् को स्मरण करो अज्ञान अंधकार से परे पार उतरने के लिए तुम्हारा कल्याण हो ।

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ओउम् अविनाशी की व्याख्या

ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं, भूतं भवद्

भविष्यदिति सर्वमोंकार एव, यच्चान्यत् त्रिकालातितं तप्योङ्कार एव ।

माण्ड्क्यो. १

जो दिखाई दे रहा है यह सब वह ओउम् अविनाशी है । उसका व्याख्या किया है । भूत वर्तमान और भविष्यत् सब ओंकार ही है । जो कुछ और तीनों कालों से ऊपर है वह भी ओंकार ही है । सारा विश्व भगवान् का शरीर है इसमें ईश्वर व्यापक है । उसी की इच्छा से आकर-प्रकार तथा नाम रूपमय जगत की रचना हुई । अतएव भगवान् की सत्ता में ही सारा संसार है । एक प्रकार से भगवान् विश्व ब्रह्माण्ड का शरीर है । शरीर और शरीरी एक है ।

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प्रणव द्वारा आत्म साक्षात्कार

वह्मोर्थथा योनिगतस्य मूर्तिन दृश्यते नैव च लिङ्ग नाश: ।

स भूय एवेन्थन योनिगृह्यस्त्तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे ।

श्वेता १/१३

 

जैसे लकड़ी से उत्पन्न होने वाली अग्नि लकड़ी मेंनहीं दिखाई देती और न ही उस अग्नि का उस लकड़ी में आभाव है अर्थात् उसका ऊष्मा रूप चिन्ह भी नष्ट नहीं होता । वह अग्नि चाहों तो फिर भी ईंधन योनी से ग्रहण की जा सकती है अर्थात् लकड़ी को ईंधन वाट जला कर अग्नि का ग्रहण किया जा सकत है ठीक इसी पराक्र आत्म परमात्म तत्व दोनों देह में प्रणव से प्रणव ध्यान से तथा जाप से ग्रहण करने योग्य है । ओंकार के जाप ध्यान सिमरन से इसी शरीर में आत्मा के द्वारा परमात्म का साक्षात्कार किया जा सकता है ।

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ओंकार द्वारा परमात्मा के साक्षात्कार का ढंग

स्येदेहमरणिं कृत्वा, प्रणवं चौत्तरारणिम् ।

ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवंपश्येनि्न्गुढवत् ।।

 

परम कल्याण का अभिलाषी उपासक अपने शरीर को नीचे की अरणी कल्पना कर सौर प्रणव को ऊपर की अणि कल्पना कर ध्यान रूपी मंथन अभ्यास से लकड़ी में छुपी अग्नि की तरह परमात्मा को देखे । मन लगा कर भगवान् के नाम सिमरन-नाम जाप ध्यान से भगवान के दर्शन करें ।

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ब्रह्म प्राप्ति का साधन ओउम्

ओमित ब्रह्म । ओमितीदं सर्वम् । ओमित्येतदनुकृर्तिह्स्म  वा अप्यो श्रावयेत्या श्रावयन्तिं ओमिति सामानि गायन्ति ।

ओं शोमिति शस्त्राणि शंसन्ति । ओमित्य ध्वर्यु: प्रतिगरं प्रति गृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रसौति ।ओत्यिग्निहोत्रमनु जानाति ।

ओमिति ब्राह्मण: प्रवक्ष्यन्नाह ब्राह्मोपापप्नवानीति । ब्रह्मौबोपपाप्नवानीति

तैत्तरियो. ८/९

 

 

ओउम् यह परमेश्वर है । यह सब ओउम है । ओउम यह अनुज्ञा है । अनुमति देना भी ओउम् का अर्थ है । पूज्य को कहना हो कि शास्त्र सुनाओं तो ओउम् सुनाओ कहने से सुनाते है, ओउम कह कर साम मंत्रो को गाते है । याजक लोग ओउम् शोम-सुख कह कर यज्ञ उपकरणों की प्रशंसा करते है । ओउम् उच्चारण करके अध्वर्यु मंत्र पाठ करता है । ओउम् शब्द से ब्रह्मा कर्म करने की आज्ञा देता है । यहाँ आज्ञा अर्थ में ओउम है । ओउम् उच्चारण करके अग्नि होत्र की आज्ञा देता है । ओउम उच्चारण करके ब्रह्माण्ड वेद का व्याख्यान करता हुआ यह चाहता है कि मैं ब्रह्म को प्राप्त होऊ । इस प्रकार वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है । इस प्रकार ओउम् जाप ब्रह्म प्राप्ति का साधन है ।

ग्रन्थ जो हिन्दू धर्म के प्राचीन और प्रेरणादायक होने का आधार है ?

 

ओउम के आश्रय से पूर्ण ज्ञान प्राप्ति

 

तमोंकारणैवायतनेन, नान्वेति विद्वान् ।

यतच्छान्तमजरममृतमभय परन्चेति ।

प्रश्नों-५-७

ऋषि ने कहा है कि ऋग्वेद अर्थात् ज्ञान काण्ड से इस लोक की और यजुर्वेद अर्थात् कर्मकाण्ड से आकाश में निवास करने वाले अन्य लोकों की और सामवेद में जो कुछ प्राप्त  होता है उसे पूर्ण ज्ञानी पुरुष जिन्होंने योग और समाधि से सद विद्या को जान लिया है वह बता सकते है । इस अवस्था को ओंकार के आश्रय से ही सर्व साधारण मनुष्य प्राप्त कर लेता है । जिसमें शांति प्राप्ति होती है । अर्थात् फिर कोई इच्छा शेष नहीं रहती जिस ओर मन को आत्मा चाहे उस और मन जावे । न बुढापे का अवसर प्राप्त होता है मृत्यु से पृथक् रहता है और निर्भय रहता है । और जो सबसे महान है उसको प्राप्त कर लेता है ।

सत्य बोलने वाले मनुष्यों को वेदों में क्या महत्व दिया गया है ?

 

  • वैदिक धर्मी

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