कृष्णजी के विषय में महर्षि दयानन्द सरस्वती Vs भागवत

श्री कृष्णजी पर लगे मिथ्या आरोप व महर्षि दयानन्द

कृष्णजी

महर्षि के ह्रदय में श्री कृष्णजी के प्रति अत्यंत श्रद्धा और सम्मान का भाव विद्यमान था । वे उन्हें महाधार्मिक, महात्मा, आप्त पुरुष, धर्मात्मा, धर्मरक्षक, दुष्टनाशक, परोपकारी, सत्पुरुष और श्रेष्ठ पुरुष आदि कहकर याद करते हैं । निम्नलिखित उद्धरण इस भाव को दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं  । जैसे हीरे का मूल्य जौहरी ही जान सकता है, अन्य नहीं । इसी प्रकार योगिराज दयानन्द ही योगिराज कृष्णजी की महिमा को जानते थे  । यही है कि वह श्री कृष्णजी का वर्णन करते समय सदैव उनका नाम बड़े आदर और सम्मान से लेते । (सम्पादक

वेद, वेदांग, शाखाएं क्या है और इनका हिन्दू धर्म में क्या महत्व है ?

“देखो ! श्री कृष्णजी का इतिहास महाभारत में अत्युत्तम है । उनका गुण, कर्म, स्वभाव और चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश है, जिनमें कोई अधर्म का आचरण श्री कृष्णजी ने जन्म से मरण पर्यन्त बुरा काम कुछ भी किया हो, ऐसा नहीं लिखा और इस भागवत वाले ने अनुचित मनमाने दोष लगाये है । दूध, दही, मक्खन आदि की चोरी और कुब्जा दासी से सम्भोग, परस्त्रियों से रासलीला, क्रीडा आदि मिथ्यदोष श्री कृष्णजी पर लगाये है । इसको पढ़-पढ़ाकर, सुन-सुना के अन्य मत वाले श्री कृष्णजी की बहुत सी-निंदा करते हैं । जो यह भागवत न होता तो श्री कृष्णजी के सदृश महात्माओं की झूठी निंदा क्योंकर होती ? ।” (सत्यार्थप्रकाश, समु० ११) 

वेदों की संख्या कितनी है और रचना किसने की प्रमाण सहित ?

क्या इससे अधिक कोई किसी के विषय में प्रमाण पत्र दे सकता है ?

इस लेख में महर्षि ने श्री कृष्णजी को आप पुरुष कहा है और आप्त पुरुष कौन है । इसकी व्याख्या महर्षि अपनी पुस्तक वेदभाष्यभूमिका  के “वेदानां नित्यत्व विचार:” विषय में इस प्रकार करते है –

“आप्त लोग वे होते हैं जो धर्मात्मा, कपट-छलादी दोषों से रहित सब विद्याओं से युक्त, महायोगी और सब मनुष्यों के सुख होने के लिए सत्य उपदेश करने वाले है, जिन्मने लेशमात्र भी पक्षपात और मिथ्याचरण नहीं होता ।”

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इस प्रकार स्वमंतव्यामन्तव्य में लिखा है कि “जो यथार्थ वक्ता, धर्मात्मा, सब के सुख के लिए प्रयत्न करता है,” उसी को ‘आप्त’ कहता हूँ ।

जैन मत के पुस्तक ‘विवेक सार’ के पृष्ठ १०६ में लिखा है कि ‘श्री कृष्ण तीसरे नरक में गया’ इस पर महर्षि लिखते हैं कि-

“श्री कृष्णादि महाधार्मिक महात्मा, सब नरक को गए, यह कितनी बड़ी बुरी बात है ?” (सत्यार्थप्रकाश, समु० ११)

“फिर उसी के सम्बन्ध में, महात्मा श्री कृष्ण आदि तीसरे नरक को गए, यह कितनी मिथ्या बात है ?” (सत्यार्थप्रकाश, समु० ११)

“जो यह भगवान न होता तो श्री कृष्णजी के सदृश महात्माओं की झूठी निंदा कैसे होती ?” (सत्यार्थप्रकाश, समु० ११) 

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“यदा यदा ही धर्मस्य” गीता के इस श्लोक की व्याख्या करते हुए और यह बतलाते हुए कि क्या श्री कृष्णजी धर्म का लोप होने पर युग-युग में शरीर धारण करते है ? ऋषिवर लिखते है –

“यह बात वेद विरुद्ध होने से प्रमाण नहीं और ऐसा हो सकता है कि श्री कृष्ण धर्मात्मा थे और धर्म की रक्षा करना चाहते थे कि मैं युग-युग में जन्म लेके श्रेष्ठो की रक्षा और दुष्टों का नाश करूँ, तो कुछ दोष नहीं क्योंकि “परोपकाराय सतां विभूतय:” परोपकार के लिए ही सत्पुरुषों का तन, मन, धन होता है ।” (सत्यार्थप्रकाश, समु० ७)

“श्री कृष्णजी एक भद्र पुरुष थे, उनका महाभारत में उत्तम वर्णन किया हुआ है

परन्तु भागवत में उन्हें सब प्रकार के दोष लगाकर दुर्गुणों का बाजार गरम कर रखा है ।” (उ० मं० पूना० का व्या० ईश्वर सिद्धि विषयक) 

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यादव कुल के विनाश के कारणों का वर्णन करते हुए ऋषिवर कहते हैं कि-

“इस प्रकार के उपद्रव जहाँ होने लगे, वहां श्री कृष्ण जैसे श्रेष्ठ पुरुषों की बात कौन सुने ?” (उ० मं० पूना० का व्या० इतिहास विषय)

श्री कृष्ण जी तो परम पद को प्राप्त हो गए, आप लोग कैसे जीवते बने हो ?” (वेद विरुद्ध मत खंडन)

श्री कृष्ण जी के सदृश पराक्रम आप लोगों में क्यों नहीं दिख पड़ता ?” (वेद विरुद्ध मत खंडन)

  • वैदिक धर्मी

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