गुरु जी और चेला साथ रहिये और साथ खाइए कहानी’

मिलकर रहिये बाँट कर खाइए

गुरु जी और चेला

एक चेला था । उसने अपने गुरु से पूछा-“महाराज! संसार में रहने का क्या ढंग है ?”

गुरु ने कहा-“अच्छा प्रश्न किया है तूने । एक-दो दिन में उत्तर देंगे ।” दूसरे दिन गुरु जी के पास एक व्यक्ति कुछ फल और मिठाइयाँ लेकर आया । उसने सब वस्तुएं महात्मा जी के सामने रखकर उन्हें प्रमाण किया और उनके पास बैठ गया । महात्मा जी ने उस व्यक्ति से बात भी नहीं की । पीठ मोड़ी, सब के फल खा लिये, मिठाई भी कहा ली । वह व्यक्ति सोचता रहा-‘यह विचित्र साधु है ! वस्तुएं तो सब खा गया, परन्तु मैं जो सब कुछ लाया हूँ, मेरी ओर देखते भी नहीं ।’

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अंत में वह क्रुद्ध होकर उठा और बडबडाता हुआ चला गया । उसके जाने के पश्चात महत्मा ने चेले से पूछा-“क्यों भाई ! क्या कहता था वह व्यक्ति ?” शिष्य ने कहा-“महाराज ! वह तो क्रुद्ध था । कहता था-“ मेरी वस्तुएं तो खा लीं, और मुझसे बोले तक नहीं ।” महात्मा बोले-“तो सुन । संसार में रहने का यह ढंग नहीं । कोई दूसरा ढंग सोचना चाहिए ।

थोड़ी देर पश्चात एक दूसरा व्यक्ति आया । वह भी फल और मिठाइयाँ ले कर आया । फल और मिठाइयों को साधु के सामने रख कर वह बैठ गया । साधु ने फल और मिठाइयों को उठाकर, साथ वाली गाली में फैंक दिया और उस व्यक्ति से बड़े प्यार और सम्मान के साथ बातें करने लगे-“कहो जी, क्या हाल है? परिवार अच्छा है ? कारोबार तो अच्छा है ? बच्चे ठीक है ? पढ़ते है न ? बहुत अच्छा करते हो, उन्हें खूब पढाओं । तुम्हारा अपना शरीर तो ठीक है ? मन तो प्रसन्न रहता है ? भगवान् का भजन तो करते हो ? शरीर अच्छा होम चित प्रसन्न हो और प्रभु-भजन में मन लगे तो फिर मनुष्य को चाहिए ही क्या !” साधु इस प्रकार की मीठी मीठी बातें करते रहे और वह व्यक्ति मन ही मन कुढ़ता रहा-‘यह विचित्र साधु है ! मुझसे बातें तो मीठी मीठी करता है, परन्तु मेरी वस्तुओं का इस ने अपमान कर दिया । इस प्रकार फैन दिया, जैसे उन में विष पड़ा हो ।’

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वह भी बडबडाता हुआ चला गया तो महात्मा ने हेले से पूछा- “क्यों भाई, यह तो प्रसन्न हो गया ?” शिष्य ने कहा-“नहीं महाराज ! यह तो पहले व्यक्ति से भी अधिक क्रुद्ध था । कहता था- मेरी वस्तुओं का अपमान कर दिया ।” महात्मा बोले-“तो सुन भाई ! संसार में रहने का यह ढंग भी ठीक नहीं । अब कोई और विधि सोचनी होगी ।”

तभी एक सज्जन वहां आये । वे भी और मिठाई लाये । साधु के समक्ष रखकर बैठ गए । साधु ने बहुत प्यार से उसके साथ बात की । उन वस्तुओं को आस-पास बैठे लोगों में बाटा । कुछ मिठाई उस व्यक्ति को भी दी, कुछ स्वयं भी खायी । उस के घर बार और परिवार की बातें करते रहे । उसे अच्छी अच्छी कथाएं सुनाते रहे । जब वह भी गया तो महात्मा ने पूछा-“क्यों भाई ! वह व्यक्ति क्या कहता था ?” शिष्य ने कहा- “वह तो बहुत प्रसन्न था, महाराज ! आप की बहुत प्रशंसा करता था । कहता था-“ऐसे साधु से मिलकर चित्त प्रसन्न हो गया ।”

महात्मा बोले-“तो सुने बेटे ! संसार में रहने का ढंग यही है । स्मरण रख, प्रभु ने जो कुछ दिया है उसे बाँट कर खहा, त्याग भाव से भोग और इस के साथ ही साथ भगवान से प्रेम भी कर । उस के नाम का भजन कर । उस का ध्यान कर । जो व्यक्ति सम्पर्क में आये उन के साथ मीठी और हितकारी बातें कर ।”

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  • वैदिक धर्मी

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