गुरु शिष्य परम्परा के पतन से भारत पतन की ओर अग्रसर कैसे ?

गुरु शिष्य परम्परा के खत्म होने से भारत गुलामी की ओर अग्रसर कैसे ?

भारतवर्ष में गुरु को प्राचीनकाल से ही ईश्वर के समान दर्जा दिया गया है। यहाँ पर गुरु को आदर दिया जाता है क्योंकि आने वाले कल का निर्माण आज गुरु की दी हुई शिक्षाओं पर निर्भर होता है । आज समाज पतन की ओर अग्रसर है क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में सही से काम नहीं हो रहा, बच्चों को संस्कारित नहीं किया जा रहा । नैतिक शिक्षा ना देकर, शिक्षा को व्यवसाय बना दिया । हमारे यहाँ एकलव्य जैसे शिष्य हुए जिसने बिना शंका, दुःख के मात्र अपने गुरु की इच्छा से ही अपना अंगूठा गुरु द्रोण की भेंट कर दिया था। पूज्य श्री दयानन्द सरस्वती जी! जिन्होंने अपने गुरु की इच्छा को तन-मन से पूर्ण किया जब श्री विरजानन्द जी ने कहा कि मुझे गुरु दक्षिणा के रूप में यह वचन चाहिए कि तुम अपनी अंतिम श्वास तक स्वदेश सेवा करो। उसी क्षण से महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने तूफानी दौरे शुरू किये, यदि स्वामी जी ना होते तो 1857 की क्रांति शायाद संभव नहीं होती। गुरु शिष्य परम्परा चाणक्य नीतिः एक बड़ा अर्थशास्त्र कैसे है ?

परम्परा के विपरीत परिमाण :-

इसके अतिरिक्त श्री दयानन्द जी द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश को पढ़कर असंख्य क्रांतिकारी वीरों ने उनको अपना गुरु माना है जिसमें राम प्रसाद बिस्लिम, लाला लाजपतराय, भगत सिंह जैसे अनेकों वीरों ने देश को स्वतंत्र करवाया किन्तु आज देश की विडम्बना देखिए आज बच्चे शिक्षकों का अनादर कर रहे है। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि बच्चे अपने अध्यापकों को जान से भी मार रहे है। नित्य नई-नई खबरे ह्रदय पर आघात कर रही है। शिक्षक कुकर्मी हो रहे है, बच्चियों को हवस का शिकार बनाया जा रहा है। 1 जनवरी मनाने का रहस्यमयी कारण ?

जब तक मैकाले शिक्षा पद्धति चलती रहेगी तब तक ऐसे ही समाज का पतन होता रहेगा। पुन: देश को आर्यावर्त बनाने के लिए गुरुकुल शिक्षा पद्धति अपनानी चाहिए। शिक्षको को गुरु द्रोण जैसा बनना होगा, और दयानन्द और एकलव्य जैसे शिष्यों को फिर से निखारना होगा। किसी भी देश की रीढ़ की हड्डी है उस देश की शिक्षा व्यवस्था अगर ये रीढ़ की हड्डी टूट गयी या इसका आकार बिगड़ गया तो परिणाम भयंकर हो सकते है।  सृष्टि काल की गणना और सृष्टि का जन्म कैसे ?

गुरुकुलों को बढ़ावा क्यों ?

गुरु शिष्य परम्परा को बढ़ावा देने के लिए अगर आज के इस भौतिक युग में गुरुकुलों को बढ़ावा नहीं मिला तो भारत के गुलामी वर्ष फिर से दोहराए जा सकते है। बच्चों के शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक विकास की उन्नति गुरुकुलों पर निर्भर है। जबकि आज के समय में स्कूलों में इसाई मिशनरीज का प्रभुत्व ज्यादा देखने को मिलता है। मैकाले ने गुरुकुलों की शिक्षा को जैसे खत्म ही कर दिया है। बच्चों का इन स्कूलों में केवल भौतिक और आत्मिक विकास हो रहा है और उन्हें मानसिक रूप से गुलाम बनाया जा रहा है। जिसके चलते हर रोज नये-नये हत्यारे, आतंकवादी, देशद्रोही उभर करे आ रहे है । जिसका परिणाम यह हुआ है कि भारत में भारत का भविष्य भारत विरोधी नारे लगा रहा है। अपने ही लोग देश को खोखला कर रहे है। इसी प्रकार अगर गुरुकुल भी विलुप्तप्राय हो गए तो इस देश का गौरवशाली वजूद मिटा दिया जायेगा । गुलामी अपने शिकंजे कस लेगी । भारत को एक बार फिर गुलामी का सामना करना पड़ेगा। जिसके कुछ कुछ परिणाम आज हमारे सामने है।

 

  • वैदिक धर्मी  गुरु शिष्य परम्परा

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