ग्रन्थ जो हिन्दू धर्म के प्राचीन और प्रेरणादायक होने का आधार है ?

हिन्दू धर्म पर आधारित ग्रन्थ

ग्रन्थ :-

चार वेद :-

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद । चारों वेदों का ज्ञान सृष्टि के आरम्भ में पूर्ण ज्ञानवान परमेश्वर ने क्रमश: चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य, अंगीरा को दिया । उन्होंने ज्ञान ब्रह्मा को दिया । फिर आगे आगे अन्य ऋषि मुनियों और मनुष्यों तक पहुंचा जो आज तक चला आ रहा है ।वह सब सत्य ज्ञान जिसकी मनुष्य को जरुरत हो सकती है मूल रूप में वेदों में विद्यमान है । तिनके से लेकर मनुष्य, पशु, पक्षी, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र, तारे, आत्मा, परमात्मा सबका यथार्थ ज्ञान वेदों में है । मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो बिना सिखाएं नहीं सीखता । इसलिए सृष्टि के आरम्भ में इसे सिखाने की आवश्कयता थी जिसे केवल ईश्वर ही पूरा कर सकता था तथा उसने पूरा किया ।

वेदों की संख्या कितनी है और रचना किसने की प्रमाण सहित ?

चारों वेद उसी शुद्ध रूप में अब तक सुरक्षित हैं तथा उपलब्ध हैं । वेदों में मिलावट करने का किसी को दुस्साहस नहीं हुआ तथा न ही किसी मनुष्य में ऐसी योग्यता ही हो सकती है । हां, बहुत से लोगों ने अर्थ के नाम पर इनका अनर्थ कर दिया है जिनमें मैक्समूलर जैसे विदेशी तथा महिधर्म सायण जैसे स्वदेशी शामिल हैं । इनमें से कुछ ने तो देश्वश तथा कुछ ने अज्ञानवश ऐसा किया है । यही कारण है कि पिछले कुछ समय से वेदों के प्रति अश्रद्धा तथा भ्रांतियां बढ़ गई हैं । मानव समाज का सौभग्य जानिए कि दयानन्द सरस्वती के रूप में एक महान ऋषि यहाँ आये जिन्होंने वेदों का विशुद्ध रूप हमारे सामने रखा जिससे वेदों के ज्ञान का प्रचार तथा वेदों के प्रति श्रद्धा कुछ कुछ फिर बढ़ने लगी हैं ।

सृष्टि के आरम्भ में बने होने के कारण वेदों में कोई भी किसी भी प्रकार का भी इतिहास नहीं हैं । वेद केवल ज्ञान के ग्रन्थ हैं । चारों वेदों में कुल मिलाकर बीस हज़ार दो सौ तेरह मंत्र है । वेदों में सब बारें बुद्धि और तर्क संगत है तथा सृष्टि नियम के अनुकूल है । वेदों की भाषा संस्कृत तथा लिपि देवनागरी है । ब्राह्मण ग्रन्थ वेदों की व्याख्या के ग्रन्थ है । छ: शास्त्र भी विद्या के ग्रन्थ है ।

मनुस्मृति :-

सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा ऋषि हुए । उनके पुत्र विराट तथा विराट के पुत्र मनु हुए जिन्होंने मनुस्मृति लिखी । मनुस्मृति में कुछ लोगों ने दुष्टा और स्वार्थ के कारण मिलावट कर दी हैं । मूल मनुस्कृति वेदानुकुल होने से स्वीकार करने योग्य है । मनुस्मृति में मानवोपयोगी बहुत से विषयों पर प्रकाश डाला गया है । मनुस्मृति को न पढने और न जानने तथा कुछ मिलावारों के कारण भ्रांतियां फैली हैं । वास्तव में मनुस्मृति ज्ञान का भण्डार हैं । वेद के पश्चात् मनुस्मृति ही एक ऐसा ग्रन्थ है जिसको पढने से अज्ञान अंधकार दूर हो जाता है ।

वेद, वेदांग, शाखाएं क्या है और इनका हिन्दू धर्म में क्या महत्व है ?

मनुस्मृति संस्कृत भाषा में है ।

उपनिषद :-

ग्यारह हैं – ईश, केन, कठ प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक तथा श्वेताश्वर । उपनिषदों में आत्मा-परमात्मा का ज्ञान जिसे आध्यात्मवाद कहते हैं, विस्तार से कथा कहानियों के माध्यम से बड़े ही सरल तथा स्पष्ट ढंग से दिया गया है । उपनिषदों के ज्ञान का मूल वेद है । उनकी भाषा तथा व्याख्यान का ढंग ऐसा है जो साधारण मनुष्यों को भी ग्रहण करना मुश्किल नहीं । ये ग्रन्थ प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों ने वनों में योगाभ्यास तथा चिंतन करते हुए वेद के ज्ञान के अनुसार अपने अनुभव के आधार पर रचे थे । उपनिषद् संस्कृत भाषा में लिखे हैं । अब संसार की बहुत सी भाषाओँ में इनका अनुवाद हो चुका है । स्वदेशियों के अतिरिक्त बहुत विदेशियों ने भी उपनिषदों को अत्यंत सराहा हैं ।

तलाक के विषय में वेद क्या कहते हैं क्या तलाक लेना-देना उचित है ?

औरंगजेब का भाई दाराशिकोह संस्कृत भाषा  प्राचीन-साहित्य से बहुत प्रभावित हुआ था । उसने उपनिषदों का फारसी भाषा में अनुवाद भी किया था ।

वाल्मीकि रामयाण :-

यह हमारा गौरवमय इतिहास ग्रन्थ है, जिसमें बहुत ज्ञान भरा हुआ है । श्री  राम का आदर्श अनुकरणीय जीवन हमारे सामने आता है । श्री रामचंद्र जी के समकालीन महर्षि वाल्मीकि ने ये  ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखा था । मूल बाल्मीकि रामायण में पांच कांड थे । अंत में उत्तर कांड किन्ही दुष्ट स्वार्थी लोगों में मिला दिए है । अन्य स्थानों पर भी मिलावटें हुई है जिन्हें बुद्धिमान व्यक्ति पहचानकर त्याग देते है । भगवान राम त्रेतायुग की समाप्ति के समय हुए थे । जिसे लगभग नौ लाख वर्ष व्यतीत हो चुके हैं । इतना ही समय वाल्मीकि रामायण को बने हो गया है ।

यज्ञ का वेदों में क्या महत्व है और इसका लाभ क्या है ?

तुलसीदास कृत ‘रामचरित्र मानस’ अब से लगभग चार सौ वर्ष पहले लिखी गई थी । उनमें बहुत से बातें वाल्मीकि रामायण के विपरीत, वेदज्ञान तथा सृष्टि नियम के विरुद्ध लिखी है । इसलिए रामचरित मानस की बजाएं वाल्मीकि रामायण ही पढ़ी जानी चाहिए ।

महाभारत :-

यह भी हमारा इतिहास ग्रन्थ है । श्री कृष्ण की सूझबूझ तथा नीतिमत्ता हमारे लिए मार्गदर्शन हैं । भीष्म पितामह का राजधर्म पर उपदेश अनुकरणीय है । परिवार की आपसी लड़ाई कितनी घातक हो सकती है । यह भी इस ग्रन्थ से भली भांति ज्ञात हो जाता है । मूल ग्रन्थ महर्षि वेद व्यास ने ‘जय’ नाम से संस्कृत भाषा में रचा था । इस ग्रन्थ में अब बहुत मिलावट ही गई है । आज से लगभग पंद्रह सौ वर्ष पूर्व राजा भोज हुए है । उन्होंने अपने बनाएं ‘संजीवनी’ नाम के इतिहास में लिखा है कि व्यास जी ने चार हजार सौ और उनके शिष्यों ने पांच हजार छ: सौ अर्थात् कुल दस हजार श्लोकों का पुस्तक ‘भारत’ बनाया था । वह महाराजा विक्रमादित्य के समय में बीस हजार, महाराज भोज कहते है की मेरे पिता के समय में पच्चीस और मेरी आधी उम्र में तीस हजार श्लोक वाला महाभारत मिलता है । ऐसा सुना है कि अब सन् 2000 में जो महाभारत मिलता है । उसमें लगभग एक लाख श्लोक हैं । इस प्रकार की मिलावटों ने हमारे वीरतापूर्ण इतिहास को बिगाड़ करके हमें कायर, दब्बू और कमजोर बना दिया है । आज के समय मे महाभारत मेन दो लाख दस हजार श्लोक संग्रह पाया जाता है  ।

वैदिक धर्म और अन्य मत, पंथ, सम्प्रदाय या मजहब में भेद क्यों व कैसे ?

उसी ‘संजीवनी’ पुस्तक में लिखा है कि राजा भोज के राज्य में व्यास जी के नाम से    और शिव पुराण किसी ने बना दिए । उसका समाचार राजा भोज को मिला । तो राजा ने दण्ड स्वरूप उन पंडितों के हाथ कटवा दिए और कहा कि जो कोई ग्रन्थ बनावे वह अपने नाम से बनावे, ऋषि-मुनियों के नाम से नहीं ।

सत्यार्थप्रकाश :-

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने यह ग्रन्थ सन  में बनाया था । मनुष्य को जन्म से लेकर मरण तक जो जो करने योग्य काम है तथा जो न करने योग्य है उनका विवरण वेद के अनुसार दिया गया है । संसार में प्रचलित हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन सभी मतमतान्तरों की कमियां बताकर सभी मनुष्यों को सन्मार्ग से बी भटकने के लिए सचेत किया गया है । ज्ञान की आँखें खोलने वाला तथा बुद्धि को सक्रिय बनाने वाला यह ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ ने सभी मजहबों के करोड़ों लोगों में वैचारिक क्रांति पैदा कर दी है । यह संस्कृत ग्रन्थो के प्रमाणों सहित आर्या भाषा में लिखा हुआ है । अब बहुत से स्वदेशी तथा वेदिशी भाषाओँ में इसका अनुवाद हो चूका है ।

स्त्री के तीन स्वरूप कौन-कौन से है और इनका क्या महत्व है ?

वीर सावरकर के ‘सत्यार्थप्रकाश’ के सम्बन्ध में उद्गार “हिन्दू जाती की ठंडी रगों में गर्म खून का संचार करने वाला या ग्रन्थ अमर रहे, यह मेरी कामना है । ‘सत्यार्थप्रकाश’ की विद्यमानता में कोई विधर्मी अपने मजहब की शेखी नहीं मर सकता।”

वैदिक धर्मी

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