चरक द्वारा लिखित “चरक संहिता” आज भी प्रख्यात क्यों है ?

महर्षि चरक द्वारा लिखित ‘चरक संहिता’ का उपयोग कैसे और क्यों ?

चरक :-

शताब्दियों से आयुर्वेद चिकित्साशास्त्र के आचार्य के रूप में प्रख्यात चरक के जन्म-समय, जन्म-स्थान आदि बातों के विषय में हमें कोई स्पष्ट जानकारी प्राप्त नहीं है । इतिहास चरक के जन्म के विषय में मौन है । हराक द्वारा आयुर्वेद-चिकित्साशास्त्र पर लिखा हुआ ग्रन्थ ‘चरक संहिता’ आज भी आयुर्वेद के छात्रों को पाठ्य पुस्तक के रूप में पढाया जाता है । फ्रेंच विद्वान् सिल्वान लेवी का कथन है –“बौद्ध धर्मग्रन्थ त्रिपिटक का चीनी अनुवाद मुझे देखने को मिला । उसमें चरक का नाम मिलता है, जो भाषण के कुषाण-सम्राट कनिष्क के राजवैद्य थे । सन 200 में कनिष्क भारत के सम्राट थे ।” इतिहासकारों के अनुसार कुषाण-सम्राट कनिष्क प्रथम शताब्दी ईसवीं में उत्तर भारत के शासक थे तथा चरक नमक वैद्य उनकी राजसभा में रहते थे । कुछ विद्वान इसमें संदेह करते हैं कि ‘चरक संहिता’ की रचना करने वाले चरक वही थे । कनिष्क के बौद्ध धर्मानुयायी होने के कारण उसके राजवैद्य चरक का भी उल्लेख किये जाने के कारण कुछ विद्वान् ‘चरक संहिता’ के रचनाकार चरक का प्रसिद्द व्याकरणाचार्य पाणिनि से पूर्व होना मानते है । चरक के ग्रन्थ ‘चरक संहिता’ पर पतंजली ने भाष्य लिखा था । वह आज भी उपलब्ध है । पतंजलि का जीवन-काल कम-से-कम १७५ ई.पू. माना जाता है । अत: चरक उससे पूर्व अवश्य रहे होंगे । कुछ लोगों द्वारा पाणिनि का काल लगभग 700 ई.पू. माना गया है । अत: चरक उससे भी पूर्व रहे होंगे ।

सृष्टि के आरम्भ में ज्ञान और भाषा की उत्पत्ति क्यों और कैसे हुई ?

‘चरक संहिता’ आयुर्वेद का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है । वह संस्कृत भाषा में है तथा गद्य और पद्य दोनों में लिखा गया है । आत्रेय के छ: शिष्यों द्वारा रचित आयुर्वेद-ग्रंथों में अग्निवेश का ग्रन्थ प्रसिद्द हुआ । अग्निवेश के इस ग्रन्थ को कालान्तर में चरक ने नए ढंग से लिखकर कश्मीर के एक वैद्य दृढ़बल ने ‘चरक संहिता’ के एक अधूरे भाग का सम्पादन किया ।

‘चरक संहिता’ पर ग्यारहवीं शताब्दी से सोलहवीं शताब्दी तक चक्रपाणी, श्रीकंठ, वाचस्पति, कंठदत्त इत्यादि कई विद्वानों ने टीकाएँ लिखी तथा एकमत होकर सबने चरक को आयुर्वेद-चिकित्साविज्ञान का महान विद्वान् स्वीकार किया । कालान्तर में उनके ज्ञान से प्रभावित होकर विद्वानों ने उन्हें अवतार मानना आरम्भ किया । उनके मत में-“नागों के राजा शेषनाग ने, जो समस्त वेदों के ज्ञाता हैं, ऋषिपुत्र के रूप में जन्म लिया और घूम-घूमकर लोगों को आयुर्वेद का ज्ञान दिया ।” ‘चर’ शब्द का साधारण शब्द  अर्थ है- चलना । अत: ऐसा प्रतीत होता है कि दूर-दूर तक भ्रमण कर लोगों को शिक्षा देने के कारण ही उनका नाम ‘चरक’ पड़ा होगा ।

स्मृति क्या है व मनुस्मृति कौन-से संविधान पर आधारित है ?

आयुर्वेद के ग्रंथों को आठ खंडो तथा १२० अध्यायों में बिभाजित करने की परम्परा का निर्वाह चरक संहिता में भी किया गया है । चरक-संहिता के प्रथम खण्ड ‘सूत्र स्थान’ में  औषधी-विज्ञान, आहार, पथ्य तथा शारीरिक एवं मानिसक रोगों की चितित्सा का उल्लेख किया गया है । द्वितीय खण्ड ‘निदान स्थान’ में प्रमुख रोगों के कारण स्पष्ट किये गए है । तीसरे खण्ड में ‘विमान स्थान’ में शरीरवर्धक भोजन का ज्ञान कराया गया है ।  चौथे खण्ड ‘शरीर स्थान’ में शारीरिक रचना का वर्णन किया गया है । पांचवें खण्ड ‘इन्द्रिय स्थान’ में रोगों की चिकित्सा का उल्लेख है । छठे खण्ड ‘चिकित्सा स्थान’ में कुछ विशेष रोगों की चिकित्सा का उल्लेख है । सातवें खण्ड ‘कल्प स्थान’ तथा आठवें खण्ड ‘सिद्धि स्थान’ में विशेष उपचारों का उल्लेख किया गया है ।

आयुर्वेद की दृष्टि से तो चरक संहिता एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है ही, साथ ही तत्कालीन समाज की जानकारी में भी यह ग्रन्थ बड़ा सहायक और उपादेय है । इस ग्रन्थ में चरक ने आयुर्वेद औषधियों के अतिरिक्त अन्य कई बातों का भी ज्ञान प्रदान किया है । उनका मत है की आयुर्वेद की शिक्षा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य प्राप्त कर सकते है । ब्राह्मणों को आयुर्वेद का ज्ञान धन अर्जित करने के लिए नहीं, वरन लोगों के उपकार के लिए प्राप्त करना चाहिए । क्षत्रियों का कर्तव्य है कि इस विद्या का ज्ञान प्राप्त कर अपना स्वास्थ्य ठीक रखें जिससे शत्रुओं से देश की रक्षा कर सकें । इस विद्या को पाकर वैश्य के धन अर्जित करने में चरक कोई दोष नहीं मानते । चरक के इस ग्रन्थ ‘चरक संहिता’ का अनुवाद अरबी भाषा में भी किया गया था ।

उपांग क्या और कितने है यह विद्या का प्रमाण कैसे है ?

वर्तमान काल में चिकित्सा-विज्ञान का अध्ययन समाप्त कर डॉक्टर बनने वाले प्रत्येक छात्र को ‘हिप्टोक्रेटस की शपथ’ नमक एक शपथ लेनी पड़ती है । हिप्टोक्रेटस प्राचीन यूनान का एक प्रसिद्द चिकित्सक था । प्राचीन काल में भारत में वैद्य का व्यवसाय करने वालों को भी शपथ लेनी पड़ती थी । इस सम्बन्ध में चरक संहिता में कुछ निर्देश और प्रतिज्ञाएँ दी गयी है । आयुर्वेद के छात्रों के लिए चरक ने लिखा है कि विद्यार्थी को चाहिए की स्नान-ध्यान कर अपने शरीर को पवित्र करें । यज्ञ द्वारा देवताओं को प्रसन्न करे, फिर गुरु का आशीर्वाद लेकर यह प्रतिज्ञा करे-“मैं आजन्म ब्रह्मचारी रहूँगा । ऋषियों की भांति मेरी वेश-भूषा होगी । किसी से द्वेष न रखूँगा । सादा भोजन करूँगा । हिंसा नहीं करूँगा । रोगियों की उपेक्षा नहीं करूँगा । उनकी सेवा अपना धर्म समझूंगा । जिसके परिवार में जाकर रोगी की चिकित्सा करूँगा, उसके घर की बात मैं बाहर नहीं कहूँगा । अपने ज्ञान पर घमंड नहीं करूँगा । गुरु को सदा गुरु मानूंगा ।” इस प्रकार चरक के मतानुसार, विद्य को रोगियों से किसी दशा में शत्रुता नहीं रखनी चाहिए । रोगी के घर की बातों को बाहर नहीं बताना चाहिए । आयुर्वेद का पंडित होना सरल नहीं होता है, अत: उसे सदैव ज्ञान की खोज में तत्पर रहना चाहिए । ‘चरक संहिता’ में इन प्रतिज्ञाओं की सूची बड़ी विस्तृत है । उसमें से ये प्रतिज्ञाएँ सक्षेप में यहाँ प्रस्तुत की गयी है । यही नहीं, चरक ने इस ग्रन्थ में छात्रों के कर्तव्यों का भी विस्तृत वर्णन किया है ।

चरक ने ‘चरक संहिता’ में बालक की उत्पत्ति और विकास का वैज्ञानिक ढंग से वर्णन किया है तथा शरीर के विभिन्न अंगों की बनावट और उनके कार्य, भांति-भांति के राग, उनके लक्षण तथा उपचार, आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों, के नाम, उनके  गुण तथा किस रोग पर कौन-सी औषधी गुणकारी सिद्ध होगी, आदि बातों का विस्तृत वर्णन किया है । इस प्रकार चरक शास्त्र की विभिन्न शाखाओं-शल्य-चिकित्सा, प्रसव-विद्या और मानोचिकित्सा-से परिचित थे । आयुर्वेद चिकित्सा-जगत में उनका नाम सदैव अमर रहेगा ।

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  • वैदिक धर्मी

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