Chanakya Niti, चाणक्य नीति: भाग-2; हिंदी व्याख्या 21 से 40 श्लोक

चाणक्य नीति (chanakya niti):   (हिंदी व्याख्या सहित)

21.    जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति |
अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते पितर: स्मृता: ||

जन्म देने वाला पिता, यज्ञोपवित कराने वाला गुरु, विद्या देने वाला अध्यापक, अन्न देने वाले और भय से मुक्त रखने वाले पांच व्यक्तियों को पितर माना गया है| (चाणक्य नीति श्लोक २१)

22.   राजपत्नी गुरो: पत्नी मित्रपत्नी तथैव च |
पत्निमाता स्वमाता च पञ्चैते मातर: स्मृता: ||

राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, पत्नी की माता अर्थात् सास और जन्म देने वाली अपनी माता- ये पाँच माताएँ मानी गई है|(चाणक्य नीति श्लोक २२)

23.   एकोदरसमुद्भूता एक नक्षत्रजातका: |
न भवन्ति समा: शीले यथा बदरिकण्टका: ||

एक ही माता के गर्भ और एक ही नक्षत्र में उत्पन्न हुई संतान गुण, क्रम और स्वभाव से एक जैसे नहीं होते जैसे बेर वृक्ष में फल और उनके कांटे |(चाणक्य नीति श्लोक २३)

24.   नाऽस्ति कामसमो व्याधिर्नाऽस्ति मोहसमो रिपु: ।
नाऽस्ति कोपसमो वह्रिर्नाऽस्ति ज्ञानात् परं सुखम् ।।

कामवासना के समान दूसरा कोई रोग नहीं। मोह के समान कोई शत्रु नहीं। क्रोध जैसी कोई आग नहीं और ज्ञान से बढ़कर सुख देने वाली कोई वस्तु नहीं।(चाणक्य नीति श्लोक २४)

25.   अभ्यासादधा्र्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते।
गुणेन ज्ञायते तवार्य: कोपो नेत्रेण गम्यते ।।

अभ्यास से विद्या को प्राप्त किया जा सकता है। उत्तम गुण और स्वभाव से कुल का गौरव बढ़ता है। श्रेष्ठ पुरुष की पहचान अच्छे गुणों से होती है और आंखे देखकर क्रोध का ज्ञान होता हैं।(चाणक्य नीति श्लोक २५)

26.   वित्तेन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।
मृदुना रक्ष्यते भूप: सति्स्त्रया रक्ष्यते गृहम् ।।

धर्म की रक्षा धन से की जाती है। विद्या को योग साधना के द्वारा बचाया जा सकता है। मृदुल स्वभाव से राजा की रक्षा होती है। और सच्चरित्र स्त्रियाँ घर की रक्षक है।(चाणक्य नीति श्लोक २६)

Chanakya niti:-   (हिंदी व्याख्या सहित)

27.     दारीद्नाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम् ।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी।।    www.vedicpress.com

दान देने से दरिद्रता नष्ट होती है, शालीनता से कष्ट दूर होते हैं, बुद्धि से अज्ञान नष्ट होता है, इसी तरह ईश्वर की भक्ति से भय दूर होता है।(चाणक्य नीति श्लोक २७)

28.    न पश्यति च जन्मान्ध: कामान्धो नैव पश्यति।
न पश्यति मदोन्मत्तो ह्यर्थी दोषान् न पश्यति ।।

जन्म से अंधे व्यक्ति को कुछ दिखाई नही देता, कामान्ध व्यक्ति को भी भला-बुरा नहीं सूझता, नाश में मस्त व्यक्ति कुछ नहीं सोच पाता, इसी प्रकार स्वार्थी व्यक्ति भी बुराइयों को नहीं देखता।(चाणक्य नीति श्लोक २८)

29.    भ्रमन् सम्पूज्यते राजा भ्रमन् सम्पूज्यते द्विज: ।
भ्रमन् सम्पूज्यते योगी स्त्री भ्रमन्ती विनश्यति ।।                 www.vedicpress.com

अपनी प्रजा में घूम-फिर कर उनके कष्टो को दूर करने वाला राजा सम्मानित होता है, जो विद्वान देश-प्रदेश में ज्ञान का प्रचार करता है, उसकी पूजा होती हौ, जो योगी एक स्थान पर नहीं टिकता, सब स्थानों पर घूमता रहता है, वह आदर-सत्कार पाता है, परंतु भ्रमण करने वाली स्त्री भ्रष्ट हो जाती है।(चाणक्य नीति श्लोक २९)

30.   संतोषाऽमृत- तृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम् ।
न च तद् धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम् ।।

व्यक्ति को संतोष-रूपी अमृत से तृप्त होने पर जो सुख-शांति मिलती है, वह धन की प्राप्ति के लिए इधर-उधर भटकने से प्राप्त नहीं हो सकती।(चाणक्य नीति श्लोक ३०)

31.   सिंहादेकं बकादेकं शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात ।

वायसात्पञ्च शिक्षेच्च षट् शनुस्त्रिणि गर्दभात् ।।                  www.vedicpress.com

शेर और बुगले से एक-एक गुण, गधे से तीन, मुर्गे से चार, कौए से पांच गुण और कुत्ते से छह गुण सीखे जा सकते हैं । आगामी चार शलोकों में इनका वर्णन किया गया है ।(चाणक्य नीति श्लोक ३१)

 

32.   प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नर: कर्तुमिच्छति ।

सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते ।।

कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे पूरी शक्ति लगाकर करना चाहिए। जैसे सिंह अपने हर शिकार को कभी नहीं छोड़ता।(चाणक्य नीति श्लोक २१)

चाणक्य नीति:-   (हिंदी व्याख्या सहित)

33.    इन्द्रियाणि च संयम्य बक्वत् पण्डितो नर: ।

देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत् ।।            www.vedicpress.com

बुद्धिमान व्यक्ति को अपनी इन्द्रियों को वश में करके बुगले के समान पूरी एकाग्रता से अपने कार्य को सिद्ध करना चाहिए ।(चाणक्य नीति श्लोक ३३)

 

34.    प्रत्युत्थानं च युद्धं च संविभागं च बन्धुषु ।

स्वयमाक्रम्य भुक्तं च शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्।।

सूर्योदय से पहले जागना, युद्ध के लिए सदा तैयार रहना, अपने बंधुओं को उनका उचित हिस्सा देना और स्वयं आक्रमण करके अपना भोजन प्राप्त करना- ये चार बातें मुर्गे से सीखनी चाहिए ।(चाणक्य नीति श्लोक ३४)

 

35.    गूढं च मैथुनं धाष्ट्र्यं काले च संग्रहम् ।

अप्रमत्तविश्वासं पञ्च शिक्षेच्च वायसात्।।                           www.vedicpress.com

गुप्त स्थान पर सम्भोग करना, ढीठ होना, समय-समय पर आवशयक वस्तुएं संग्रहित करना, निरंतर सावधान रहना और किसी दुसरे पर पूरी तरह विश्वास नहीं करना, ये पांच बाते कौए से सीखनी चाहिए ।(चाणक्य नीति श्लोक ३५)

 

36.    बहृाशी स्वल्पसंतुष्ट: सुनिद्रो लघुचेतन: ।

स्वामिभक्तश्च शूरश्च षडेते श्वनतो गुणाः ।।

कुत्ते को जब खाने को मिलता है, तो बहुत अधिक खाता है और जब उसे कुछ भी नहीं मिलता तो भी वह संतुष्ट रहता है। वह गहरी नींद सोता है, परन्तु थोड़ी-सी आहट होने पर एकदम जग जाता है। वह स्वामिभक्त होता है। स्वामी के प्रति वफादारी रखता है और लड़ने में जरा भी नहीं घबराता ।(चाणक्य नीति श्लोक ३६)

 

37.    सुश्रान्तोऽपि वहेद् भारं शीतोष्णं न च पश्यति ।

संतुष्टश्चरते नित्यं त्रीणि शिक्षेच्च गर्दभात्।।                        www.vedicpress.com

व्यक्ति को गधे से तीन बातें सीखनी चाहिए-अत्यंत थके हुए होने पर भी भोझ ढोना, सर्दी-गर्मी की चिंता न करना, सदा संतोष से विचरण करना ।(चाणक्य नीति श्लोक ३७)

 

38.   य एतान् विंशतिगुणानाचरिष्यति मानव: ।

कार्याऽवस्थासु सर्वासु अजेय: स भविष्यति।।

जो व्यक्ति उपरोक्त बीस गुणों को अपने आचरण में उतरता है, वह सभी कार्यों में विजय होता है। इन्हें अपनाने से व्यक्ति को किसी भी अवस्था में पराजय का सामना नहीं करना पड़ता है।(चाणक्य नीति श्लोक ३८)

 

39.    धन-धान्यप्रयोगेषु विद्यासंग्रहणेषु च ।

आहारे व्यवहारे च तयक्तलज्ज: सुखी भवेत् ।।              www.vedicpress.com

जो धन-धान्य के लेन-देन में, विद्या सिखने में, भोजन के समय तथा अन्य व्यवहारों में संकोच नहीं करता है, वह सुखी रहता है।(चाणक्य नीति श्लोक ३९)

 

40.    अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्जनम् ।

आत्मतुल्यबलं शत्रुं विनयेन बलेन वा ।।

बलवान शत्रु को उसके अनुकूल व्यवहार करके, दुर्बल शत्रु को अपनी शक्ति के द्वारा और समान बल वाले शत्रु को विनय या बल से वश में करना चाहिए ।(चाणक्य नीति श्लोक ४०)

 

  • वैदिक धर्मी

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