चित्तौड़ की रानी वीरा का निर्भीक आक्रमण

चित्तौड़ की रानी वीरा की निर्भीक विजय 

चित्तौड़ :- कभी-कभी परिस्थितियां ऐसा मोड़ लेती हैं कि पुरुष से अपनी रक्षा करनी पड़ती है। ऐसे घटनाएं हमें यह पाठ पढ़ाती हैं कि नारी अबला नहीं, सबला है। नारी को स्वयं को अबला नहीं समझना चाहिये। मन अगर मजबूर हो और बुद्धि में अगर सूझ-बुझ हो तो नारी युद्ध के मैदान में भी पुरुष से बहादुर सिद्ध होती है । इसका उदहारण है- ‘वीरा’ । वीर, जैसा नाम, वैसा गुण ! वास्तव में जो कार्य उसने कर दिखाया वह वीरता, साहस और पराक्रम से भरा था । यही कारण है कि उसका नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है। www.vedicpress.com

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वीर चित्तौड़ के राणा उदयसिंह की उपपत्नी थी अर्थात् महारानी के अधिकार से वंचित एक साधारण स्त्री। किन्तु उसने जो महान कार्य कर दिखाया उससे वह प्रसिद्द में विशेष बन गयी। बादशाह अकबर Badshah Akbar ने राजगद्दी पर बैठने के बाद अपने साम्राज्य का विस्तार करने की योजनाए बनायीं। चारों दिशाओं के अधिकांश राज्यों को उसने अपने अधीन कर लिया। किन्तु मेवाड़ Mewad/चित्तौड़ का साम्राज्य उसके काबू नहीं आ रहा था। उस समय चित्तौड़ (Distt. of Rajasthan State) स्वंत्रता और स्वराज्य का प्रतिक बना हुआ था। चित्तौड़ को अपने अधीन करने के लिए अकबर विशाल सेना लेकर बार-बार आक्रमण करता पर उसका वश नहीं चलता। एक बार अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया-पुरे दल-बल के साथ। दुर्भाग्य से महाराणा उदयसिंह मुग़ल सेना से घिर गया और पकड़ लिया गया। उदयसिंह के पकड़े जाते ही मेवाड़ की सेना अस्त-व्यस्त हो गयी। कुछ में भगदड़ मच गयी तो कुछ किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। एक विकार स्थिति में क्या किया जाये, यह निर्णय कोई नहीं कर पर रहा था। आशंका यह बन गयी थी कि अब अकबर का अगला कदम होगा-चित्तौड़ के किले को काबू में करना। चारों ओर घबराहट-भरा वातावरण था। www.vedicpress.com

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वीरा को जब इस स्थिति का पता चला तो उसने युद्धभूमि में जाने का निश्चय किया। मर्दानी वेश और सिंगार उतार फेंका और सैनिक वेश धारण किया। अस्त्र-शस्त्र धारण करके सैनिकों में पहुँच गयी और उन्हें युद्ध के लिए प्रोत्साहित करके उनमे साहस का संचार किया। उसने सावधान करते हुए कहा कि ‘यदि आपने इस विकत स्थति में हिम्मत हरी तो मेवाड़ सदा के लिए हाथ से निकल जायेगा और हमें गुलामी की जिन्दगी बितानी पड़ेगी। ‘उपरानी को मर्दानी वेश में ललकारते हुए देखकर सैनिकों में उत्साह भर गया। वीरा के नेतृत्व में पुरे जोश और तैयारी  के साथ मेवाड़ सेना ने मुग़ल सेना पर आक्रमण का दिया। मुग़ल सेना जो किले पर कब्जे का सपना देख रही थी, उसे दूर तक ऐसी उम्मीद नहीं थी। राणा उदयसिंह उनकी कैद में होने से उन्होंने यह माँ लिया था कि अब मेवाड़ हमारे अधीन हो गया। वीरा और मेवाड़ी सैनिक मुग़ल सेना को काट-काट कर फेंकने लगे। अपनी बुरी दशा देखकर मुग़ल सेना भाग खड़ी हुई। मेवाड़ी सेना ने उसे ऐसे उखाड़ा कि उस समय उसकी वापसी आक्रमण की हिम्मत नहीं हुई। वीर ने अपने पति राणा उदयसिंह को मुक्त करा लिया और उसे चित्तौड़ ले आई। वीरा की चरों और जय-जयकार हो गयी। एक विदेशी इतिहासकार ने यहाँ तक लिखा है कि “इस बार वीरा के कारण ही चित्तौड़ की स्वाधीनता बची अन्यथा उसका गुलाम बनना निश्चित था” । www.vedicpress.com

चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का पराक्रम

राणा उदयसिंह वीरा की वीरता, साहसिकता, पराक्रम और रणकुशलता से बहुत प्रभावित हुआ। जब भी अवसर आता वह वीरा की प्रशंसा मुक्त ह्रदय से करता और इस प्रकार उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता। राणा के मुख से प्रशंसा सुनकर भी वीरा को कभी अहंकार नहीं हुआ, वह पूर्ववत् व्यवहार करती। किन्तु वीरा की प्रंशसा  को सुनकर महारानियों और राजपूत सरदारों के ह्रदय में ईर्ष्या की आग जाल उठी। प्रकट में वे भी राणा के साथ प्रंशसा करते किन्तु अन्दर ही अन्दर जल-भुन जाते। वीरा के सामने उनका सारा शौर्य और रण कौशल मिट्टी में मिल गया। गुप्त तरीकों से वीरा के विरुद्ध षड़यंत्र रचे जाने लगे। वह एक दिन इन्हीं का शिकार होकर मौत का ग्रास बन गयी। वीर महिला का इतना दुखद अंत शायद ही कभी हुआ हो ! यदि वह जीवित रहती तो अवश्य ही अन्य युद्ध में देश के काम आती, किन्तु नीच षड्यंत्रकारियों ने एक वीरांगना को यों ही मरवा डाला। भले ही वीरा का भौतिक शरीर हमारे बीच नहीं रहा किन्तु उसकी शौर्यगाथा सदा उसको जीवित रखेगी और नारियां ही नहीं पुरुष भी उससे प्रेरणा लेते रहेंगे।

  • वैदिक धर्मी

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