जीसस (God) का चौकाने वाला सम्पूर्ण लेखा-जोखा

जीसस नाम का कोई व्यक्ति नहीं था |

जीसस

सारा ईसाई धर्म एक व्यक्ति पर आधारित है । वह व्यक्ति कपोलकल्पित सिद्ध हिने पर ईसाई धर्म सारा निराधार बनता है । इस पर कुछ नासमझ व्यक्ति ऐसा आक्षेप उठाते हैं कि यदि आप ईसा-मसीह को काल्पनिक व्यक्ति कहें तो ईसाई लोग कृष्ण को भी काल्पनिक व्यक्ति कह देंगे ।

इस आक्षेप के दो उत्तर है । एक तो यह कि इतिहास तो सत्य घटनाओं का ब्यौरा होता है । वह कोई राजनयिक लेन-देन या समझौता तो है नहीं कि ‘आप यदि जीसस के अस्तित्व को मान्यता देंगे तो ही हम कृष्ण का अस्तित्व मान्य करेंगे । यदि आप कहेंगे की ईसा नहीं था तो हम भी कहेंगे की कृष्ण भी काल्पनिक व्यक्ति था ।’

यह तो केवल विवाद बढाने वाली बात है । कृष्णवतार हुआ था या नहीं इसके सबूत अलग होंगे । उसी प्रकार ईसाई धर्म के संस्थापक कृस्त नाम का कोई व्यक्ति था या नहीं इसके प्रमाण भिन्न होंगे । दोनों का स्वतंत्र रूप से निर्णय हो ।

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हमारा दूसरा उत्तर यह है की ईसाई धर्म जिस प्रकार ईसामसीह पर आधारित है । उस प्रकार वैदिक धर्म राम या कृष्ण पर आधारित नहीं है । राम या कृष्ण का अस्तित्व मान्य न करने पर भी वैदिक धर्म को कोई अन्तर नहीं पड़ता है । वैदिक धर्म तो केवल वेदों यानि ज्ञान पर आधारित है ।

इसी आधार पर स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा था कि “बुद्ध, ईसामसीह और मोहम्मद जैसे एक-एक व्यक्ति पर आधारित धर्मों की नींव दुर्बल होती है । यदि इतिहास कभी कह दे कि उस नाक का कोई धर्म संस्थापक कभी था ही नहीं तो उस धर्म के अनुयायी कहीं के नहीं रहेंगे ।”

ईसामसीह के अस्तित्व की बाबत स्वयं पाश्चात्य गोर लोगों में ही हो विवाद है उसका सार William Durant के लिखे  The Story of civilization के खण्ड 3 में प्रष्ठ ५५३ पर इस प्रकार है :-

“जीसस ईसापूर्व वर्ष 4 से ईसवीं सन 30 तक ।”

“क्या कृस्त वास्तव में कोई व्यक्ति था ? ईसाई धर्मसंस्थापक की जीवनी क्या मनगढ़न्त कहानी है?”

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“अठारहवी शताब्दी के आरम्भ के वर्षों में Bolingbroke मित्र-मण्डल के सदस्यों में आपस में इस प्रश्न की चर्चा हो रही थी कि क्या जीसस कपोलकल्पित व्यक्ति है ? Waltaire जैसे स्वतंत्र व्यक्ति को भी उस से धक्का लगा । Ruins of Empire नाम के ग्रन्थ में लेखक Volney ने सन १७९१ में यहीं शंका प्रकट की थी । फ्रेंच सेनानी तथा सम्राट नेपोलियन ने सन १८०८ में जर्मन विद्वान् Wieland से भेंट होने पर अहि प्रश्न पूछा था “कि क्या कृस्त कोई ऐतिहासिक व्यक्ति था या नहीं ?”

इस प्रकार कम-से-कम गत 200 वर्षों से कुछ स्वतंत्र विचारी यूरोपीय जन जो निडर और सत्यप्रेमी है, ईसामसीह की एतिहासिकता की बाबत शंका प्रकट कर रहे है ।

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विलियम ड्यूरेट लिखते है, “उस दो सौ वर्ष के विवाद का पहला हमला Hermann Reimarus नाम के व्यक्ति ने चुपचाप किया । वे हैम्बर्ग विश्वविद्यालय में प्राच्य-भाषाओँ के प्राध्यापक थे । उनकी मृत्यु सन १७६८ में हुई । मरते समय जीसस की जीवनी पर वे 1400 पृष्ठों का एक हस्तलिखित ग्रन्थ अप्रकाशित छोड़ गए । छ वर्ष पश्चात Gothold Lessing ने कुछ मित्रों के विरोध को ठुकराकर उस हस्तलिखित ग्रन्थ के कुछ भाग Wolfnbuettel Fragments शीर्षक से प्रकाशित किये । सन १७९६ में Herder ने दर्शाया कि Matthew, Mark तथा Luke द्वारा दर्शाया गया । कृस्त, जॉन के लिखे वर्णन से कितना असंगत है ।

“सन १८४० में Bruno Baur ने एक प्रकाश्माल ही आरम्भ कर दी जिसका उद्देश्य था लोगों को यह बताना की जीशस एक काल्पनिक व्यक्ति है । दूसरी शताब्दी में यहूदी, ग्रीक तथा रोमन लोगों की जो धार्मिक धारणाएं थीं उनको सम्मिश्र रूप देने हेतु एक जीशस का कृत्रिम व्यक्तित्व बनाया गया ।”

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“सन १८६३ में Ernest Revan’ ने अपनी पुस्तक Life of Jesus में बड़ी तर्कशुद्ध पद्धति में तथा आकर्षक शैली में यह स्पष्ट किया कि Mark, Matthew, Luke, John आदि द्वारा लिखे गया बायबल के Gospels कतई विश्वसनीय नहीं है ।”

इस शताब्दी के अंत के कुछ वर्षों के Abbe Lusy नाम के एक भाग फ़्रांसिसी लेखक ने New Testament नाम के बाइबिल के उत्तरी भाग का इतनी गहराई से विश्लेषण किया कि कैथलिक पंथियों ने क्रुद्ध होकर उसे और उसके समान धारणा रखने वाले सभी व्यक्तियों को पंथ से बहिष्कृत कर दिया ।

इतना होते हुए भी जीसस क्राइस्ट की मनगढ़न्त कहानी बनाकर कृस्ती धर्म का विशाल आडम्बर कैसे रचा गया इसका विवरण Christianity is Chrisn-nity नाम के ग्रन्थ में दिया गया है । इस ग्रन्थ में भी हमने समय समय पर उसका विवरण दिया है ।

 

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महाभारतीय युद्ध समाप्ति के भीषण परिणामों से कुछ राहत मिलने के पश्चात Bethleham, Nazareth, Jerusalem, Corinth तथा Rome आदि नगरों में कृष्णवंश के छोटे-छोटे मंडल स्थापित हुए ।’

यही प्राचीनतम जीसस सम्बन्धी एकांकी ऐतिहासिक उल्लेख है । जोसेफस एक विख्यात और विश्वसनीय इतिहासकार माना जाता है । अत: लोगों ने ऊपर दिए उद्दरण को बड़ा महत्व दे रखा है ।

यदि जोसेफस स्वयं जीसस से मिला होता या उसके पिता जीशस से मिले होते और उन्होंने जोसेफस को जीशस की जानकारी दी होती, या कुछ दस्तावेजों का हवाला देकर जोसेफस लिखता तो कोई बात थी । फिर भी जोसेफस ने जीसस की बाबत जो कुछ मिला है उसमें जरा भी ऐतिहासिक तथ्य नहीं है । क्योंकि जीसस का पूरा नाम, उसके माँ-बाप, भाई-बहन, घर का पता, जन्म की तारीख, जीवनी, मृत्यु की तारीख, स्थान, मृत्यु का कारण आदि कोई काम की बात तो लिखी ही नहीं । अत: उसे ऐतिहासिक उल्लेख नहीं माना जा सकता । यह भी हो सकता है कि मूल जोसेफस का लिखा इतिहास यदि उपलब्ध नहीं है तो उसके सकिदों वर्ष पश्चात जिसने जोसेफस के जीर्ण हस्तलिखित ग्रन्थ की नक़ल निकाली वह घुसेड दिया । अगले संस्करणों में वह जीसस सम्बन्धी उल्लेख भूल से जोसेफस का माना गया हो । इतिहास संशोधन में अनेक ऐसी शक्यताओं का अवधान रखना पड़ता है ।

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जन्म गांव

जीसस का जन्मस्थान कोई बैथलम (Bethlehem) तो कोई नजरथ (Nazareth) बताते हैं । वास्तव में बात यह थी कि उस समय अरब प्रदेश में हर नगर में कई कृष्ण मंदिर होते थे । उस सबमें कृष्ण जन्मोत्सव होता था । अत: कोई भी नगर कृष्ण का जन्मस्थान कहा जा सकता था ।

अब इन दोनों ग्राम नामो का जरा विश्लेषण करें । Bethlehem ‘वत्सलधाम’ का अपभ्रंश है । Nazareth नन्दरथ का अपभ्रश है क्योंकि ‘द’ का ‘झ’ उच्चार होता है । इससे पता चलता है कि उस प्रदेश में कृष्णलीला का बड़ा प्रभाव था ।

जीसस की जन्मकथा भी कृष्णकथा की नक़ल है । नाम भी ईशस कृष्ण का अपभ्रंश जीशस कृस्त है । रात के 12 बजे घंटा बजाकर कृष्ण जैसा ही कृस्त का जन्म मनाया जाता है ।

जीसस के जन्म समय का दृश्य जो गिरिजाघरों में दिग्दर्शित किया जाता है वह सारा गोकुल की तरह ही होता है ।

ग्रन्थ जो हिन्दू धर्म के प्राचीन और प्रेरणादायक होने का आधार है ?

जन्म वार, तिथि, वर्ष, समय, स्थान

जीसस के जन्म का वार, तिथि, मास, वर्ष, समय तथा स्थान सभी बातें अज्ञात है । यदि वह इतना प्रसिद्द संत महात्मा और अवतारी व्यक्ति होता तो सारा ब्यौरा तत्कालीन जनता जानने का यत्न करती ।

विलियम ड्यूरेंट ने जीशस का जन्म वर्ष ईसापूर्ण चौथा वर्ष लिखा है । यहीं कितनी असंगत बात । भला ईसा का ही जन्म ईसा पूर्व कैसे हो सकता है ?

ऐसे और भी अनेक अनुमान हैं । कोई कहता है जीसस का जन्म ईसवीसन पूर्व ६३वे वर्ष में हुआ । ईस्वी सन की गणना ईसा-मसीह के जन्मदिन से होनी चहिये । ऐसी अवस्था में यह प्रतिपादन करना कि स्वयं ईसा ईस्वी सन के पूर्व 4 वर्ष या 63 वर्ष या ६८ वर्ष जन्मा था कितनी भद्दी बात लगती है ।

और एक असंगति देखें । ईसा का जन्म 25 दिसम्बर को मनाया जाता है । और नववर्ष का दिन होता है एक जनवरी । तो क्या ईसा का जन्म ईसवीं सन से एक सप्ताह पहले हुआ ? और यदि हुआ तो उसी दिन से वर्ष गणना क्यों नहीं की गई ?

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यदि वर्ष गणना जनवरी से आरम्भ की हो और वर्ष के 29 दिसम्बर को ईसा का जन्म हुआ हो तो उसका अर्थ यह है कि ईसा का जन्म ईसवीं सन के ५१ सप्ताह बीत जाने पर हुआ । यह भी बड़ा उटपटांग-सा लगता हैं ।

इससे साफ़ सिद्ध होता है कि ईसा नामक कोई कोई व्यक्ति था ही नहीं । उसके नाम से एक कालगणना ईसाई कहलाने वालों ने अंटसंट-सा लगता है ।

इससे साफ़ सिद्ध होता है कि ईसा नमक कोई व्यक्ति था ही नहीं । उसके नाम से कालगणना ईसाई कहलाने वालों ने गलत-सलत चला दी ।

यदि जीसस चमत्कार करने वाला ऐसा महत्मा होता जिसके चरणों पर हजारों भक्तजन रोज नमन करते तो उसके घर का पता अवश्य उपलब्ध होता ।

 

जीशस के प्रवचन भी नहीं

 

यदि जीसस ने धार्मिक प्रवचन करते जीवन बिताया होता तो उसके प्रवचनों की कोई बड़ी पुस्तक होती या बाइबिल में ही उसके प्रवचन होते । वे सारे भाषण कहाँ हैं ?

तलाक के विषय में वेद क्या कहते हैं क्या तलाक लेना-देना उचित है ?

 

कृस्त के बनावटी चित्र’

Ernest Kitzinger तथा Elizabeth Semor ने मिलकर 32 पृष्ठ की एक Portraits or Christ नाम की पुस्तक प्रकाशित की हैं । इसके पृष्ठ 2 और 3 पर वे लिखते है कि “जब हम पता करने लगते हैं कि जीशस के समय का ही जीसस का कोई चित्र या स्वरूप का कोई प्रत्यक्ष वर्णन है या नहीं तो पता चलता है कि तत्कालीन वर्णन या चित्र कोई भी नहीं है । या नहीं तो पता चलता है की तत्कालीन वर्णन या चित्र कोई भी नहीं । जीशस के जो चित्र माने जाते है वे बाद की पीढ़ियों में काल्पनिक बना दिए गए है । मार्क, मैथ्यू, जॉन और ल्यूक द्वारा लिखे बाइबिल में जो   नाम अध्याय हैं उनमें भी जीशस के स्वरूप का या शरीरयसिट का कोई वर्णन नहीं है ।

उन दो संसोधकों को यह दिखाई दिया कि सिकंदर या सूर्यदेव के चित्र जैसे बनाये जाते थे वैसा ही जीशस का चेहरा दर्शाने की प्रथा रूढ़ हो गई ।

अब पाठक विचार करें की William Durant, Ernest Kitzinger  तथा  Elizabeth Semor  जैसे लेखकों, संशोधक जीसस सम्बन्धी धौंसबाजी का पूरा पता चलने पर भी उसे स्पष्ट धौंसबाजी या हेरा-फेरी कहने का साहस नहीं करते और ईसाई धर्म से चिपके रहते हैं तो वे करोड़ों ईसाई जो बेचारे बिना सोचे विचारे ईसाई कहलाते हैं इन्हें क्या दोष किया जाय ?

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जीशस की मनगढ़ंत जीवनी

जीसस के 33-३४ वर्ष के जीवन में केवल तीन ही घटनाओं का उल्लेख किया जाता है-उसका, जन्म, बपतिस्मा और क्रूस पर कील ठोंककर मृत्यु । किन्तु मृत्यु की घटना को मोड़कर यह कहा जाता है की यद्यपि उसे मृत समझकर दफनाया गया तथापि तीसरे दिन वह पुनर्जीवित होकर कब्र तोड़कर बाहर निकला और सीधा स्वर्ग सिधार गया ।

अपने जीवन के 33-३४ वर्ष जीशस ने कैसे और कहाँ बिताएं ? वह प्रात: से शाम तक करता क्या था ? रहता कहा था ? आदि बातों का ब्यौरा दिए बगैर यकायक यह कहा जाता है कि एक शाम को 12-13 शिष्यों सहित भोजन करते समय judas नाम के अनुयायी ने विश्वासघात कर रोमन अधिकारीयों को जीशस का परिचय करवाकर जीसस को बंदी बनवा दिया । उस पर रोमन अधिकारीयों ने आरोप लगाया कि “तुम अपने आपको यहूदियों का राजा कहलाते हो अत: तुम्हें क्रूस पर हाथो-पावों में कील ठोंककर मृत्यु दण्ड दिया जाता है ।”

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यह सारा ही वर्णन अटपटा, असंगत और अविश्वसनीय है । इधर तो यह कहा जाता है कि कृस्त बिचारा बड़ा सीधा-सादा, गरीब और दयालु था और उधर उस पर आरोप यह लगाया जाता है कि उसे यहूदियों का राजा कहलाने की महत्वाकांक्षा थी । यदि वह आरोप सही होता तो रोज बड़े-बड़े जुलूस निकाले जाने का और जीशस को कन्धों पर उठाए हुए लोगों के झुंडों द्वारा रोमन दफ्तरों पर धावा बोलने की घटनाएं इतिहास में लिखी जाती । यहूदी उसे राजा कहते या जीशस अपने पाको यहूदियों का राजा कहलवाता, यह तो पूरी गलत है क्योंकि यहूदी तो आज तक जीशस से किसी प्रकार का नाता नहीं जोड़ते, राजा कहने की तो बात ही नहीं उठती ।

यदि जीसस इतना प्रसिद्द व्यक्ति था तो अंतिम शाम के भोजन के समय कुल 12-13 व्यक्तियों में judas ने अंगुली निर्देश द्वारा जीशस को कैद कराने में रोमन अधिकारियों को सहाय्य किया, यह बात भी विश्वसनीय नहीं दिखती ।

यदि जीसस ने विश्वासघात किया तो अन्य साथियों ने उसे क्या दण्ड दिया ? यह भी जीशस की जीवनी में कोई ईसाई नहीं बताता ।

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ईसाईयों का झूठा प्रचार

पाश्चात्य देशों के सारे ही गोरे लोग ईसाई बन जाने के कारण उन्होंने सारा इतिहास विकृत कर रखा है । Benhur जैसे चित्रपटों में ऐसा बतलाया जाता है कि ईसाई बड़े सीधे-सादे, गरीब, भोले-भाले ईसा भक्त व्यक्ति थे जिन्हें रोमन अधिकारी क्रूरता से धर्मप्रचार से रोकते थे । वास्तव में पिटर, पॉल आदि ईसाई नेता जनता को रोमन शासन के विरुद्ध भड़काकर स्वयं शासक बनना चाहते थे । इस हेतु उन्होंने जब लोगों के झुण्ड जमा कर उन्हें भड़काकर बलवा करना आरम्भ किया तब उनका दमन करना रोमन शासन को अनिवार्य हो गया । लोग जब धर्म बदल देते है तो वे इतिहास भी किस प्रकार झुठला देते है । यह ईसाई और इस्लामी इतिहास से सत्यप्रेमी लोग सबक सीखें ।

कब्र सम्बन्धी धौंस

जीसस की कब्र कहाँ थी, इसका भी आज तक किसी को पता नहीं । गत १९०० वर्ष तक सारे ईसाई कहते रहें कि ईसा जेरुसलेम में सूली चढ़ाकर वहीँ दफना दिय गया । अत: जीशस की कब्र किसी नया स्थान पर होने की कोई बात ही नहीं थी ।

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किन्तु गत 70-80 वर्षों से नतोविच नाम के एक रुसी के कहने पर कुछ ईसाई कहने लगे हैं कि सूली चढाने के पश्चात भी जीशस जीवित रहा । इतना ही नहीं अपितु तगड़ा होकर तिब्बत गया । वहां उसने किसी लामा से दीक्षा पाई किन्तु लौटते समय कश्मीर में जीशस का देहांत हुआ । वहां उसके नाक की एक कब्र बताई जाती है ।

वास्तव में यह एक बड़ी वंचना ही है । भला ईसा की कब्र की देखभाल एक मुसलमान परिवार क्यों कर रहा है ? बात वस्तुत: यह है कि उस कब्र के मुसलमान मुजावर भोले-भाले ईसाईयों को यह कहकर चढ़ावा चढाने पर राजी कर लेते है कि वह कब्र ईसा की है । बाकी बचे मुसलमान दर्शनार्थी । उनको वे मुजावर कहते है कि “अजी यह तो मुसलमान पीर की कब्र है” । इस तरह भावुक, धार्मिक धौंसबाजी से भोले-भाले ईसाई तथा इस्लामी प्रेक्षकों से धन बटोरते रहने का वह एक साधन बन गया है । जितने अधिक प्रेक्षक आते रहते है, उतनी ही वह बार अधिक फैलकर और धन आता रहता है । इस प्रकार इतिहास की हेरा-फेरी और जन-वंचना चालू रखना ही एक किफायती धंधा बना हुआ है ।

जिससे एक परिवार को धन मिलता रहता है और प्रतिदिन सैकड़ों दर्शनार्थी ठगे जाते रहते है ।

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ईसामसीह के जीवन की कहानी कैसे चल पड़ी ?

इस प्रकार जन्मस्थान से मृत्यु स्थान तक ईसामसीह की कथा एक मनगढ़ना कहानी होने से ईसाई धर्म की नींव ही धंस जाती है । जेरुसलेम, कारिन्थ आदि मंदिरों की व्यवस्थापक मण्डली से मतभेद होने पर पिटर, पॉल आदि व्यक्ति वहां से निकाले गए । तब उन्होंने “हम पर बड़ा अन्याय हुआ, हमारे विरोधियों ने सत्य को क्या कुचला, प्रत्यक्ष ईश्वर को ही ठुकराकर सूली चढ़ा दिया ।” इस प्रकार के क्रोध और चिढ़ भरे भाषण वे असंतुष्ट नेता विविध नगरों में देते गए । वह सुनते-सुनते कुछ अनपढ़ भोले-भाले अनुयायी समझने लगे कि सचमुच ही किसी अवतारी व्यक्ति की हत्या हो गई । यह है ईसामसीह के काल्पनिक चरित्र का स्त्रोत-चन्द चिढ़े हुए व्यक्तियों की भीड़ को भड़काने वाले असम्बद्ध भाषण ।

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  • वैदिक धर्मी

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