ज्ञान प्राप्ति के मार्ग कौन-कौन से है ?

ज्ञान प्राप्ति के भारतीय मनोवैज्ञानिक आधार

ज्ञान प्राप्ति का मूल

शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय विचारधारा और संस्कृति की विषय-सामग्री को सम्मिलित कर देने मात्र से की शिक्षा भारतीय नहीं बन जाती । हमे भारत की उन मनोवैज्ञानिक पद्धतियों की खोज करनी होगी जो मनुष्य की उन नैसर्गिक शक्तियों एवं उपकरणों को सजीव बना देती हैं जिनके द्वारा वह ज्ञान को आत्मसात करता है, नवीन सृष्टि करता है तथा मेधा, पौरुष और ऋतंभरा प्रज्ञा का विकास करता है ।उस विपुल बौद्धिकता, आध्यात्मिकता और अतिमानवीय नैतिकशिक्षा का रहस्य क्या था, जिसे हम वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, प्राचीन दर्शन-शास्त्रों में, भारत के सर्वोकृष्ट काव्य, कला, शिल्प और स्थापत्य में स्पन्दित होते हुए देखते है ? इसी दृष्टि से यहाँ हम शिक्षा के भारतीय मनोवैज्ञानिक आधारों की संक्षेप में चर्चा कर रहे है।

मनुष्य की मूल प्रकृति आध्यात्मिक

भारतीय मनोविज्ञान के अनुसार मनुष्य की मूल प्रकृति आध्यात्मिक है। प्राय: मनुष्य अपनी इस आध्यात्मिक प्रकृति की ओर सचेतन नहीं रहता । आत्मा सत, चित्त, आनंद स्वरूप है। इसी कारण मनुष्य के गहरे आध्यात्मिक स्तर पर परम सत्य की जिज्ञासा है, जिससे प्रेरित होकर मानव वैज्ञानिक अनुसंधान करता है और सत्य की अनवरत खोज में संलग्न है ।

मनुष्य की इस आध्यात्मिक प्रकृति के कारण ही उसने कला संस्कृति, सदाचार और धर्म के रूप में अपने को अभिव्यक्त किया है। मनुष्य इस आध्यात्मिक प्रकृति के कारण अन्य जीवों से भिन्न ही नहीं है, वरन उसमें यह शक्ति है की वह अपने वातावरण को बदल सकता है। अन्य जीवों को विवश होकर भौतिक वातावरण को स्वीकार करके उसी में पड़े रहना पड़ता है या तो वे अपने को उसके अनुकूल बना लें, या समाप्त हो जाएं। अत: भारतीय मनोविज्ञान के इस महत्वपूर्ण तत्व को शिक्षा का आधार बनाने की आवश्कयता है ।

ज्ञान की प्रक्रिया

  1. समस्त ज्ञान मनुष्य के अन्तर में

समस्त शिक्षा मनुष्य के अंतर में स्थित है । भारतीय मनोविज्ञान अनुसार आत्मा ज्ञानस्वरूप है। शिक्षा (ज्ञान) आत्मा का प्रकाश है। मनुष्य को बाहर से ज्ञान प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत आत्मा के अनावरण से ही ज्ञान का प्रकटीकरण होता है। अत: समस्त ज्ञान, चाहे वह भौतिक हो अथवा आध्यात्मिक, मनुष्य के आत्मा में है। बहुधा वह प्रकाशित न होकर ढका रहता है, और जब आवरण धीरे-धीरे हट जाता है तो हम कहते है कि ‘हम सीख रहे है।‘ जैसे-जैसे इस अनावरण की क्रिया बढ़ती जाती है, हमारे ज्ञान की वृद्धि होती जाती है।

इस प्रकार शिक्षा का लक्ष्य नए सिरे से कुछ निर्माण करना नहीं है, उसे तो मनुष्य में पहले से ही सुप्त शक्तियों का अनावरण और उनका विकास करना है।

  1. अन्त:करण चतुष्ट्य

शिक्षा-प्रक्रिया को समझने के लिए अन्त:करण के स्वरूप और उसकी प्रकृति को समझना आवश्यक है। वेदांत में अन्त:करण के चार प्रकार एवं उसके कार्य इस प्रकार बताये गए है :-

मनोबुद्धिरहंकारश्चितं करणमन्तरम् ।

संशयो निश्चयो गर्व: स्मरणं विषया इमे ।।

अन्त:करण के चार रूप है- मन , बुद्धि, अहंकार और चित्त । मन से वितर्क और संशय होता है। बुद्धि निश्चय करती है। अहंकार से गर्व अर्थात् अहंभाव की अभिव्यक्ति होती है । चित्त में स्मरण होता है। अन्त:करण को मन भी कहा जाता है । योग-दर्शन में इसे चित्त संज्ञा दी है ।

मन का काम है विषय-वस्तु के बिम्ब को ज्ञानेन्द्रियों-दृष्टि, श्रुति, घ्राण, स्वाद, स्पर्श के माध्यम से प्राप्त करना और फिट उन्हें विचार-संवेदनो में अनुदित करके निर्णय हेतु बुद्धि के समक्ष प्रस्तुत करना । अहंकार विषय-वस्तु का अहं अर्थात् मै, मेरा, अपने से सम्बन्ध जोड़ता है । बुद्धि मन के द्वारा प्रस्तुत विषय-वस्तु के बिम्ब का चित्त प्रतिक्रिया व्यक्त करती है । अन्त:करण जड़ तत्व है । आत्मा के प्रकाश से ही अन्त:करण जड़ तत्व है । आत्मा के प्रकाश से ही अन्त:करण द्वारा शिक्षा-प्रक्रिया सम्पन्न होती है ।

ज्ञान प्राप्ति के मार्ग

1. प्रत्यक्ष ज्ञान :- ज्ञानेन्द्रियों के विषय-सन्निकर्ष के आधार पर उत्पन्न अन्तकरण की वृति स्वरूप अध्यवसाय को प्रत्यक्ष ज्ञान कहते है। इन्द्रियों द्वारा बाह्य विषयों से चित्त सम्बंधित होकर विषयाकार हो जाता है । चेतन पुरुष का प्रकाश चित्त पर पड़ता है । चेतन से प्रकाशित चित्त अपनी वृतियों द्वारा विषय को प्रकाशित करता है । उस विषय का प्रकाशित होना ही उस विषय का ज्ञान कहलाता है ।

2. अनुमान ज्ञान :- अनुमान का शाब्दिक अर्थ हुआ पीछे होने वाला ज्ञान, अर्थात् एक बात जानने के उपरांत दूसरी बात का ज्ञान ही अनुमान हुआ । प्रात: काल उठने पर आँगन के भीगे हुए होने पर रात्री की वर्षा का अनुमान होता है । इस प्रकार के अनुमान से उत्पन्न ज्ञान भी यथार्थ ज्ञान माना जाता है । वास्तव में अनुमान भी प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त कर लिया था, तभी हमने धुआं देखकर अग्नि की उपस्थिति का नौमान कर लिया ।

3. शब्द ज्ञान :- जिन विषयों का ज्ञान प्रत्यक्ष तथा अनुमान के द्वारा प्राप्त नहीं हो सकता, उनके यथार्थ शिक्षा (ज्ञान) को प्राप्त करने के लिए हमे शब्द प्रमाण का सहारा लेना पड़ता है । कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसने उस विषय का प्रत्यक्ष अथवा अनुमान से ज्ञान प्राप्त कर लिया है, उसके द्वारा उपदेश से सुनकर, अथवा लिपिबद्ध है तो पढ़कर, उस विषय का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसी शब्द से अर्थ का विषय करने वाली चित्त की वृति को शब्द से प्राप्त ज्ञान कहते है । चित्त के विषयाकार होने से ही ज्ञान का संस्कार होता है, जोकि हमारी समृति का अंग बन जाता है। शिक्षण-प्रक्रिया में यह बात ध्यान देने योग्य है ।

4. अन्तर्ज्ञान :-   अन्तर्ज्ञान मन और यर्थाथ वस्तु के बीच घनिष्ठ ऐक्य से पैदा होता है । यह वस्तुओं के साथ तादात्मय के द्वारा सत्य का ज्ञान है। अन्तर्ज्ञान जो कुछ प्रकट करता है वह एक सिद्धांत उतना नहीं, जितना कि चेतन होता है। वह मन की एक स्थिति होती है, न कि ज्ञेय वस्तु का लक्षण । ज्ञान वास्तव में ज्ञाता और ज्ञेय के बीच साधन और सन्निकट ऐक्य है। विचार उसे आंशिक रूप से प्रकट और प्रस्तुत करने के साधन है। कोई भी व्यक्ति मानवीय प्रेम या पितृवात्सल्य की प्रबलता को तब तक नहीं जान सकता जब तक कि वह स्वयं उन भावों में से न गुजरे। ज्ञेय वस्तु के साथ तादात्म्य से जो ज्ञान प्राप्त होता है, वही एकमात्र सच्चा और सीधा ज्ञान होता है, शेष सब ज्ञान अनुमानिक होता है।

 

  • वैदिक धर्मी

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