ज्योतिष शास्त्र का आधुनिक जीवन में क्या महत्व है ?

ज्योतिष शास्त्र कितना ठीक और कितना गलत है ?

ज्योतिष शास्त्र झूठा है ?

“नहीं, जो उससे अंक बीज रेखा गणित विद्या है, वह सब सच्ची है परन्तु जो फल की लीला है, वह सब झूठी है।”

                                                                                                                                      (सत्यार्थप्रकाश, समु० २)

वैदिक धर्म और अन्य मत, पंथ, सम्प्रदाय या मजहब में भेद क्यों व कैसे ?

  1. “जो यह ग्रहणरूप प्रत्यक्ष फल है, सो गणित विद्या का है, फलित का नहीं । जो गणित विद्या है, वह सच्ची और फलित विद्या है स्वाभाविक सम्बन्ध जन्म को छोड़ के झूठी है ।”
  2. “इसलिए कर्म की गति सच्ची और ग्रहों की गति सुख दुःख भोग के कारण नहीं । भला ग्रह आकाश में और पृथ्वी भी आकाश में बहुत दूर पर है, इन सम्बन्ध करता और कर्मों के साथ साक्षात् नहीं, कर्म और कर्म के फल का कर्त्ता भोक्ता जीव कर्मों के फल भोगने हारा परमात्मा है । जो तुम ग्रहों का फल मानो, तो इसका उत्तर देओ की जिस क्षण में एक मनुष्य का जन्म होता है, जिसकों तुम ध्रुवा त्रुटी मानकर जन्म पत्र बनाते हो, उसी समय में भूगोल पर दूसरे का जन्म होता है वा नहीं? जो कहों कि नहीं होता, तो झूठ और जो कहो कि होता है, तो एक चक्रवर्ती के सदृश भूगोल में दूसरा चक्रवर्ती राजा क्यों नहीं होता ।”

                                                                                                                                       (सत्यार्थप्रकाश, समु० ११) 

वेद, वेदांग, शाखाएं क्या है और इनका हिन्दू धर्म में क्या महत्व है ?

 

  1. “जो धनाढ्य, दरिद्र, प्रजा, राजा, रंक होते है, वे अपने कर्मों से होते हैं ग्रहों से नहीं । बहुत से ज्योतिष शास्त्र को मानने वाले लोग अपने लड़के-लड़की का विवाह ग्रहों की गणित विद्या के अनुसार करते हैं, पुन: उनमें विरोध वा विधवा अथवा मृत स्त्री पुरुष हो जाता है । जो फल सच्चा होता, तो ऐसा क्यों होता ? इसलिए कर्म की गति सच्ची और ग्रहों की गति सुख-दुःख भोग में कारण नहीं ।”

                                                                                                                                      (सत्यार्थप्रकाश, समु० ११) 

ग्रन्थ जो हिन्दू धर्म के प्राचीन और प्रेरणादायक होने का आधार है ?

 

क्या जन्मपत्री भी निष्फल है ?

“हाँ, वह जन्मपत्र नहीं, किन्तु इसका नाक ‘शोक पत्र’ रखना चाहिए । क्योंकि जब संतान का जन्म होता है, तब उसको आनंद होता है । परन्तु वह आनंद तब तक होता है कि जब तक जन्मपत्र बन के ग्रहों का फल न सुनें ।”

                                                                                                                                  (सत्यार्थप्रकाश, समु० २)

वेदों की संख्या कितनी है और रचना किसने की प्रमाण सहित ?

क्या जन्मपत्री का प्रचार पहले नहीं था

  1. “जरा विचार तो करो कि कहीं भी सारे महाभारत भर में जन्मपत्रिका का वर्णन आया है ।  कहीं भी नहीं । इससे सिद्ध हुआ कि फलित ज्योतिष की जड़ भी आर्य विद्या में नहीं है, यह स्पष्ट है ।”

                                                                                                                                    (उ० मं० पूना का व्या० ६, जन्म विषय)

प्राणायाम क्या है, कैसे किया जाता है और इसका क्या लाभ है ?

 

  1. “जितने ग्रह, नक्षत्र, जन्मपत्र, राशि, मुहूर्त आदि के फल के विधायक ग्रन्थ हैं । उनको झूठ समझ के कभी न पढ़ें और पढावें ।”

                                                                                                                                       (सत्यार्थप्रकाश, समु० ३)

 

  • वैदिक धर्मी

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