नाटक घरों में अश्लीलता परोसने का माध्यम कैसे बना ?

नाटक मनोरंजन नहीं बल्कि धर्म परिवर्तन और अश्लीलता फैलाने का मध्यम

नाटकों में प्राय: ऐतिहासिक आश्रय को लेकर गद्य-पद्य रूप में संवादात्मक तथा जन मनोरंजन के लिए अभिनय प्रदर्शनार्थ रचना की गई हैं । कथानक में वर्णित स्त्रियों और पुरुषों की नक़ल दिखाई जाती है । यह रिती अच्छी नहीं हैं । नाटकों में कहीं कहीं श्रृंगाररस  पूर्ण रचना अत्यंत अश्लीलता को पहुंची हुई हैं, जिनको भ्रम्चारी का तो कहना ही क्या अन्य आश्रमियों को भी छूना नहीं चाहिए । नीचे कुछ लोक विश्रत नाटकों और उनके रचयिताओं के नाम इस प्रकार है :-

  1. अश्व घोष

अश्व घोष संस्कृत का प्रसिद्द कवि हुआ है । इसने शारद्व्ती-पुत्र-प्रकरण” नमक बौद्ध मतावलम्बी नाटक की रचना की हैं । इस कवि के एक दो और भी नाटक प्राप्त हुए हैं । इन सब का उद्देश्य बौद्ध मत का प्रचार ही हैं ।

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  1. भास

भास कवि भी कालिदास से प्राचीन कवि हुआ है । इसने भी कई नाटकों की रचना की हैं । इनमें 13 नाटक उपलब्ध हुए हैं । 6 नाटकों की कथा का आधार महाभारत हैं । कुछ अन्यत्र से लिए गए हैं । रचना सरल और प्रसादगुणोंपेत हैं । संस्कृत कवि समाज में भास का अच्छा मान है ।

  1. दिग्नाग

कैदास के समान दिग्नाग कवि बौद्ध सम्प्रदाय में अति प्रसिद्द नाटककार हुआ हैं । इसका बनाया कुन्दमाला नमक नाटक बतलाया जाता है ।

  1. कालिदास

कालिदास नाम के कई कवि हुए है । इन में एक कवि विक्रमादित्य का समकालीन था और दूसरा राजा भोज का दरबारी था । दोनों का वर्णन प्राय: मिल सा गया है और एक ही कवि प्रतीत होता है । कालिदास प्रतिभा सम्पन्न कवि था । इसकी रचना संस्कृत नाटकों में श्रेष्ठ स्थान रखती है । उपमा तो कालिदास की प्रसिद्द है ही । परन्तु यह महा वाममार्गी भ्रष्टाचारी कवि था । अश्लीलता और गन्दा श्रृंगार-रस इसकी रचना में कूट-कूट कर भरा हुआ है । इसने उत्तम और श्रेष्ठ ऐतिहासिक कथाओं को भी गन्दी रंगत में रंग दिया है । काव्य दृष्टि से कविता उच्चा स्थान रखती है । इसके कई नाटक प्रसिद्द हैं- अभिज्ञान-शाकुंतल, विक्रमोर्वशीय, मालविकग्निमित्र । अभिज्ञान शाकुंतल का अनुवास अनेक देशी तथा विदेशी भाषाओँ में किया जा चूता कही । कालिदास की रचना शैली अति सरल और प्रसाद गुण सम्पन्न हैं ।

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  1. हर्ष

हर्ष कवि भी संस्कृत में उंचा स्थान रखता है । इसके द्वारा तीन तनक रचित कहे जाते हैं । यां थानेसर में राज्य करता था । संस्कृत के प्रसिद्द कवि वाण भट्ट ने इसी के आश्रय पर अरह कर “हर्ष रचित” लिखा था । इसके तीनों नाटकों के समय चीनी यात्री ह्युवान्त्सांग भारत में आया था । इसके तीनों नाटकों के नाम रत्नावली, प्रियदर्शिनी और नागानंद की कथा का सार बौद्ध मत के आधार पर लिखा गया है । कवि का घटना क्रम धारावाहिक रूप में चलता है । कालिदास की समता कवि में नहीं है ।

  1. भवभूति

भवभूति कवि साहित्य एवं रानीति का बहुत बड़ा विद्वान् हुआ है । इसने तीन नाटक लिखे है – महावीर चरित, मालतीमाधव और उत्तररामचरित । दो नाटकों का आधार रामायणी कथा है । कवि की रचना में गंभीरता है । पाण्डित्य है । प्रसाद गुण और सरलता नहीं है ।

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  1. विशाखदत्त

वशाखदत्त कवि की रचना “मुद्रा राक्षस” नमक राजनीति पूर्ण नाटक है । इसमें कवि ने महानितिज्ञ चाणक्य मुनि और महा कुशल राक्षस मंत्री की राजीनीतिक चालों का अति कुशलता से वर्णन किया है । रचना भी सरल और ह्रदय ग्राहिणी है । स्त्री पात्र का प्रवेश नाम मात्र ही है और वहां भी अश्लीलता नहीं है । ग्रन्थ भर में केवल एक श्लोक अश्लीलता की कोटि में आता है । इसमें राज्य-लक्ष्मी को संदेहात्मक आश्रय का वर्णन किया गया है । चन्द्रगुप्त मौर्य को चाणक्य ने राज्य दिलाया और नंदवंश का नाश किया । नन्द वंश के परंपरागत महामंत्री राक्षस को चाणक्य ने बड़ी नीतिमत्ता से चन्द्रगुप्त का प्रधानमन्त्रित्व संभालने के लिए विवश किया और चन्द्रगुप्त के राज्य को सुदृढ़ बनाया । इस में चाणक्य और राक्षस मंत्री की अनेक नीतियों का निपुणता पूर्वक चित्रण किया गया है । वर्तमान काल के मंत्रियों को इस ग्रन्थ से अवश्य शिक्षा लेनी चाहिए । शैली रोचक और भाषा सरल है । इस नाटक में नीति-विषय की मुख्यता है । चरित्र चित्रण में बनावटीपन बिल्कुल नहीं है । वर्णन रिती स्वाभाविक है ।

  1. भट्टनारायण

भट्टनारायण रचित “वेणीसंहार” है । इस का मूल महाभारत की कथा है । भाषा जटिल है । सरलता और प्रसाद गुणनाम को भी नहीं है । स्थान स्थान पर जटिल भाषा प्रयुक्त की गई है ।

  1. मुरारि कवि

मुरारि कवि का रचित अनर्घराघव नमक नाटक है । इस में भी भाषा की जटिलता का प्राधान्य है बनावटीपन के आधार पर पाण्डित्य प्रकट करने का यत्न किया है । स्वाभाविकता है ही नैन । पीछे के नाटककारों में प्राय: यह बात मिलती है कि वे बलात नाटककार बनते है, कठिन भाषा के अस्वाभाविक प्रयोग को काव्य शैली की श्रेष्ठता समझते है परन्तु नाटक रूप में यह भूषण न होकर दोष बन गया है । अनर्घराघव की कथा रामायण से ली गई है । इस ग्रन्थ में “मांस यज्ञों में डालने और अतिथि कोखिला ने” का कुत्सित वर्णन किया गया है । जो कि साक्षात् वाममार्गीयों की प्रथा है ।

  1. राजशेखर

इसी प्रकार राजशेखर का बालरामायण नाटक है । इस की भाषा सरल और सरस है । ऐसे ही कुछ भाण, रूपक, नाटिका और प्रकरण रूप नाटक भी मिलते है । इनकी महत्ता कुछ भी नहीं है ।

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  • वैदिक धर्मी

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