प्राणायाम क्या है, कैसे किया जाता है और इसका क्या लाभ है ?

प्राणायाम की विधि और करने से लाभ

प्राणायाम किसे कहते है ?

“प्राण अर्थात् श्वास और आयाम अर्थात् लम्बाई-तात्पर्य,श्वास की लम्बाई को ‘प्राणायाम’ कहते हैं

प्राणायाम की विधि:

  1. “जैसे अत्यंत वेद से वमन होकर अन्न जाल बाहर निकल जाता हैं, वैसे प्राण को बल से बाहर फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोक देवे, जब बाहर निकालना चाहे तब मुलेन्द्रिया को ऊपर खीँच रखे, तब तक प्राण बाहर रहता है । इसी प्रकार प्राण बाहर अधिक तहर सकता है । जब घबराहट हो, तब धीरे-धीरे भीतर वायु को लेके फिर भी वैसे ही करता जाय, जितना सामर्थ्य और इच्छा हो । और मन में “ओउम्” इसका जाप करता जाय, इस प्रकार करने से आत्मा और मन पवित्रता और स्थिरता होती है ।”

                                                                                                                                                                          (सत्यार्थप्रकाश, समु० ३ ) 

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  1. “एक ‘बाह्यविषय’ अर्थात् बाहर ही अधिक रोकना दूसरा ‘अभ्यांतर’ अर्थात् एक ही बार जहाँ का तहां प्राण को यथाशक्ति रोक देना । चौथा ‘बाह्याभ्यन्तराक्षेपी’ अर्थात् जब प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे, तब उससे विरुद्ध न निकलने देने के लिए बाहर से भीतर ले और जब बाहर से भीतर आने लगे, तब भीतर से बाहर की ओर प्राण को धक्का देकर रोकता जाय । ऐसे एक दुसरे के विरुद्ध क्रिया करें, तो दोनों की गति रुक कर प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियां भी स्वाधीन होते हैं ।”

                                                                                                                                                                          (सत्यार्थप्रकाश, समु० ३ ) 

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श्वास प्रश्वास को कैसे रोकें ?

  1. “उन दोनों (श्वास, प्रश्वास, अर्थात् बाहर से भीतर और भीतर से बाहर आने जानेवाला वायु-सम्पादक) के जाने-आने की विचार से रोके । नासिका को हाथ से कभी न पकड़े, किन्तु ज्ञान से ही उसके रोकने को प्राणायाम कहते है ।” (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, उपासना विषय )
  2. “(अधिक विस्तार पूर्वक) आचमन कर, दोनों हाथ धोम कान, आँख और नासिका आदि का शुद्ध जल से स्पर्श करके, शुद्ध देश, पवित्रासन पर, जिधर की ओर का वायु हो, उधर को मुख करके नाभि के नीचे से मुलेन्द्रिय को ऊपर का संकोच करके, ह्रदय के वायु को बल से बाहर निकाल के यथाशक्ति रोके । पश्चात धीरे-धीरे भीतर लेके कम-से-कम तीन प्राणायाम करें ।”

                                                                                                                                                                         (संस्कार विधि:, गृहस्थ ) 

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प्राणायाम के लाभ

  1. जैसा की ऊपर वर्णन किया गया है, प्राणायाम से “आत्मा और मन को स्थिरता होती है ” प्राण वश में होने से मन और इन्द्रियें स्वाधीन हो जाती है । इसके आगे महर्षि प्राणायाम के लाभ इस पराक्र कथन करते है :-

“जब मनुष्य प्राणायाम करता है, तब प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में अशुद्धि का नाश और ज्ञान का प्रकाश होता है

  1. “जैसे अग्नि में तपाने से सुवार्नादी धातुओं का मल नष्ट होकर शुद्ध होते हैं, वैसे प्राणायाम करके मन आदि इन्द्रियों के दोष क्षीण होकर निर्मल हो जाते हैं
  2. “बल पुरुषार्थ बढ़कर बुद्धि तीव्र सूक्ष्म-रूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म-विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है । इससे मनुष्य के शरीर में वीर्य वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझकर उपस्थित कर लेगा, स्त्री भी इसी प्रकार योगाभ्यास करे ।”

                                                                                                                                                                          (सत्यार्थप्रकाश, समु० ३ ) 

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नकली प्राणायाम से बचो

“स्थिर सुखमासनम” यह आसन का लक्षण कहा है ।आसन वाही है जिसमें सुख से बैठकर ईश्वर से योग हो सके । तो फिर नए लोगों का यह कहना है कि “यह चौरासी आसनोंवाला भानमती का तमाशा ठीक है” कैसे मान लिया जावें? इस तरह पर प्राणायाम के विषय  में तमाशा बन रहा है । यदि नासिका और मुख बाँधकर प्राणों की रुकावट करने से “कुम्भक” होता, तो जो लोग फांसी पर चढ़ते है, उन्हीं को “कुम्भक” का ठीक साधन समझना चाहिए । यथार्थ स्वरूप “कुम्भक” का यह है कि वायु को बाहर की बाहर रोक रखना । बाहर निकालने में विशेष उपाय करने से “रोचक” होता है । भीतर के भीतर प्राणों को रखने से “पूरक” होता है, यह प्राणायाम का विधान है ।”

                                                                                                                                                                      (उ० मं० पूना का व्या० ११, इतिहास ) 

ज्ञान प्राप्ति के मार्ग कौन-कौन से है ?

 

  • वैदिक धर्मी

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