भगतसिंह 9 अप्रैल 1929 का पूरा सच

*इतिहास के गंभीर विद्यार्थी* भगतसिंह व बटुकेश्वर

भारतीय इतिहास में परतंत्रता के समय जब अंग्रेजी हकुमत की केंद्रीय विधान सभा में 9 अप्रैल 1929 को *”ट्रेड डिस्ट्रिब्युट”* इस बिल पर पड़ने वाले मतों पर निर्णय लेना था। उस दिन दो *क्रांतिकारी वीर शिरोमणि भगत सिंह एवं वीरवर बटुकेश्वर दत्त* द्वारा असेंबली को बाधित करने का विरोधात्मक निर्णय लिया गया। और विरोध इस प्रकार का कि जब असेंबली में यह बिल पास हो तो इन दोनों नौजवानों द्वारा बम फैंके जाए।

इसी रणनीति के चलते 9 अप्रैल 1929 को ठीक ग्यारह बजे जब दो सेक्शन में विभाजित होने के लिए घंटी बजाई गई। तब श्रीयुत पटेल ने खड़े होकर बड़ी मर्म वेदना के साथ यह देखकर कि विरोधियों की संख्या अधिक हैं अपने सधे हुए कंठ से कहा “यह बिल पास” तभी इन दोनों युवकों ने खड़े होकर दो बम फेंक दिए। भगदड़ एवं अफरा-तफरी के थोड़े शान्त होनें पर पर्चे बांटने शुरू कर दिए जिसका प्रथम वाक्य था *”बहरो को सुनाने के लिए जोर से बोलना पड़ता हैं “* पर्चे वितरण के पश्चात् यदि ये दोनों वीर भागना चाहते तो आसानी से भाग सकते थे। किन्तु इनका कार्यभार कुछ और ही था। अतएव ये वही खड़े रहे। विधान सभा को कुछ ही देर में चारों ओर से से घेर लिया गया। किन्तु अब भय के कारण इन युवको के पास कौन अंग्रेज जाए ,,जो युवक युरोपियन वेशभुषा से सुसज्जित खड़े हुए मुस्कुरा रहे हैं। तब इन दोनों नें अपने -२ रिवाल्वर निकालकर फेंक दिए। इन दोनों के मुख पर कोई भय नही था और निरंतर *” इंकलाब जिन्दाबाद” ,अंग्रेजी शासन का सर्वनाश हो”* के नारों से आकाश को गुंञ्जाएमान करने वाले ये नवयुवक जब 7 मई 1929 को न्यायलय में उपस्थित किए जाते हैं। असेंबली मे बम फेंकने के अपराध में इन पर पुलिस ने धारा ( ३०७-हत्या करने का प्रयास )और विस्फोटक कानुन की धारा -३ लगाई तब जनता प्रदर्शन के भय से न्यायलय की सभी कार्यवाही देहली जेल में ही हुई। जब इन दोनों अभियुक्तों को न्यायलय में उपस्थित किया गया। तब इन वीरो के मुख से *”साम्राज्यवाद का नाश हो एवं इंकलाब जिन्दाबाद”* के नारे बड़े ही उच्च स्वर में लगाए गए। दो दिन तक सुबुतों एवं गवाहों के बयान होते रहे ,,तत्पश्चात् वीरवर भगतसिंह व बटुकेश्वर दत्त को अपनी सफाई के लिए कहा तो दोनों ने मना करते हुए कहा कि हमें जो कुछ कहना हैं सेशन जज की अदालत में कहेंगे। 4 जून 1929 से दिल्ली में ही सेशन जज की अदालत लगी। सरकारी गवाहों ने पूर्ववत् अपने व्यक्तव्यों की पुनरावृत्ति (दोहराई) कर दी। *तत्पश्चात् भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने इस संपूर्ण घटनाक्रम पर जो अपना संयुक्त व्यक्तव्य अदालत में दिया। वह बहुत ही विद्वतापूर्ण था। इससे पूर्व किसी भी क्रांतिकारी ने अदालत में खड़े होकर ऐसा व्यक्तव्य कभी नही दिया।*

और क्योंकि इस रणनीति में ये पहले से ही सुनिश्चित था कि जो लोग बम फेंके वे न्यायलय में ऐसा भाषण दें कि जिस से हमारी क्रांति के उद्देश्य का स्पष्टीकरण हो जाए। इसी कारण इस कार्य के लिए भगत सिंह को चुना गया और राजगुरू के बार बार आग्रह करने पर भी भगत सिंह ने अपने साथ बटुकेश्वर दत्त को ही चुना।
*उस समय व्यक्तव्य इंग्लिश में दिया गया था।* दोनों नवयुवको ने मिलकर सभी झुठे बयानो को निराधार घोषित करते हुए सत्यता को स्वीकारा एवं अपनी बात सभी के मध्य स्पष्ट रूप से रखी। इस बम दुरघर्टना को ऐतिहासिक कर्मकाण्ड़ में परिणित करना अत्यंत आवश्यक था। इसी महत्वता को समझते हुए ,लार्ड इरविन नें बड़ी व्यवस्थापिका सभाओं के संयुक्त अधिवेशन में भाषण देते हुए *इस घटना को एक व्यक्ति के प्रति नही अपितु एक संपूर्ण संस्था के प्रति रोष के रूप में बताया।*

इससे इन दोनों नवयुवकों को शीघ्र ही इस घटना के महत्व को अंग्रेजों द्वारा ठीक तौर पर समझे जाने का आभास हुआ। *ये दोनों नौजवान कहते हैं कि हम न तो उस प्रकार के घिनौने कुकृत्य के करने वाले एवं देश के कलंक हैं ,,* जैसा कि अधकचरे साम्यवादी दीवान चमनलाल हमें कह चुके हैं *तथा न ही हम ऐसे पागल हैं ,,* जैसा कि लाहौरी “ट्रिब्युन”और कुछ अन्य लोगों ने हमें बतलाया हैं ।

*और हम बहुत नम्रतापुर्वक यह दावा करते हैं कि हम कुछ भी नही हैं। सिवा इसके कि हम इतिहास के गंभीर विद्यार्थी हैं। जो अपने राष्ट्र की परिस्थितियों का विस्तृत अध्ययन सतत् रूप से कर रहे हैं।* भगतसिंह
*जख्म खाकर भी हमें हैं ,,जख्म खाने की तड़प।*
*हौंसला कितना तड़पने का हमारे दिल में हैं।।*

वैदिक धर्मी

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