मन नियंत्रण करने के लिए मुख्य व प्रभावी उपाय

प्रत्येक व्यक्ति के व्यव्हार में मन नियंत्रण क्यों जरुरी है ?

मन नियंत्रण

  • व्यवहार में व्यक्ति के मन की मुख्यता से तीन स्थितियां होती हैं-
  1. उत्तम स्थिति – व्यक्ति हर क्षण मन को बाह्य लौकिक, हानिकारक और अनावश्यक विषयों में जाने से ऐसे रोके रखता है जैसे अग्नि के जलाने के स्वभाव को जानते हुए व्यक्ति हर समय उससे दूर रहता है । इस स्थिति में कोई विशेष बल नहीं लगाना पड़ता है ।
  2. माध्यम स्थिति – मन को विषयों में चलाने से पहले रोक लेना
  3. निम्न स्थिति – मन को विषयों में ले जाकर फिर रोक पाना ।  मन नियंत्रण

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  • यदि व्यक्ति यदि एक क्षण भी मन इन्द्रियों पर नियंत्रण को छोड़ देता है  तो उसी समय यम नियम का भंग हो जाता है और विनाशकारी कार्य कर लेता है । ऐसे ही जब व्यक्ति ईश्वर से सम्बन्ध तोड़ लेता है तो उसी समय प्रकृति से जुड़ जाता है और अज्ञान रूपी अंधकार को प्राप्त होता है । मन नियंत्रण
  • जैसे चालक गाड़ी की गति से अधिक गति अपने मन में रखता है तभी गाड़ी को नियंत्रण कर पाता है । ऐसे ही अत्यधिक वेगवान वस्ती मन को चलाने, नियंत्रण में रखने के लिए आत्मा को उससे अधिक शीघ्रातिशीघ्र इच्छाएं, योजनायें बनाने, बदलने में समर्थ होना पड़ेगा, अधिक पुरुषार्थ करना पड़ेगा ।
  • मन को वास्तव में वस्तु का सही स्वरूप दिखाता है, परन्तु हम स्वयं अपनी भावनाएं उस वस्तु से जोड़ लेते है और प्रभावित हो जाते हैं, इसलिए बड़ी सावधानी रखकर उस विषय के संस्कार न उठाना चाहिए । मन नियंत्रण

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  • मन-वचन-कर्म से हम जो भी कार्य करते है उन सभी कर्मों का उत्तरदायित्व स्वयं हमारा हैं हम स्वयं कर्ता हैं, मन, इन्द्रियां तो जड़ है ।
  • हँसी-मजाक करते समय व्यक्ति को बाह्यवृति के रूप में व्यर्थ और अनावश्यक विचार-चिंतन करना पड़ता है ताकि सामने वालो का अधिकाधिक मनोरंजन हो सके । इस स्थिति में मन की चंचल अवस्था होती हैं । मन नियंत्रण
  • मन को जड़ मानने और इच्छानुसार चलाने के अभ्यासक्रम में पहले शरीर को स्थिर रखना चाहिए । इसके लिए जिस अंग में लगे कि प्रतिकूलता सी है उसे बलपूर्वक न हिलाना, वहां से इचा को हटा लेना चाहिए । ऐसे ही सारे शरीर को स्थिर करना चाहिए । मन नियंत्रण
  • पुन: मन को इच्छापूर्वक स्थिर करना चाहिए । इसके लिए मन और जीवात्मा के गुण-धर्म जानना आवश्यक है । सारे व्यवहारों में जो भी क्रियाएँ होती हैं, उसमें जीवात्मा की इच्छा, प्रयत्न, मन को प्रेरणा देना, मन द्वारा बुद्धि, इन्द्रियों को प्रेरणा देना आदि जानना चाहिए । इतना जानने के पश्चात मन को रोकने में सफलता मिलेगी । इच्छा, ज्ञान रोकने पर मन को भी रोक सकते हैं । मन को रोकने का अभ्यास करने पर उसे जहाँ चाहे जिस विषय में लगा सकते हैं और किसी वस्तु वा विषय से हटा भी सकते हैं । मन नियंत्रण
  • पांच वृतियों में से कोई भी वृति हो तो उसके पीछे संस्कार, अभ्यास, अविद्या, राग-द्वेष, रजो-तमो गुण आदि कारण होते हैं । इन कारणों और वृतियों को हटाना जीवात्मा के अधीन हैं ।

 

  • सुमेरु प्रसाद दर्शनाचार्य

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