माता-पिता का ऋण नहीं चुकाया जा सकता है ?

माता का ऋण

संसार में किसी भी स्थान पर जाकर देखें तो ज्ञात होगा कि वे लोग किसी न किसी दैवी शक्ति का पूजन करते हैं  दुनिया में लोग ईश्वर को अनेक नामो से पूजते हैं । कोई ब्रह्मा, शिव, राम, कृष्णा आदि के नाम से पुकारते हैं । संसार में बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं जो ईश्वर को किसी भी रूप में नहीं मानते ।

पूजा की दृष्टि से हम संसार को दो भागों में बाँट सकते है । एक तो वे लोग जो इस्क्वर को मानते है तथा उनकी पूजा करते हैं अर्थात् आस्तिक । दूसरे वे लोग जो ईश्वर में विश्वास नहीं रखते ऐसे लोगन चाहे कैसे भी नास्तिक क्यों न हों, इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि उनके जन्मदाता, उनके माता-पिता हैं । इस बात से संसार का कोई भी व्यकित इन्कार नहीं कर सकता है ।

माता-पिता केवल जन्म ही नहीं देते वरन हर प्रकार से लालन-पालन कर अपने बालक को उन्नति के शिखर पर पहचानें का प्रयत्न करते हैं । गरीब से गरीब माता-पिता अनेक बच्चों को सुखी बनाने के लिए भूखे-प्यासे, नंगे रहते तथा अनेक प्रकार यातनाएं सहते हैं । उनकी हार्दिक इच्छा होती है कि उनके बच्चे विद्या विद्या पढ़कर महाविद्वान बनें और सूर्य के समान चमकते हुए यश तथा कृति के शिखर पर पहुंचे । माता-पिता ही ऐसे व्यक्ति हैं जो बच्चों का कभी अहित नहीं सोच सकते । यदि कोई उनके बच्चे का अहित करें तो भी वे वाद-विवाद पर उतर आते हैं ।

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बड़े दुःख से कहना पड़ता है कि माता-पिता की इतनी ऊँची भावनाओं को भी हमारे विद्यार्थी नहीं समझते और नासमझी में कई प्रकार की ऐसी गलतियाँ कर बैठते है जो उन्हें नहीं करनी चाहिये ।

बीरबल का नाम आपने सुना होगा । वह अपने समय में श्रेष्ठ व्यक्तियों में माना जाता था । एक बार उसकी माताजी ने कहा- “बेटा, कई बार सुना है लाख रूपए का नाम, पर कभी देख नहीं पाई ।”

बीरबल ने दूसरे दिन ही दो लाख की ढेरी लगा दी और अलग-अलग करके अपनी माँ से गर्व से कहा- “माँ, यह दो ढेरियाँ है लाख-लाख रूपए की, इनको दान कर दो, इससे माता का ऋण भी मुझपर से उतर जायेगा । माँ ने तुरंत ऐसा ही किया, पर बेटे का घमंड देखकर दुःख हुआ ।

दुसरे दिन माँ ने बीरबल को बुलाकर कहा-“बेटा, मैं अब बूढी हो गई हूँ, थोड़े दिन की मेहमान हूँ । जब तुम छोटे थे तो मेरे पास सोते थे । अब मेरी प्रबल इच्छा है कि मेरे पास सोओं ।” बीरबल ने माँ की बात मान ली । रात्रि को बीरबल माँ के पास आकर सो गए ।

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जब उसे निद्रा आने लगी तब माता ने कहा- “बेटा ! प्यास लगी है, पानी पिला दे” । बीरबल प्रसन्नता से उठा और पानी का गिलास भरकर माता को दे दिया । माता ने एक दो घूंट पीकर शेष जल बिस्तर पर उड़ेल दिया । जब बीरबल ने देखा कि सारा बिस्तर गिला हो गया है तो बोला-“माँ ! यह क्या किया?” माता ने कहा-“पुत्र! गलती हो गई” बीरबल चुप होकर फिर सो गया । जब वह पुन: खर्राटे भरने लगा तब माँ ने उसे जगाकर कहा-“पुत्र ! प्यास लगी है, पानी पिला दें ।” बीरबल ने कहा-“माँ! अभी तो पानी पिया था, इतनी ही देर में फिर प्यास लग गई, क्या बिनौले खाए थे?”-ऐसा कहते हुए वह उठा और पानी का गिलास भरकर ला दिया । माता ने पहले की भांति एक-दो घूंट पीकर शेष जल को पुन: बिस्तर पर डाल दिया । बीरबल ने झिड़ककर कहा-माँ! यह क्या करती है, सारा बिस्तर गिला कर दिया ।” माता बोली-पुत्र! अँधेरा था, गिलास हाथ से छूट गया ।”

बीरबल चुप होकर फिर लेट गया थोड़ी ही देर में निद्रा में लीन हो गया । माँ ने पुन: जगाकर पानी माँगा । अब की बार बीरबल का पारा पुरे १०४ डिग्री पर पहुँच गया । झुझलाकर बोला-“माँ सोने देती है या नहीं । प्यास लगने की रट लगा रखी है ।”-यूँ कहता हुआ पानी लाया और बोला-“ले अच्छी तरह पीले ।” माता ने पूर्ववत् थोड़ा सा पानी होंठों को लगाकर शेष जल से बिस्तर को तर कर दिया । अब बीरबल सहन नहीं कर सका । वह क्रुद्ध होकर बोला-“क्या यही दुःख देने के लिए अपने पास सुलाया था । ऐसा प्रतीत होता है कि तेरी बुद्धि नष्ट हो गई है ।” माता ने कहा-“बेटा! बस, तूने मेरा ऋण चूका दिया । तू माँ का रन चुका सकता है क्या? ले सुन, तुझे सुनाऊँ- 

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जब तू बच्चा था तब तू बिस्तर पर टट्टी-पेशाब कर देता था । मैं तेरे गिले वस्त्र उतारकर तुझे अपने सूखे वस्त्रो से ढक देती, तेरे गिले वस्त्र को अपने नीचे करके तुझे सूखे वस्त्रों पर सुलाती थी । एक दिन नहीं सप्ताह नहीं, मास नहीं, निरंतर कई वर्ष तक जब तक तू अलग सोने और अपने आपको सँभालने योग्य नहीं हुआ- मैं ऐसा करती रही । तू तो दो तीन बार के बिस्तर गिला हो जाने से ही आवेश में आ गया और एक रात्रि में ही घबरा गया? बीरबल लज्जित होकर माता के चरणों में गिर पड़ा और बोला “माता तू धन्य है! तेरा ऋण चुकाना असंभव है ।”

इससे सम्बंधित एक घटना और है । एक समय की बात है, एक आदि वेश्यागामी था और एक वेश्या से अति प्यार करता था । यहाँ तक कि प्रत्येक वस्तु प्रेम के आगे न्यौछावर करने को तैयार रहता था । एक दिन वेश्या ने पूछा-“क्या आप सचमुच ही मुझसे प्रेम करते है ?” उसने कहा-“क्या इसमें भी सन्देह है?” वेश्या ने कहा-“अच्छा तो फिर तुम अपनी माँ का कलेजा लाकर दो तब मुझे यकीन आएगा ।” वह आदमी भागता हुआ अपनी माँ के पास गया और उसको मारकर कलेजा लेकर एकदम वेश्या के पास पहुँच ही रहा था कि मार्ग में ठोकर खाकर गिर पड़ा । तभी माँ का कलेजा बोला-“मेरे बच्चे! चोट तो नहीं आई कहीं?” पर उस मदमस्त को होश कहा? वेश्या के पास जाकर कलेजा रख दिया । पर प्रसन्न होने के बदले वह गुस्से से बोली-“अरे दुष्ट! तूने अपनी माँ का प्रेम न समझा तो मुझे क्या समझेगा ?”

कहने का अभिप्राय यह है कि वेश्या के ह्रदय में भी माँ के प्रति कितने पवित्र भाव थे, जिन्होंने उस आदमी की आँखें खोल दी ।

प्यारे बच्चो! माँ के प्रेम के साथ ही पिता का प्रेम भी कैसा पवित्र होता है, इसका उदहारण सुनिए- तहसील बटाला गावं कादियान में साधारण वर्ग के एक सज्जन थे । उसने अपने इकलौते पुत्र को अपने पेट पर पत्थर रखकर, अर्थात् भूखा-प्यासा रहकर, कठिन परिश्रम करके बहुत उत्तम शिक्षा दिलाई और फलस्वरूप लड़का दीप्ती कमिश्नर बना । जब बेटा इस पद पर पहुंचा तो उसको अभिमान हो गया । पर पिता को उसका पता न था, क्योंकि बह पिता को प्रतिमास 25 रूपए भेजता था । उसकी ख़ुशी की कोई सीमा न थी । वह सोचता, न जाने मेरा पुत्र कितना भक्त है । पिता के मन में विचार आया कि एक बार जाकर अपने पुत्र को अपनी आँखों से देख आऊं । पिता अपने मन में अनेक अभिलाषा लेकर गया । पर वहां का रंग-रूप देखकर उसके नेत्रों के सामने अँधेरा छा गया, क्योंकि एक पुरुष उसके पुत्र से पूछा-“यह कौन है!” तो उसने कहा- “अरे, यह तो मेरा पुराना नौकर है ।” इतनी बात सुनकर पिता पृथ्वी पर गिर गया । उसको इतना शोक हुआ जिसके फलस्वरूप उसकी तत्काल मृत्यु हो गई, क्योंकि उसकी आशाओं पर पानी फिर गया था ।

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प्यारे विद्यार्थियों ! पिता के अपमान की यह कोई अनोखी घटना नहीं । इसके समान हमारे पास बहुत घटनाएं है । कितनी लज्जा की बात है कि जो माता-पिता अपनी संतान पर सर्वस्व न्यौछावर करके योग्य बनावे, उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाए ! ऐसी बात कभी छिपती नहीं, जब लोगों को असली बात का पता चलता है तो वे घृणा की निगाहों से देखते है, क्योंकि वे समझ जाते हैं कि जो अपने माँ-बाप का नहीं हुआ, बह  हमारा क्या बन सकेगा ।

मेरे प्यारे विद्यार्थियों ! मैं चाहता हूँ, यह बात आपके ह्रदय में भली प्रकार बैठ जाए कि माता-पिता जीते-जागते परमेश्वर हैं तथा उनकी उसी प्रकार पूजा करनी चाहिए जिस प्रकार परमात्मा की । पूजा का यह अर्थ नहीं कि उनके आगे धूप और अक्षत रखो, वरन उनसे अधिक श्रद्धा किसी में भी न होम ऐसे भाव मन में रखने चाहिए । धन, दौलत तथा आराम उनके आगे कुछ नहीं समझना चाहिए, उनके मान मर्यादा के लिए सदा तुम्हे उद्दत रहना चाहिए ।

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शिक्षा :- ऐसी ममतामयी माता के साथ प्रत्येक को प्रीतियुक्त भाव से व्यवहार करना चाहिए । कभी भूलकर भी उनसे कोई कटु एवं अपशब्द नहीं कहना चाहिए । माता-पिता की सेवा नहीं करने वाला क्रित्घन होता है । उसकी संताने उसकी भी सेवा नहीं करती । जब आप किसी कार्य को करें तो विचार लेना चाहिए कि मुझे कोई ऐसा बुरा कार्य नहीं करना हाहिये जिससे माता-पिता का अपमान हो ! ऐसा करने से प्रत्येक कार्य में माँ-बाप आपको ह्रदय से आशीष देंगे और यह आशीर्वाद पाकर आप जीवन में सदा सुखी रहेंगे । हमारे धर्मशास्त्रों का भी यही आदेश है- मातृदेवो भव पितृदेवो भव, अर्थात् माता-पिता को देवतुल्य समझकर उनकी पूजा करनी चाहिए ।

 

  • वैदिक धर्मी

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