यूरोप खण्ड का वैदिक अतीत जो आज भी नाम, वर्ण, पूजा आदि में पाया जाता है ?

यूरोप में वैदिक संस्कृति के प्रमाण

यूरोप के भूगोल के सम्बन्ध में एक ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस खण्ड के अन्तरगत कई देशों के नामो का अन्त्यपद “ईय” है, जिसे Russia यानी ऋषिय, Prussia जो प्र-ऋषय शब्द है । Siberia का उच्चारण रहिया के निवासी ‘शिविर’ ही करते है । यह नाम पड़ने का कारण यही है कि वहां बहुत हिमपात और गतिमान अतिशीत वायु होने से पक्क्ति बस्ती नहीं होती थी । किसी कार्य हेतु जाने वाले व्यक्ति सीमित समय तक वहां शिविर बनाकर रहते और लौट जाते थे । Rumaina उर्फ़ Romania रमणीय शब्द ही है । बल्गारिया (Bulgaria) हो सकता हैं बालिगिरिया शब्द हो जिसका अपभ्रंश बालिगिरिय बनकर बल्गारिया बन  गया, क्योनी यूरोप में रामायण का प्रभाव रहा है । स्पेन और फ़्रांस को मिलाकर वर्तमान युग में इबेरिया (Iberia) कहते है । जो ‘इबिरीय’ शब्द है । कभी सारे यूरोप को ही ‘ईबेरिया’ अर्थात् ईबरीय कहते थे ऐसा जान पड़ता है । एथिओपिया (Ethiopia) एथिओपिय देश है । Austria अस्त्रीय (अस्त्रों का देश) है । Scandinavia स्कंदनाविय देश है । अर्मेनिया (Armenia) अर्मनीय नाम है । Albania अल्बनीय नाम है । विचार करने पर और भी ऐसे कई नाम यह लगभग सारे ही नाम ऐसे मिलेंगे जो वहां को प्राचीन वैदिक सभ्यता के द्योतक है ।

प्राचीन यूरोपीय समाज के चार वर्ण

स्ट्र्बो नाम के एक प्राचीन ग्रीक विद्वान् ने भूगोल का एक ग्रन्थ लिखा है । इस ग्रन्थ के द्वितीय खण्ड में पृष्ठ २३० से २३४ पर उल्लेख है कि “इबेरिया (उर्फ़ ईबरीय) के अधिकांश बहग में अच्छी खासी एक बस्ती है । उस प्रदेश के कुछ भाग काकेशिय पर्वत श्रंखला से घिरे हुए है । इस प्रदेश के निवसियों के भी चार वर्ण यानी वर्ग है । प्रथम श्रेणी के वे है जिनमें से राज लोग नियुक्त होते है । दूसरा वर्ग पुरोहित का है । तीसरा वर्ग किसान और सैनिकों का । चौथे में अन्य जन सम्मिलित है । उनके पूज्य देवता है सूर्य, बृहस्पति तथा चन्द्र । इबेरिया के समीप एक चन्द्र मंदिर है । राज के पश्चात पुरोहितों का सम्मान होता था । अल्बनीय जन वयोवृद्धो का बड़ा आदर करते है । माता-पिता और अन्य सारे ही गुरुजनों को अल्बनीय लोग पूज्य मानते है ।

ऊपर उद्धृत किये स्टबोकृत वर्णन से यह अनुमान निकलता है कि शिबिरीय, इबिरीय अदि नाम सारे यूरोप का निर्देश करते थे । किन्तु आजकल यूरोप के नैकहल्प के स्पेन पुर्तगाल-फ़्रांस वाले कोने को ही इबेरीय पेनिनसुला कहते है । इबेरिया नाम ही बिगड़कर यूरोप उर्फ़ ‘ईरूप’ यानी Europe बना, ऐसा प्रतिट होता है । विद्वान् मनीषि व वाचक इस पर विचार संशोधन करें ।

प्राचीन वैदिक डाक-व्यवस्था

आंग्लभाषा में एक कहावत है ‘History repeats itself’ यानी मानवी इतिहास में एक जैसी घटनाएं बार-बार होती है । वर्तमान युग में ‘शासन द्वारा डाक व्यवस्था चलाई जाती है’ । आम लोग यह समझ बैठे है कि इसे यूरोपीय लोगों ने ही सर्वप्रथम चलाया, किन्तु यह कल्पना सहीं नहीं है । प्राचीन वैदिक सभ्यता में भी डाक-व्यवस्था थी । एक मध्य युगीन यूरोपीय लेखक का कहना है कि डाक-व्यवस्था तो सर्वप्रथम भारतियों द्वारा ही चलाई गई थी ।

A Voyage to East Indies नाम का एक ग्रन्थ है, इसके लेखक है Fra Paoline da Tan Bartolomeo । वे रोमा उर्फ़ रोम नगर की Academy of Valetri के सदस्य थे और Propaganda यानी प्रचार संस्था में प्राच्य भाषाओँ के प्राध्यापक थे । उन्होंने प्राच्य द्वीपों का जो प्रवास किया उसका उन्होंने वर्णन लिखा है । उस ग्रन्थ के पृष्ठ १४७ पर दी टिप्पणी में फार्स्टर लिखते है “भारत में डाक-व्यवस्था चालू है । उस डाक-सेवा का नाम है ‘अंजला’ । प्राचीनकाल में इराण में भी एक प्रकार कि डाक-व्यवस्था उपलब्ध थी । उसे ‘अंगरस’ कहा करते थे । उसमें और अंजला में कुछ समानता दिखती है । सम्भावना ऐसी लगती है कि ईरानी डाक-सेवा, भारतीय डाक-सेवा का अनुकरण रूप हो ।”

Census संख्या शब्द है

आधुनिक युग में प्रत्येक देश में कितने लोग रहते है ? उनकी संख्या, उनके कामधंधे आदि का ब्यौरा प्रति दस वर्ष इक्कट्ठा कर संकलित तथा प्रकाशित किया जाता है । इसे ‘सेन्सस’ (Census) कहा जाता है ।  यह आंग्ल शब्द है । वास्तव में यह ‘संख्यस’ यानी संख्या संकलन’ इस अर्थ का संस्कृत शब्द है । इसे ऐसे कई प्रमाणों से जाना जा सकता है कि राष्ट्रीय या प्रादेशिक संख्या गणना की प्रथा वैदिक समाज व्यवस्था में अंतर्भूत थी । उपरोक्त बार्टोलोमिओ के ग्रन्थ में उस प्रथा का उल्लेख है । John Philip Wasdin ऑस्ट्रिया देश का निवासी था । वह वगैर जूतों के नग्न पैरों से ही चला करता था । साधु बनकर उसने Bartolomeo नाम धारण किया था जो संस्कृत ‘व्रतावलम्बी’ शब्द का ईसाई अपभ्रंश है । उस व्यक्ति का जन्म होस ग्राम में सन १७४८ में हुआ था । उसके प्रवास वर्णन के पृष्ठ २५७ पर उल्लेख है कि “भारत में कोई महिला प्रसूत होने पर पति को स्थानीय सरकारी अधिकारी को अपत्यजनक की वार्ता लिखवानी पड़ती थी ताकि उस विशिष्ट जमात को जनसँख्या सदैव पूर्णरूपेण ज्ञात हो सके ।” इसी प्रकार सम्बंधित विभागीय अधिकारी जन्म-मृत्यु की वार्ता और संख्या राजा तक पहुंचाते थे । भारतीय राजों के शासन की जनसँख्या का पूरा हिसाब-किताब रखने की यह प्रणाली इतनी प्राचीन है कि स्ट्बो नाम के प्राचीन ग्रीक ग्रंथकार ने भी उसका उल्लेख किया है । इसी प्रकार प्रकार मंदिर के पुरोहित भी अपने क्षेत्र के लोगों की जन्म-मृत्यु की सूची रखा करते थे ।

प्रत्येक शिशु के जन्म के समय होने वाली विधि के लिए ब्राह्मण बुलाया जाता था । मंदिरों के ब्राह्मणों का कर्तव्य होता है कि निजी विभाग में जन्म, मृत्यु, विवाह तथा प्रत्येक जात-पांत, आदि में होने वाली प्रत्येक महत्वपूर्ण घटना का ब्यौरा रखें । अत: उन ‘वारियर’ यानी वार्तावहियों से यानी सामाजिक खाता-बहियों से प्रत्येक घर और कुल के विवाह-सम्बन्ध, नात-गोत, व्यवसाय, जीवन-व्यवहार, साम्पत्तिक सामाजिक तथा शारीरिक परिस्थिति आदि की बारीकियों सहित परिपूर्ण जानकारी उपलब्ध रखना बड़े आश्चर्य की बात थी ।”

डायोसीस (Diocese) यानी देवाशीश

कृस्ती पंथ परम्परा में बिशप नामक धर्मगुरु के कार्य प्रदेश को डायसीस कहते है जो स्पष्टतया वैदिक प्रणाली का देवाशीश शब्द है । प्राचीन वैदिक प्रथा में प्रत्येक मंदिर के पुरोहित की निगरानी के विभाग को उस प्रदेश के देवता का आशीष या कृपाछत्र उर्फ़ दयादृष्टि प्राप्य है ऐसा माना जाता था । अत: ऐसे प्रदेश को देवाशीश कहने की वैदिक परम्परा अभी भी है । प्रत्येक विभाग की स्नेहपूर्ण देखभाल और जानकारी परमात्मा के प्रतिनिधि के रूप में प्रत्येक मंदिर का विद्वान वेदज्ञ पण्डित रखा करे, इससे और परिपूर्ण तथा उत्तम व्यवस्था क्या हो सकती है । कृस्ती पंथ में भी यही प्रथा प्रचलित है ।

वैदिक शिक्षा पद्धति

बार्तोलोमिओ ने भारत में प्रचलित जो वैदिक शिक्षा- पद्धति देखी लगभग वाही सारे विश्व में कृतयुग से महाभारतीय युद्ध तक व्यवहार में थी । महाभारतीय युद्ध से जो सर्वनाश हुआ उससे वैदिक विश्व साम्राज्य भंग होने से वैदिक शिक्षा प्रणाली का यकायक अंत हो गया । किन्तु उस वैदिक संस्कृति की जड़े भारत में गहरी गढ़ी होने के कारण वह प्राचीन वैदिक संस्कृति छिन्न-भिन्न अवस्था में ही क्यों न हो, भारत में टिकी रही । इस महान वैदिक शिक्षा वृक्ष की विश्व में फैली हुई शाखाएं वैदिक विश्व साम्राज्य नष्ट होने के कारण सुखकर कट गई । सारे विश्व में वैदिक गुरुकुल शिक्षा ही प्रसृत थी । इसका एक सशक्त प्रमाण वर्तमान शिक्षा प्रणाली की प्रचलित परिभाषा में ही पाया जाता है । वर्तमान यूरोपीय शिक्षा-प्रणाली में प्रयोग होने वाली वह परिभाषा पूर्णतया वैदिक संस्कृत है ।

अठारहवीं शताब्दी में जो गुरुकुल भारत में विद्यमान थे उनका प्रचलन कैसा था उसका वर्णन बार्तोलोमिओ ने लिखा है । उस समय तक ईसाई पथ और इस्लाम, इन दोनों ने मिलकर यूरोप, अफ्रीका आदि विश्व के अन्यान्य प्रदेशों से वैदिक शिक्षा-प्रणाली को नष्ट कर दिया था ।

अमेरिका

अमेरिका खंडो में वैदिक सभ्यता के प्रमाण आज भी मौजूद है कैसे ?

भारतीय छात्रों को जो अन्य विषय पढाए जाते है वे है छन्दशास्त्र. आत्मरक्षण, वनस्पतिशास्त्र. वैद्यकशास्त्र. नौकायन विद्या, भाला फेंकना, कन्दूक क्रीड़ा, शतरंज, ज्योतिष, नीतिशास्त्र, स्वाध्याय, पांच वर्ष तक बिना कोई प्रश्न पूछे कही हुई पढ़ाई चुपचाप ग्रहण करते रहने की शिस्त छात्रों को लगाईं जाती है । अन्य देशों में सबको एक ही समान कर्तव्य करना होगा ऐसा समझकर एक ही प्रकार की समान शिक्षा सब छात्रों को दी जाती है । भारत में ऐसा नहीं है । प्रत्येक विशिष्ट जाती के अनुसार जिस भारतीय को जो व्यवसाय करना पड़ेगा और जो कर्तव्य निभाना पड़ेगा उसे ध्यान में रखकर हर एक की शिक्षा भिन्न प्रकार की होती है । तथापि इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि जब से भारतीय राजाओं को विदेशी आक्रामकों ने परास्त किया तब से भारतीय शास्त्र और विद्याओं का स्तर गिर गया है और प्रान्त के प्रान्त लूटपाट के शिकार बन गए है । अनेक व्यवसायों की मिलावट हो गई है । पराए आक्रमणों के पूर्व भारतीय लोग धनि और सुखी होते थे । नीति-नियमों का पालन हुआ कतरा और न्याय तथा शांति का वातावरण हुआ करता था । आप सभी ने देखा भी होगा की त्रावणकोर नरेश राम वर्मा की संतानों को उसी तरह से शिक्षा दी जाती थी जैसे शूद्रों को ।”

बर्तोलोमिओ के प्रवास-वर्णन के अनुवादक ने टिप्पणी में लिखा है कि ग्रीक दर्शनशास्त्री ने निजी शिक्षा भारत में ही पाई होगी क्योंकि उसके शिष्यों पर भी पांच वर्ष तक कोई प्रश्न नहीं पूछने का बंधन लागू था ।

यह आवश्यक नहीं कि पाइथोगोरस की शिक्षा भारत में हुई हो । वह भारत में भले ही आया हो या पढ़ा भी हो किन्तु कहने का तात्पर्य यह है की किसी की शिक्षा चाहे प्रदेश में हुई हो, यत्र-तत्र-सर्वत्र प्राचीन काल में वैदिक संस्कृति होने के कारण वैदिक शिक्षा ही दी जाती थी जैसे कि वर्तमान युग में चाहे कहीं पढ़ो, पाश्चात्य यूरोपीय शिक्षा प्रणाली प्रचलित है।

विद्वानों का प्रमाद

जब प्राचीन विश्व के इतिहास में भारतीय और अन्य प्रदेशों के व्यवहार या परिभाषा में कोई समानता पाई जाती है तो वर्तमान विद्वज्जन तर्क-वितर्क करते रहते है कि या तो पश्चिमी लोगों ने भारत का अनुकरण किया होगा या भारत ने उनका । यह दोनों अनुमान गलत है । समझने की बात यह है की विश्व के निर्माण से कृस्तपन्थ के प्रसार तक सारे विश्व में वैदिक संस्कृति ही चलती रही । महाभारतीय युद्ध के पश्चात वह वैदिक संस्कृति टूटी-फूटी लंगड़ी-लूली अवस्था में बसर करने लगी । अन्य प्रदेशों की अपेक्षा भारत में वैदिक संस्कृति की अवस्था अच्छी थी किन्तु फिर भी वह इतिनी अच्छी या शुद्ध नहीं रही जितनी कि महाभारतीय युद्ध के पूर्व थी ।

संस्कृत विश्वभाषा थी

संस्कृत भाषा के प्रति जर्मन विद्वानों को बड़ी श्रद्धा, आदर और प्रेम होता है । उदाहरणार्थ आकाशवाणी द्वारा संस्कृत में कार्यक्रम आधुनिक युग में भारत से भी पूर्व जर्मन देश द्वारा आरम्भ किया गया । जर्मन भाषा का ढांचा संस्कृत जैसा ही होता है जैसा की प्रथमा से संबोधन तक की विभक्तियाँ, संस्कृत जैसी जर्मन भाषा में भी होती है । ऐसा क्यों ? वह इसलिए कि जर्मनी में प्राचीनकाल में संस्कृत का प्रचलन होने से उस भाषा के प्रति उनका जन्मजात लगाव रहा है । यद्यपि उस अतीत का वर्तमान युग में किसी को ठीक ज्ञान या स्मरण नहीं रहा तथापि पंद्रह सौ वर्षो के ईसाई प्रचार से जर्मन लोगों को उनके कृस्तपूर्व इतिहास की विस्मृति करा दी गई है ?

जर्मनी में संस्कृत का अध्ययन

आधुनिक युग में जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों में संस्कृत का अध्ययन ईसाई पादरियों ने आरम्भ किया । उस अध्ययन में संस्कृत के प्रति प्रेम, यह उद्देश्य न होकर कृस्त धर्म प्रसार के हेतु संस्कृत के अध्ययन को एक साधन बनाना यह मूल उद्देश्य था ताकि संस्कृत के धर्मग्रन्थ पढ़कर उनकी किसी प्रकार निंदा कर भारत की कर्मठ हिन्दू जनता के मन में हिन्दू धर्म के प्रति घृणा पैदा की जा सके और उन हिन्दुओं को ईसाई बनाया जा सके ।

Schlegel कुल के तीन भाई वह नाटक पढ़कर बड़े प्रभावित हुए । उनेमं से दो भाइयों ने आधुनिककाल में जर्मन देश में संस्कृत भाषा के अध्ययन का आरम्भ किया ।

सन १८१८ में W. Von Schlegel बान विश्वविद्यालय में संस्कृत का प्राध्यापक बना । उसने सन १८२३ में भगवद्गीता और सन १८२९ में रामायण के जर्मन अनुवाद प्रकाशित किये ।

मदरसा

मदरसा हिन्दू ‘शाला’ का इस्लामी अनुवाद है

वैदिक सोमलता

कई लोग अज्ञानवश “वैदिक काल-वैदिक काल” ऐसा उल्लेख करते रहते हैं । इस उद्गार में अनजाने उनकी यह अस्पष्ट धारणा प्रकट होती है कि मानव द्वारा किसी विशिष्ट समय में वेद काव्य रचा गया । यह बड़ी भूल है । वैदिककाल वही होगा जो सृष्टि या मानव की उत्पत्ति का प्रथम दिन था । क्योंकि मानव का निर्माण करते ही इस भवसागर में उसके मार्ग-दर्शन के लिए जो ईश्वरीय ज्ञान-ग्रन्थ मानव को दिया गया उसका नाम है ‘वेद” ।

वेदों में सूचित क्रियाकर्मो में सोमरस के अनेक गुणों का तथा सोमरस देवताओं को अर्पण करने का उल्लेख बार-बार आता है । सोमरस को पान या तैयार करना बड़ा महत्व रखता था । ऋग्वेद का नौवा मण्डल सोमरस से ही सम्बंधित है । उस सोमरस के अनेक उपयोग उस मण्डल में अलंकारिक भाषा में वर्णित है ।

ऋग्वेद के अनुसार ‘सोम’ का बूटा अति प्राचीनकाल में श्येन के राजिक प्रदेश के पार से स्वलोक के ‘द्यु’ प्रदेश में लाया गया था । वह पहाड़ी में पाया जाता है । सुशोमा नदी घाटी के शर्यणवट  भाग के ARFIKIAN प्रदेश में पाई जाने वाली सोम वनस्पति बड़ी गुणकारी कही जाती है । वह राजिक प्रदेश, कश्मीर उत्तर में हिमालय की पहाड़ियों के पार है ।

वैमानिक शास्त्र में विमान से सम्बंधित चौकाने वाले रहस्य

कुछ हरे-पीले ऐसे सोमवल्ली के पत्ते होते हैं । उन पत्तों पर मृदु तंतुओं का आवरण होता है । उन पत्तो का आकार मोरपंख जैसा होता है । बहते जल में उन पत्तो को धोकर पत्थर से कूटा जाता, उन पत्तों की चटनी में जल मिलाकर उस मिश्रण को कपड़े में से छाना जाता, उस रस को गौदुग्ध या मधु से मिलाकर उसके भिन्न-भिन्न गुणकारी रसायन बनाये जाते है ।

सोमवल्ली के शक्ति और तेजप्रदायी गुणों के कारण उसकी टहनियाँ या पत्ते वैदिक समारोहों में मण्डप में लागाये जाते । कृस्तपंथी लोग क्रिसमस त्यौहारों में निजी घरो में Holly या Mistletor नामक वनस्पति की टहनियों या पत्तों को शुभ मानकर को प्रदर्शित करते है वह प्राचीन लुप्त सोमवल्ली का ही अर्वाचीन प्रतिक है ।

प्राचीन ‘चोल’ साम्राज्य

भाषा परीक्षा में जैसे किसी टूटे-फूटे, आधे-अधूरे वाक्य में सोच समझकर योग्य शब्द बार कर वाक्य को पूरा और सार्थक बनाना पड़ता है, उसी प्रकार खण्डित इतिहास के अवशेषों का निरिक्षण कर अज्ञात कड़ियों को जोड़ना पड़ता है । ऐसी ही एक कड़ी ‘चोल’ नाम से मिलती है ।

प्राचीन भारतीय राजघरानों में ‘चोल वंश’ का नाम प्रसिद्द है । हाल में इसे अनेक राजवंशो  में से एक गिना जाता है । किन्तु हो सकता है कि महाभारतीय युद्ध के पश्चात जिन अनेक छोटे-मोटे राजवंशो का नाम आता है उनमें चोल वंश का साम्राज्य सबसे विशाल रहा हो, क्योंकि उसके चिन्ह एक विस्तीर्ण प्रदेश का और उसमें रहने वाले लोगों का पड़ा ।

चरक द्वारा लिखित “चरक संहिता” आज भी प्रख्यात क्यों है ?

धरती और धरती पर जीव सृष्टि का मूल आधार सूर्य ही है । धरती पर हवा, वर्षा आदि का कर्ता-धर्ता भी सूर्य ही है । इस दृष्टि से सूर्य एक प्रकार से नित्य दर्शन देने वाला प्रत्यक्ष भगवान है ।

अत: वैदिक संस्कृति में रथसप्तमी एक ऐसा त्यौहार होता है जिसमें सूर्य की रथ पर आरूढ़ प्रतिमा दिवार पर या भूमि पर खींचकर उसकी पूजा की जाती है । प्राचीन यूरोप में भी यही प्रथा थी । या प्राचीन यूरोप की वैदिक संस्कृति का ठोस प्रमाण है । वैसे सूर्य रथ की लगभग 1500 वर्ष कृस्तपूर्व की एक प्रतिमा नीचे के चित्र में प्रदर्शित है । यूरोप के डेन्मार्क देश में Trundholm नाम के गांव के एक दलदल से सन १९०२ में यह सूर्य रथ का ढांचा पाया गया । हो सकता है कि इस रथ के सात अश्वों में से जो गोलाकार थाली-सी रथ पर आरूढ़ हा वह है सुवर्ण रंग की चमकीली सूर्य प्रतिमा । सूर्य के उत्तरायण के स्वागत के रूप में रथसप्तमी का पर्व लगभग जनवरी मास के अंत में पड़ता है ।

  • पुरुषोत्तम नागेश ओक

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