वेद के अंग कौन-कौन से है जो उन्हें समझने में सरल बनाते है ?

वेदों के अंग कौन से है ?

वेदों के छ: अंग है ।

शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द: ।

  1. शिक्षा :-

इसमें पाणिनि मुनि कृत पाणिनीय शिक्षा आदि ग्रन्थ है ।

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  1. कल्प :-

  1. इसमें साधारण यज्ञ से लेकर अश्वमेघ आदि बड़े-बड़े यज्ञों का प्रकार वर्णित है । वैदिक और स्मार्त दो प्रकार के यज्ञ है । इन कल्पग्रंथों की रचना का आधार ब्राह्मण ग्रन्थ है । श्रौत सूत्र ग्रंथों में बड़े-बड़े यज्ञों का वर्णन है और गृह्य सूत्रों में गृहस्थ आदि की दिनचर्या और पांच महायज्ञ तथा पार्वणिक यज्ञों का वर्णन है । वर्तमान में उपलब्ध श्रौत और गृह्य सूत्र प्राय: शाखा सहिंताओं और ब्राह्मण ग्रंथों पर आश्रित है ।
  2. ऋग्वेद द्वारा याज्ञिक पद्धति से सम्बन्ध रखने वाला आश्वलायन और श्रौत और सूत्र और आश्वलायन ही गृह्य सूत्र ग्रन्थ है ।
  3. यजुर्वेद सम्बन्धी कात्यायन और श्रौत-सूत्र और पारस्कर गृह्य सूत्र ग्रन्थ है ।
  4. सामवेद सम्बन्धी षड्विंश-सामब्राह्मण श्रौत सूत्र और गोभिल गृह्यसूत्र प्रसिद्द है ।

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  5. अथर्ववेद सम्बन्धी शौनकीय श्रौत और गृह्यसूत्र उपलब्ध हैं ।

इन के अतिरिक्त अन्य भी गृह्यसूत्र है ।

ऋषि दयानन्द ने कर्म कांड को मूल संहिताओं के आधार पर रखा है अत: उन्होंने संस्कारविधि में एक ही संस्कार में चारों वेदों और पृथक् अनेक गृह्यसूत्रों को क्रिया-काण्ड केलिए प्रस्तुत किया है । यह विशेषता और भी की है कि मध्य कालीन याज्ञिक ने अथर्ववेद को यज्ञ परक न मानकर अथर्ववेद के मन्त्रों का किसी भी क्रिया में विनियोग नहीं किया, परन्तु ऋषिदयानंद ने इस मत को स्वीकार नहीं किया और यथास्थान चारों वेदों के मन्त्रों को क्रियाकर्म में विनियुक्त किया है ।

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3. व्याकरण:-

  1. व्याकरण वेद के अंग में तीसरा अंग है जो वेदों को समझने में बहुत सहायक है । इस में पाणिनि मुनि कृत अष्टाध्यायी ग्रन्थ आदि प्रसिद्द है । अन्य भी प्राचीन व्याकरण ग्रन्थ थे परन्तु उनकी उपलब्धि अब नहीं है । अष्टाध्यायी ग्रन्थ में यह विशेषता है कि इस में लौकिक और वैदिक व्याकरण नियम साथ ही सूत्रों में दिए गए है । सिद्धांत कौमुकी आदि में वैदिक प्रक्रिया को पृथक् रख दिया है । इस से यह अनर्थ हो गया कि व्याकरण पढने पढ़ाने वाले प्राय: वैदिक नियमों का अध्ययन नहीं करते । इस से वेद समझने में बड़ी कठिनता होती है । अष्टाध्यायी में कुछ सहस्त्र सूत्रों में समस्त लौकिक और वैदिक व्याकरण दे दिया गया है । इसी पर पतंजलि मुनि कृत महाभाष्य है जिस में बड़ी सुगम और सुबोध रिती से व्याकरण के रहस्य समझा दिए गए है । इन्हीं के आधार पर अनेक काशिका, सिद्धांत कौमुदी आदि व्याकरण ग्रन्थ रचे गए है । व्याकरण को ही शब्द शास्त्र कहते है । शब्द ज्ञान होने पर अन्य शास्त्रों के ज्ञान प्राप्त करने में सुगमता होती है । सर्वप्रथम व्याकरण शास्त्र का ज्ञान मुख्य है । इस के विना अन्य शास्त्रों में गति हो ही नहीं सकती ।

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    जब संहिताओं को शाखा रूप दिया गया तब मूल संहिता तथा शाखा संहिताओं के मन्त्रों को सामान्य रूप में पढने तथा यज्ञों में प्रयोग करते समय उच्चारण करने में कुछ विशिष्टता की गई । ऋक् मंत्र, यजु: मंत्र तथा साम मन्त्रों के उच्चारण और स्वरों में भी भेद किया गया । इन सब बातों को प्रकाशित करने के लिए व्याकरण के विशेष अंगों प्रातिशाख्यों की रचना की गई जैसे-

    ऋक्-प्रातिशाख्य और यजु: -प्रातिशाख्य आदि ।

    यह ध्यान रखने की बात है कि मूल संहिताओं के मन्त्रों के सस्वर उच्चारण में कोई भिन्नता नहीं है । केवल यज्ञ काल में उच्चारण समय उदात्त अनुदात्त और स्वरित स्वरों का भेद कुछ शिथिल किया जाता है । परन्तु शाखा ग्रंथों में तो वर्ण के उच्चारण में भी भिन्नता की गई । जैसे “य्” को “ज्” और “ष्” को “ख” का उच्चारण कहीं कहीं दिया गया है । परन्तु यह बात अशास्त्रीय ही समझनी चाहिए । मूल संहिता-उच्चारण वर्णानुसार सस्वर ही शुद्ध है ।

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4. निरुक्त :-

  1. निरुक्त वेद के अंग का चौथा अंग है जो यास्क्मुनी कृत निघंटु पर ही स्वयं यास्कमुनी का भाष्य निरुक्त कहलाता है । प्राचीन काल में अनेक निरुक्त ग्रन्थ थे, परन्तु वर्तमान में यास्कमुनी निघंटु और उसका भाष्य निरुक्त ही पठन पाठन में आता है । निघंटु में वेदों के कुछ शब्दों का विषयाकार संग्रह किया गया और निरुक्त में उन का व्याख्यान है । निघंटु एक प्रकार से वैदिक कोष है और निरुक्त में वेदार्थ करने की प्रक्रिया समझा जी गई है । निरुक्त में आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक अर्थों की प्रणाली खोलकर बताई गई है । वेदभ्यासी महाशयों को निरुक्त का मनन अत्यावश्यक है । निरुक्त के विना वेदार्थ में प्रवेश नहीं हो सकता । व्याकरण केवल शब्द की सिद्धि बतला देगी परन्तु निरुक्त उस का अर्थ बतलायेगा । वेदार्थ में सामान्य कोष उपादेय नहीं है ।

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  2. 5. ज्योतिष :-

  3. ज्योतिष वेद के अंग का पांचवा अंग है इसमें सुर्यासिद्धांत और सिद्धांत शिरोमणि आदि ग्रन्थ प्रसिद्द है । इस शास्त्र में भूगोल और खगोल विद्या का वर्णन है । गणित और विज्ञान इस अंग का मुख्य प्रयोजन है । गणित में अंक, बीज और रेखा सम्बन्धी तीनों गणित विषयों का प्रतिपादन है । आकाश में सूर्य आदि समस्त नक्षत्रों और पृथ्वी की गति तथा उनका सम्पूर्ण वर्णन पाया जाता है । ज्योतिष शास्त्र नेत्र के समान है । यज्ञों के काल निर्णय और वेदी, भवन, यन्त्र आदि निर्माण ज्ञान के द्वारा यह अंग कल्प आदि अंगों का सहायक और उपकारक हैं ।

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  4. 6. छन्द :-

छन्द: वेद के अंग का छठा अंग है इसमें  पिंगल ऋषि प्रणित पिंगल सूत्र है, जिनसे छन्दोबद्ध रचना का ज्ञान होता है । इससे साहित्य का सौष्ठव बढ़ जाता है । वाक्य रसात्मक हो जाता है । छन्द: ज्ञान के विना यति और चरण व्यवस्था का बोध नहीं होता और इस के विना वेद तथा अन्य शास्त्रों का अर्थ ठीक रूप में नहीं समझा जा सकता है । इस विषयक और भी ग्रन्थ है परन्तु पिंगल ही उपादेय है ।

इन छ: वेद के अंग से  से वेदार्थ में सहयोग मिलता है तथा अन्य शास्त्रों में भी गति होती है । इसी कारण इनका अध्ययन करना चाहिए ।

 

  • वैदिक धर्मी

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