वेद भाष्य कौन से है और किस भाष्यकार के उत्तम भाष्य है ?

वेदों के भाष्य किसने ठीक-ठीक लिखे है ?

वेद भाष्य

अति प्राचीन काल में पद-पाठ, शाखा, ब्राह्मण-ग्रन्थ, निघंटु और निरुक्त आदि वेदों के भाष्य के रूप में काम देते थे । परन्तु महाभारत कल के पश्चात ऋषि परम्परा प्राय: बंध हो चली । महाभारत ने आर्यावर्त और वैदिक धर्म को बड़ा धक्का पहुँचाया है । वैदिक आर्य परम्परा उस काल में समाप्त हो गई । महामुनि जैमिनी (महर्षि व्यास के शिष्य) के पश्चात कोई ऋषि कोटि का महापुरुष आर्यावर्त में उत्पन्न नहीं हुआ । इसमें कोई संदेह नहीं कि बहुत ऊँची के महा विद्वान् आचार्यों ने भारत को अलंकृत किया परन्तु ऋषि परम्परा टूट गई । 5 सहस्त्र वर्षों के पश्चात पुन: ऋषि कोटि के महापुरुष स्वामी दयानन्द ने विक्रम की उन्नीसवीं शती के उतरार्ध में जन्म लेकर ऋषित्व के दर्शन आर्य जाति को कराये ।

सृष्टि के आरम्भ में ज्ञान और भाषा की उत्पत्ति क्यों और कैसे हुई ?

महाभारत के पश्चात वेद और वेद के कोष निघंटु-निरुक्त पर स्वतंत्र भाष्य रचे गए । ये सब वेद भाष्य ग्रन्थ प्राय: वेदार्थ पद्धति से रहित और सांप्रदायिक कोटि के है । इनमें कहीं कहीं शुद्ध सरणी की झलक भी दिखाई नहीं पड़ती है । कुछ वेद भाष्यकारों के नाम जिन्होंने समय-समय पर वेद के कुछ अंशों पर संस्कृत भाष्य रचे –

  1. सायन-चारों वेदों के भाष्यकार हैं । इन का भाष्य निम्न कोटि के कर्म कांड (याज्ञिक प्रक्रिया और अनित्य इतिहास से भरा पड़ा है) 2. स्कन्द स्वामी, 3. उद्गीथ, 4. माधव, 5. आत्मानंद, 6. रावण (यह दक्षिण का अर्वाचीन पंडित था) 7. उव्वट, 8. महीधर इन का यजुर्वेद भाष्य अत्यंत अश्लीलता से भरा और कुरुचिपूर्ण है), 9. मुद्गल, 10. देवस्वामी, 11. शौनक, 12. भवस्वामी, 13. ऋषि दयानन्द ।

    सत्य बोलने वाले मनुष्यों को वेदों में क्या महत्व दिया गया है ?

ऋषि दयानन्द का यजुर्वेद पर सम्पूर्ण और ऋग्वेद पर 7 वे मंडल के 62 वें सूक्त तक भाष्य उपलब्ध है । ऋषि भाष्य से वेद की अपूर्व महत्ता प्रकट होती है । इस भाष्य में शतपथ-ब्राह्मण, निरुक्त, अष्टाध्यायी और महाभाष्य के प्रमाण बिखरे पड़े है । भाष्य में सर्वथा ऋषि परम्परा को निभाया गया है ।

ओउम् जाप से सभी समस्याओं का क्षण में समाधान

निरुक्त ग्रन्थ स्वयं वेद के भाष्य रूप में है । इस पर भी अनेक भाष्य टिकाये लिखी गई है जिन के तीन अति प्रसिद्द भाष्यकार है-

स्कन्द स्वामी, देवराज यज्वा और दुर्गाचार्य । इन भाष्यों को प्रमाण कोटि में नहीं रखा जा सकता । इनसे केवल उपयोग लिया जा सकता है ।

ऋषि दयानन्द के वेद भाष्य में एक अपूर्वता और है कि उन्होंने अपने वेद  भाष्य में वर्तमान पद-पाठ, शाखा-कार और नैरुक्त तथा ब्राह्मण भाष्य-कारों से ऊपर उठकर वेदानुमोदित भाष्य किया है । वेद के ऋषि, देवता, छन्द: और स्वर ज्ञान पर भी स्वतंत्र व्यवस्था दी है । इस से प्रतीत होता है कि ऋषि दयानन्द वेद मन्त्रों के अर्थों को योगज-दृष्टि से साक्षात् करते थे । चारों वेदों का पूर्वापर उनको ज्ञात था । अत: उन्होंने आर्ष प्रणाली के अनुसार ही वेद-भाष्य किया है । ऋषि के वेद भाष्य में एक ही मंत्र के शब्दों के कई-कई अर्थ देकर मंत्र के आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक अर्थ प्रकाशित किये गए है । यह भाष्य चमत्कार पूर्ण है । स्वदेशी एवं विदेशी संस्कृतज्ञ ने उन से मतभेद रखते हुए भी भाष्य की अपूर्वता को स्वीकार किया है ।

BIBLE ईश्वर प्रेरित ग्रन्थ है या नहीं तर्क की कसौटी पर

  • वैदिक धर्मी

Follow:- Thanks Bharat On YouTube Channel