श्रद्धानंद का आर्य समाज के प्रति समर्पण भाव कैसे जगा ?

शुद्धि आन्दोलन के संस्थापक एवं संचालक स्वामी श्रद्धानंद

स्वामी श्रद्धानंद का जन्म जालंधर जिले के तलवं स्थान में सन १८५६ ई. में हुआ था ।पुरोहित ने जन्म का नाम बृहस्पति रखा पर पिता लाला नानकचन्द्र ने इनका मुंशीराम नाम रखा । बाद में सन्यास लेने पर आपका नाम स्वामी श्रद्धानंद हुआ । बालक मुंशीराम की शिक्षा फारसी से आरम्भ हुई क्योंकि उन दिनों फारसी का बोलबाला था । इनके पिता बरी में पुलिस इंस्पेक्टर थे ।

बचपन मेंबलक मुंशीराम बड़ा वाचाल और ह्रष्ट पुष्ट था । सब बालकों का नेता रहता था । पढने लिखने में मनमौजी था । साथियों के झगडे का फैसला करने में उसका मन बहुत लगता था । पिता की धार्मिक ब्रिटी के कारण इसका भी धर्म के पटती झुकाव था । अंधविश्वासों और पाखंडों, छुआछुत मूर्ति पूजा आदि के प्रति इसको प्रारंभ से ही अश्रद्धा हो गई थी ।

ऋषि दयानन्द दर्शन

24 श्रावण संवत् १९३६ को बरेली में स्वामी दयानन्द का आगमन हुआ । वहां पर उनके बहुत व्याख्यान हुए । मुंशीराम के पिता कोतवाल थे अत: उन्हें ही शांति की व्यवस्था करनी होती थी । कभी-कभी वे भी व्याख्यान सुन लेते थे ।

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व्याख्यानों से प्रभावित होकर वे अपने पुत्र मुंशीराम को भी लाने लगे । पिता के अनुरोध पर पुत्र भी व्याख्यान सुनने लगा । ऋषि दयानन्द के दर्शन करते ही ऋषि जीवन की छाप उनके ह्रदय पर पड़ी । व्याख्यान में अनेक प्रतिष्ठित लोग, अधिकारी, पादरी तथा यूरोपियन विद्वानों की उपस्थिति देखकर मुंशीराम भी दत्तचित्त होकर व्याख्यान सुनने लगे । ओउम् पर व्याख्यान था । सुनते ही मस्तिष्क में ईश्वर से अनुराग सम्बन्धी भाव और विचार चक्कर काटने लगे । ऋषि दयानन्द के व्याख्यानों से उनके ह्रदय में धार्मिक भावों का स्त्रोत बहने लगा । टाउन हाल में स्वामीजी का व्याख्यान होता था । मुंशीरामजी व्याख्यानों से इतने अधिक प्रभावित हुए कि व्याख्यान होने के समय से बहुत पूर्व आकर टाउनहाल के द्वार पर बैठ जाते तथा आचार्य दयानन्द को सबसे पहले अभिवादन करने का सौभाग्य प्राप्त करते । स्वामीजी की दिन्चाया से भी मुंशीराम प्रभावित हुए तथा योगाभ्यास के समय स्वामीजी को समाधि अवस्था में देखकर आश्चर्यान्वित होते ।

मुंशीरामजी कुछ दिनों तक तहसीलदार भी रहे पर स्वाभिमानी व्यक्तित्व के कारण नौकरी से त्यागपत्र दे दिया । पिता ने इन को वकालत पढ़ाने का निश्चय किया । संवत् १९३७ विक्रमी में ये लाहौर में कानून की शिक्षा प्राप्त करने लगे । वहां मुख्त्यारी की परीक्षा पास की ।

आर्य समाज के सदस्य

मुख्त्यार बन कर जालंधर में वकालत का काम शुरू किया । वकालत भली भांति चलने लगी । लाहौर में रहते हुए अपनी ‘पुनर्जन्म’ विषय की जिज्ञासा शांत करने के लिए ऋषि दयानन्द के प्रसिद्द ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ को पढ़ा और बड़ी शांति हुई । सत्यार्थ प्रकाश पढने से आर्य समाज की और इतना झुकाव हुआ कि आप लाहौर आर्य समाज के सभासद बन गए । स्वामी दयानन्द के अन्य ग्रंथों का भी खूब अध्ययन किया

पिताजी की नाराजगी

पिता को पता लगा की मुंशीराम आर्यसमाजी बन गया है तो वे दुखी हुए । सोचा शायद समझाने से ठीक हो जायेगा । काफी कोशिश की पर जो रंग एक बार चढ़ गया वह फिर कभी नहीं उतरा । मुंशीरामजी जिस चीज़ को ठीक समझते थे उसका पालन करने में किसी बात की परवाह न करते थे ।विचारों में मतैक्य न होने पर भी मुंशीराम पिता के परमभक्त थे । अपने भाइयों से भी बहुत स्नेह रखते थे ।

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कार्य करने की शक्ति

मुंशीरामजी में कार्य करने की अनोखी शक्ति थी । रात दिन कार्यों मेंजुते रथे थे । आर्य समाज के आर्थिक साधनों को बढाने के लिए उन्होंने ‘आता और रद्दो फंड’ भी शुरू किया था । वे एक सफल व उच्च कोटि के वकील भी बन गए पर उनका जीवन बड़ा सादा था ।

स्त्री शिक्षा का कार्य

मुंशीरामजी कट्टर राष्ट्रवादी थे । कांग्रेस की शाखाओं का गठन करने, प्रचार प्रसार करने का उन्होंने पंजाब में भरी काम किया । उनका जीवन क्रियात्मक था । उन्होंने स्त्री शिक्षा की ओर भी ध्यान दिया । जालंधर और पुरे पंजाब में प्रथम महिला विद्यालय खोलने वाले मुंशीराम ही थे । एक प्रकार से वे स्त्री शिक्षा के जन्म दाता थे ।

प्रचार कार्य

आर्य समाज के उद्देश्य को फलीभूत करने के लिए ‘सद्दर्म प्रचारक’ नमक पत्र भी निकाला । इस पत्र के द्वारा उन्होंने आर्य समाज का भरी काम किया । आर्य समाज के ‘प्रचार कार्य’ को आगे बढाने में भी मुंशीरामजी ने कोई कसर नहीं रखी । योग्यता ओर कार्यों के कारण आप अनेक वर्षों तक आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के प्रधान और बाद में सार्वदेशिक सभा के भी प्रधान रहे ।

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गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना

भारतीय संस्कृति और ऋषियों द्वारा प्रदर्शित प्रणाली के द्वारा भारतीयों को शिक्षा दिलाने हेतु अपने जी जान एककर हरिद्वार के पास कांगड़ी में गुरुकुल की स्थापना की जो आज एक विश्वविद्यालय है । इनके लिए आपके ही प्रयत्नों से लाखों रूपए इक्कट्ठे हुए आपका त्याग इतना महान था कि आपको जनता ने ‘महत्मा’ पद से विभूषित किया । देश के सभी राष्ट्रीय नेताओं से आपका निकट संपर्क हो गया ।

संन्यास एवं आज़ादी संग्राम

समय पर आपकी परीक्षाएं होती रहीं जिनमें आपने महान साहस का परिचय दिया है । अपने 25 वर्ष तक मुख्याधिष्ठता रूप में गुरुकुल की सेवा की । सन १९१९ ई. में आपने संन्यास ले लिया और स्वामी श्रद्धानंद कहलाये । आपने अपनी सम्पत्ति आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब को भेंट कर दी । संन्यास के बाद आपने भारत की राजधानी दिल्ली में आसन जमाया । यहाँ रहते हुए आपने आज़ादी की लड़ाई में बढ़ चढ़ का भाग लिया । रौलट एक्ट के विरुद्ध देशव्यापी आन्दोलन में दिल्ली का नेतृत्व आपने ही किया । आप में अदम्य साहस और वीरता थी ।

अन्य महत्वपूर्ण कार्य

स्वामी श्रद्धानंद ने हिन्दू मुस्लिम एकता तथा अछूतोद्धार के लिए भी महत्वपूर्ण कार्य किया । सन १९१९ ई. में जलियाँ वाला बाग़ हत्याकाण्ड के बाद अमृतसर में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष आप ही थे । सर्व प्रथम कांग्रेस अधिवेशन में हिंदी का प्रयोग करने वाले स्वामी श्राद्धनंद ही थे । आपने शुद्धि और हिन्दू संगठन का भी कार्य किया । वे राष्ट्रीयता व वीरता के पुजारी थे । मथुरा में जब ऋषि दयानन्द की शताब्दी मनाई गई रो उसके प्रधान भी आप ही थे ।

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बलिदान

शुद्धि आन्दोलन के कारण मुसलमान आपके विरोधी हो गए । 23 दिसम्बर सन १९२६ ई. को जब आप श्रद्धानंद बाजार दिल्ली स्थित अपने मकान में आराम कर रहे थे तब एक मदान्ध मुसलमान अब्दुलरशीद ने पिस्तौल से तीन गोलियां मार कर इस महान आर्यनेता की हत्या कर दी । आपकी मृत्यु पर सारे शहर में शौक छा गया । भारत माता का एक महान सपूत सदा के लिए चला गया ।

  • आर्य समाज शिक्षा सभा अजमेर

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