सत्संग से मनुष्य जीवन कैसे बदल सकता है ?

सत्संग का प्रभाव

सत्संग पर एक सत्य घटना

थोड़ी देर की अच्छी संगति भी क्या परिणाम उत्पन्न करती है, यह अमर शाहिद ‘आर्य मुसाफिर’ पण्डित लेखराम जी के जीवन से ज्ञात होता है । आर्य समाज के ये महान विद्वान् नेता ग्राम-ग्राम में घूमकर प्रचार कर रहे थे । एक ग्राम में पहुंचे तो उस प्रदेश का डाकू मुगला भी उनका व्याख्यान सुनने के लिए आ गया । उसके कई साथी भी दुसरे लोगों के साथ बैठ गए । ग्राम के लोगों ने जब मुगला को देखा और पहचाना तो उनके पैरों के नीचे से मानो धरती खिसक गयी । एक-एक करके वे उठने लगे । पण्डित लेखराम जी का व्याख्यान चलता रहा । लोग उठ-उठकर जाते रहे । लेखराम जी को आश्चर्य हुआ कि यह क्या हो रहा है । धीरे-धीरे सभी लोग चले गए, केवल मुगला और उसके साथी रह गए । पण्डित जी भाषण देते रहे । वे कर्म के सम्बन्ध में बोल रहे थे और बता रहे थे: “अवश्यमेव भोक्ताव्य्म    ।  व्याख्यान समाप्त हुआ तो मुगला ने पण्डित लेखराम जी से जाकर पूछा-“आप कौन है ?”

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पण्डित जी ने कहा-“मैं लेखराम हूँ ।” डाकू बोला- “मैं एकान्त में आप से कुछ बातें पूछना चाहता हूँ । क्या आपसे मिल सकता हूँ?” लेखराम ने कहा- “अवश्य मिल सकते हो । मैं आर्यसमाज में ठहरा हुआ हूँ, वहीँ चले आना ।”

रात्रि के समय मुगला और उसके साथी समाज के भवन में जा पहुंचे । ग्रामवालों ने समझा कि विपत्ति आ गयी है । ये लोग बेचारे पण्डित जी को लूटने आये है । परन्तु मुगला ने हाथ जोड़कर पण्डित जी से कहा- “आप कह रहे थे प्रत्येक कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है, क्या यह ठीक है ?” पण्डित जी ने कहा- “शत प्रतिशत ठीक है ।” मुगला बोला- “क्या प्रत्येक कर्म का फल भोगना पड़ेगा ? क्या बचने का कोई उपाय नहीं ?”

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पण्डित जी ने कहा- “कोई नहीं ।” मुगला ने कहा, “तो फिर मेरा क्या बनेगा ? मैं तो कई वर्षों से डाके डालता हूँ ।” पण्डित जी ने कहा- “आज से छोड़ दो । कल आर्य समाज में आओ, मैं तुम्हें यज्ञोपवित धारण करवा दूंगा । इसके पश्चात धर्म के मार्ग पर चलो ।”

मुगला और उसके साथी दूसरे दिन आर्यसमाज में पहुँच गए । सबका जीवन बदल गया । यह होता है सत्संग का प्रभाव ।

 

  • वैदिक धर्मी

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