सृष्टि के आरम्भ में ज्ञान और भाषा की उत्पत्ति क्यों और कैसे हुई ?

सृष्टि प्रवाह

सृष्टि निर्माण

संसार पर स्थूल दृष्टि डालने से ही यह पता चल जाता है कि सृष्टि में दो तत्वों=चेतन और जड़ का मेल है । ईश्वर और जीव । ईश्वर सृष्टि का निर्माता और निमित्त कारण है । जीव के कर्म करने, कर्म फल भोगने और मुक्ति प्राप्त करने के लिए सृष्टि बनाई जाती है । जड़-प्रकृति सृष्टि का उपादान कारण है । इसी में विकृति द्वारा जगत बनता है । इसी में रहता है और जगत का विनाश होकर भी प्रकृति कारण रूप बनी रहती है । इन तीनों ईश्वर जीव प्रकृति की स्वतन्त्र सत्ता के विना सृष्टि का प्रवाह असंभव है । ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, आनंदस्वरूप है और सृष्टि का करता पोषक और संहारक है । जीव अल्प अल्पज्ञ है । ईश्वर रचित सृष्टि के पदार्थों को लेकर स्वतंत्रतापूर्वक कर्म करता है और तदनुकूल ईश्वर व्यवस्था से फल भोगता है । जीव का परम उद्देश्य लौकिक अभ्युदय=चक्रवर्ती राज्य और परम पद=मोक्ष प्राप्ति है । जड़ जगत जीव का साधन है । जड़ का ज्ञानपूर्वक प्रयोग उन्नति देता है और अज्ञानपूर्वक प्रयोग जीव को अधोगति को पहुंचा देता है ।

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सृष्टि बनती है, बनाई जाती है, विकारयुक्त है, अत: सादी और अनित्य है । प्रत्येक सृष्टि का आरम्भ और अंत है । उसमें संयोग-विभाग है । सृष्टि के बने तत्वों में यह नियम प्रत्यक्ष देखा जाता है । परन्तु सृष्टि बनने, स्थित रहने और विनाश होने का क्रम-प्रवाह सदा बना रहता है, इसका अंत नहीं । सृष्टि का अंत होता है इससे यह सांत है । स्थित का अंत होता है अत: यह भी नश्वर है । प्रलय भी उत्पन्न होता और नाशवान है । परन्तु, उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का चक्र सदा बना रहता है । इसीलिए सृष्टि को प्रवाह से नित्य भी कहा जाता है, परन्तु स्वरूप से अनित्य ही है । जैसे दिन के पूर्व रात्रि दिन बराबर चलते रहते है । दिन और रात्रि उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं परन्तु दिन और रात्रि का प्रवाह चक्र सदा चलता रहता है । इसी भांति सृष्टि और प्रलय की दशा है । सृष्टि के पश्चात प्रलय और प्रलय के पश्चात सृष्टि, सृष्टि से पूर्व प्रलय और प्रलय से पूर्व सृष्टि होती रहती है । यह क्रम कभी टूटता नहीं । कोई भी सृष्टि अथवा प्रलय, सादी और शांत नहीं होती । वर्तमान काल की सृष्टि भी अन्नंत प्रवाहों की एक कड़ी है ।  सृष्टि निर्माण

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मानव उत्पत्ति

एक सृष्टि 4 अरब 32 करोड़ वर्ष तक बनी रहती है । इतना ही समय प्रलय का है । प्रत्येक सृष्टि के आरम्भ में भौतिक तत्वों की क्रमश: उत्पत्ति के पश्चात जैवी सृष्टि में मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, और स्थावर वृक्ष आदि सम्मलित है । इन में मानव योनी सर्वोतम है । अन्य योनियाँ योनिज स्वाभाविक ज्ञान के आधार पर अपना जीवन व्यतीत करती है और स्वकृत कर्म-फल का उपभोग करती है । इनमें कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध नहीं होता, अत: इनमें नैमितिक ज्ञान के बिना ही इनके आहार-विहार मैथुन आदि सब कार्य योनिज ज्ञान के आधार पर होते रहते है । परन्तु मानव में विलक्षणता है ।  सृष्टि निर्माण

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नैमितिक ज्ञान की आवश्यकता

मानव योनी में केवल कृत कर्म का फल ही भोगना नहीं होता, अपितु आगे के लिए स्वतंत्रतापूर्वक कर्म करने का सामर्थ्य भी है । मनुष्य को बुद्धि भी प्राप्त हैं अत: मनुष्य अपने कर्तव्य-अकर्तव्य कर्मों का उत्तरदाता है । मनुष्य अपने स्वाभाविक ज्ञान मात्र से कर्म की कर्तव्यता और अकर्तव्यता को नहीं समझ सकता । इसी कारण परम कारुणिक पिता ईश्वर प्रत्येक सृष्टि के आरम्भ में मनावोत्पत्ति के साथ ही नैमितिक ज्ञान देता है । इसी ज्ञान के द्वारा स्वज्ञान को बढ़ाकर मानव अपने कर्मों को करता है । जीव चूँकि यथा सामर्थ्य कर्म करने में स्वतंत्र है, अत: मनुष्य अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के कर्म करता है । परमेश्वर प्रदत्त यही नैमितिक ज्ञान “वेद” नाम से संसार में कहा जाता है ।  सृष्टि निर्माण

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भाषा की आवश्यकता

मनुष्य सामाजिक प्राणी है । यदि मनुष्य के पास भाषा न हो तो मनुष्य पारस्परिक व्यवहार नहीं चला सकता । ज्ञान का अन्यत्र प्रयोग करने के लिए भाषा एकमात्र सरणी है । भाषा के द्वारा ज्ञान सर्वत्र प्रसार करता है । भाषा के द्वारा भिन्न भिन्न संज्ञाओं और क्रियाओं का व्यवहार करके मनुष्य अपना कार्य करने में समर्थ होता है । सृष्टि के आदि में सब मनुष्यों अयोनिज रुप से जन्म लेते है । उस समय गुरु-शिष्य परम्परा नहीं होती और न ही हो सकती है, अत: जैसे भगवान् ने मनुष्य को नैमितिक ज्ञान “वेद” दिया, ठीक इसी भांति ज्ञान प्रचार और व्यवहार चलाने के लिए वैदिक भाषा (संस्कृत) भी दी । यदि सृष्टि के आरम्भ में परमेश्वर मनुष्य को ज्ञान और भाषा न देवे तो मनुष्य भी अन्य प्राणियों की भांति कर्तव्याकर्तव्यविहीन जीव मात्र रह जावे । प्रत्येक सृष्टि के आरम्भ  में यही प्रक्रिया होती है, इसमें कुछ भिन्नता नहीं । उसी नैमितिक ज्ञान वेद और अपने ज्ञान को बढ़ाता है और भिन्न भिन्न प्रकार की योजनाओं द्वारा उन्नति अथवा योजना रहित होकर अवनति करता रहता है । उसी वैदिक संस्कृत भाषा के आश्रय पर स्वमानवीय भाषाओँ की रचना करता है और अपना व्यवहार चलाता है ।  सृष्टि निर्माण

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लिपि की आवश्यकता

 

भाषा का प्रसार सुनने सुनाने से ही नहीं होता अपितु लिखने से भी अत्यंत घनिष्ट सम्बन्ध रखता है । परस्पर सम्मुख होने पर श्रवण मात्र से काम चल सकता है परन्तु दूरस्थ मनुष्यों में श्रवण श्रावण क्रिया नहीं हो सकती है, अत: आवश्यकता है कि इस कठिनता को दूर करने के लिए भाषा का आरोहण तैयार किया जावे । भाषा के आरोहण का नाम ही लिपि है । यह एक प्रकार का संकेत है जिसकों चित्रित करने पर भाषा को स्थिर रखा सकता है और दूरस्थ मनुष्य अथवा दुसरे काल में उन्ही शब्दों के व्यवहार में लाया जा सकता है । भाषा से सांकेतिक चिन्हों को लिपि कहा जाता है । अत: सर्व भाषा ब्राह्मी=देव नागरी लिपि को वेद ज्ञान और वैदिक संस्कृत भाषा के प्रसारार्थ प्रयोग में लाया गया । यह लिपि वैदिक ज्ञान और संस्कृत भाषा के समान ही पूर्ण वैज्ञानिक है । इसी ब्राह्मी लिपि को आधार मान कर समस्त संसार की मानवी लिपियों का अविष्कार हुआ है ।   सृष्टि निर्माण

 

भाषा भेद

जैसे ज्ञान के दो भेद होते हैं-1. ईश्वर प्रदत्त वेद ज्ञान और 2. वेद के निमित ज्ञान को प्राप्त करके मानव ज्ञान का प्रसार । इस प्रकार भाषा के भी दो भेद है । 1- वैदिक भाषा, जो वेदों द्वारा प्रादुभूर्त होती है और 2- लौकिक भाषा । इसका व्यवहार ऋषियों से लेकर समान्य मनुष्य तक करते है । दोनों संस्कृत भाषा कही जाती है । वैदिक और लौकिक नाम से यह व्यवहार पाया जाता है । शास्त्रकारों ने वेद को निगम आदि नाम से भी वर्णित किया है और लौकिक भाषा को केवल भाषा नाम से कहा है । इस प्रकार मूल देववाणी संस्कृत भाषा के दो रूप है । वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत ।  सृष्टि निर्माण

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वेद संकलन

जिस आनुपुर्वीय रूप में वेद का ज्ञान चार संहिताओं में चार ऋषियों को पृथक्-पृथक् रूप में मानस ज्ञान में प्रत्येक सृष्टि के आदि में प्राप्त होता है, उसी वर्णानुपुर्वीय रूप में मूल संहिताओं को लिपिबद्ध कर लिया गया । ऋषियों द्वारा वेदों की  सहिताओं का संकलन ही किया जाता है । इसी  नित्य कर्म से संहिताओं के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था की जाती है ।  सृष्टि निर्माण

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ग्रन्थ रचना

 

ऋषि लोग यथार्थ दृष्टा=आप्त और लोकहित की भावना से करुणापूर्ण होते है । सामान्य मानव की उन्नति के लिए ऋषि लोग वेद के आधार पर भिन्न-भिन्न विद्याओं का प्रकाश करते रहे । इस प्रयोजन के लिए उन्होंने वेदों की प्रतिकें लेकर उन की व्याख्या लौकिक संस्कृत में की और साधारण जनता को समझाया । फिर प्रतीकों के विना ही अनेक विद्याओं के प्रचार के लिए संस्कृत ग्रंथों की रचना की । समयानुसार यह ग्रन्थ रचना का प्रवाह बढ़ता गया और लाखों-करोड़ों वर्षों के समय से संस्कृत भाषा का महावृक्ष अत्यंत पुष्पित, पल्लवित और फलित हो गया । विद्या का कोई विभाग ऐसा नहीं रहा, जिस पर सर्वोतम ग्रन्थ की रचना संस्कृत में न की गई हो । संस्कृत साहित्य विद्या का भण्डार है । यथा संभव संस्कृत साहित्य का संक्षिप्त परिचय आगे दिया जाता है ।  सृष्टि निर्माण

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  • वैदिक धर्मी

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