स्त्री के तीन स्वरूप कौन-कौन से है और इनका क्या महत्व है ?

वेदों में वर्णित स्त्री के तीन स्वरूप

स्त्री के स्वरूप

वेदों तथा आर्य शास्त्रों में स्त्री के तीन स्वरूप दर्शाएँ गए है ये है:- कन्या, वधू या पत्नी तथा देवी या माता

कन्या के रूप में स्त्री

कन्या का धात्वर्थ है प्रकाशमान, प्रख्यात तथा जाज्वल्यमान । स्त्री को बाल्यावस्था में इस नाम से पुकारने का अभिप्राय यही है कि उसे उन सब गुणों को प्राप्त करना चाहिए जो उसे प्रत्येक कार्यक्षेत्र में या समाज में आभायुक्त बनाएं । शारीरिक दृष्टि से उसे अपने शरीरी को बलिष्ठ और स्वस्थ बनाना चाहिए जिससे उसका शारीरिक बल और सौन्दर्भ प्रस्फुटित हो । साथ ही उसके अंग-प्रत्यंग न केवल सुडौल एवं स्वस्थ हों अपितु वह सुशिक्षित भी होनी चाहिए जिससे कि उसका ज्ञान और बुद्धिचातुर्य उसे मानसिक रुप से प्रकाशमान और आकर्षक बनाएं ।

विविध शिल्प और कलाकौशल में भी वह पारंगत होनी चाहिए जिससे कि उसकी सृजनात्मक शक्ति विकसित हो जाये । शारीरिक सौष्ठव और अध्यात्मिक गुणों से सम्पन्न होने पर उसका सांसारिक जीवन पूर्ण होता है । इन सबके अतिरिक्त उसे आत्म संयम, सादगी, पवित्रता, त्याग और तपस्या का जीवन यापन करना होता है । इस प्रकार उच्च, पवित्र नैतिक गुणों के आत्मसात करने पर ही वह अपने श्रेष्ठ आचरण और चरित्र का प्रकाश फैला सकती है । वेद उसी लड़की को कन्या की संज्ञा देता है जो शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक दृष्टि से पूर्ण विकसित होती है और तभी अपने लिए पति को चुनने के लिए उसे वेद अधिकृत करते है । इस शिक्षा को वेद इन शब्दों में व्यक्त करते है ।

यह एक विडम्बना है कि स्त्री के पूर्ण विकास और शिक्षा के लिए वेद के इस सुस्पष्ट आदेश के होते हुए वह शिक्षा तथा ज्ञान प्राप्ति से वंचित रखी गई और स्वभावतः उसे सामाजिक प्रतिष्ठा से भी वंचित किया गया । कारण राजनीति व सामाजिक हो सकते हैं। इसलिए स्त्री शुद्रो नाधीयाताम जी वाक्य घड़े गए है । शायद यह कदम बाह्य आक्रमणों के बाद देश में व्याप्त विदेशी संस्कृति से सीधे संपर्क और उसके दुष्प्रभाव से स्त्रियों को दूर रखने की आवश्यकता का धोतक हो । रानी पद्मावती का सम्पूर्ण इतिहास ?

उनका तर्क था कि इस भांति अपनी स्त्रियों को विदेशी प्रभाव से मुक्त रखकर वे अपनी संतति को विदेश संस्कृति के दुष्प्रभाव से बचा सकेंगे । यह तर्क सारहीन न था । इस तथ्य यूरोपियन ढंग पर शिक्षा दी गई है , तब से वर्तमान पीढ़ी, जिसमें लड़कियां भी सम्मिलित हैं, पाश्चात्याभिमुखा एवं अभारतीय हो गयी है ।

वधू के रूप में नारी

जैसा कि ऊपर कहा गया है, कन्या को अपने जीवन साथी को चुनने का जन्मसिद्ध अधिकार है और यह अधिकार वेद प्रतिपादित है,म यही कारण था कि प्राचीन काल में स्वयंवर, स्त्री के नाम से संबोधित होते थे पुरुष के नाम से नहीं, यथा सीता स्वयंवर, द्रौपदी स्वयंवर आदि । यह बात ध्यान देने योग्य है की स्त्री का यह जन्मसिद्ध अधिकार पश्चिम के उन वर्गों में भी जो आर्य वंश के कहे जाते हैं, आज भी मूल रूप में पाया जाता है । दान की सर्वोतम महिमा क्या है ?

वहां विवाह का प्रस्ताव पुरुष की ओर से आना अनिवार्य है जबकि लड़की का यह अधिकार होता है कि वह उसे स्वीकार करें या ना करे । यद्यपि स्त्री अपने जीवन साथी को चुनने के अधिकार का उपयोग करती थी तथापि माता-पिता के परिपक्व और बुद्धिसंगत अनुभव द्वारा उसका सैदव मार्गदर्शन होता था । पुत्री को मनोनीत पति के हवाले कर देने की प्रथा आज भी पाश्चात्य देशों में प्रचलित है । यह प्रथा या रिवाज वेद से ग्रहण किया गया है । (ऋग्वेद (1-124-3) का कथन है :-

                                                                     एषा दिव: दुहितायै

जिस प्रकार सूर्य प्रात:काल अपनी पुत्री उषा को विविध चमकदार रंगों से विभूषित करके संसार को अर्पण करता है उसी प्रकार पुत्री विवाह के समय माता-पिता द्वारा वस्त्राभूषण से अलकृत करके, वर को अर्पित की जाती है ।

स्त्री पत्नी के रूप में

प्राचीनकाल में भारत में विवाह दो व्यक्तियों के मध्य कतिपय आर्थिक सिद्धांतों पर अवलम्बित सौदा न था । यह पवित्र बंधन है जो स्त्री पुरुष को स्थाई बंधन में बांधता है । यह भिन्न रूप के दो जलों के सम्मिश्रण के समान है । यह दो ह्रदयों का मिलन है । विवाह के समय दोनों निम्न लिखित मंत्रो का उच्चारण करते है :-

यत् एतद् ह्रदयं तव, तदस्तु ह्रदयं मम ।
यदिदं ह्रदयं मम, तदस्तु ह्रदयं तव ।।

वर अपनी को पति कहता है और वधू अपने को पत्नी कहती है । इससे गृहस्थ में दोनों के कार्यविभाजन का बोध होता है । एक आर्य बहु की सिख 

विवाह शब्द का अर्थ है, श्रेष्ठम क्षमताओं के साथ निर्वाह करना । यह शब्द एक बड़े सामाजिक सिद्धांत का भी धोतक है । इसका अभिप्राय: यह है कि उद्देश्य विशेष की पूर्ति के लिए कोई अपने को विवाह-बंधन में बांधता है। यह उद्देश्य न केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक लाभ से सम्बद्ध हैं, अपितु यह समाज देश और मानव जाती के प्रति कर्तव्यों के बोध से सन्निहित होता है ।

वेदों की शिक्षा के अनुसार विवाह-प्रथा की स्थापना मात्र रिती-रिवाज व आत्म-समृद्धि के लिए नहीं वरन सामाजिक दायित्वों की पूर्ति के लिए हुई है, जिसमें स्त्री को समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका से गुरुतर होती है । घर वह इकाई है जिससे सामाजिक व्यवस्था प्रसारित होती है । गृहस्थ की सुव्यवस्था स्त्री के हाथ में थी । वह घर के शासन करती थी इसलिए वह गृह स्वामिनी कहलाती थी । महाभारत के निम्नलिखित शलोकों में इस नियम तथा घर में स्त्री के पद का बड़ी सुन्दरता से वर्णन किया है ।

न गृहं गृहमित्याहु:, गृहिणी गृहमुच्यते ।।

स्त्री के बिना पुरुष आधा होता है । उसका दूसरा आधा भाग स्त्री होती है। इसलिए वह अर्द्धांगिनी कहलाती है ।

स्त्री माता के रूप में

विविध धर्म शास्त्रों में असंख्य आख्यान और उपदेश पाए जाते है जो इस धारणा की पुष्टि करते है कि स्त्री पूरक, प्रेरक शक्ति, एवं समृधि की निर्माता है, अत: न तो परिवार में और न समाज में उसकी अवहेलना होनी चाहिए ।

प्राचीन भारत में वेदों की आज्ञानुसार, माता-पिता की कामवासना की तृप्ति के फलस्वरूप संतान पैदा नहीं की जाती थी । बच्चा सदा मनचाहा होता था । पौधा भूमि और बीज की उपज होता है । अच्छी फसल के लिए अच्छी भूमि और अच्छा बीज आवश्यक होता है । वेद में माता की तुलना भूमि से और पिता की तुलना बीज से की गई है । स्वस्थ बुद्धिमान और धर्मात्मा संतान की प्राप्ति के लिए माता और पिता दोनों का योग्य होना आवश्यक है । दोनों को ही, विशेषत: माता को सुसन्तति प्राप्ति की आशा-पूर्ति के लिए पवित्र जीवन यापन की सलाह दी गई है । मनुस्मृति में मनु महाराज कहते है कि :-

स्वां प्रसूतिम् चरित्रं च कुलं आत्मानमेव च ।
स्वयं च धर्म प्रयत्नेन जाया रक्षन् हि रक्षति ।।
पतिर्भार्यां: संप्रविश्य, गर्भों भूत्वेह जायते ।
जायायास्तद्वि जायात्वं यदस्यां जायते पुन: ।

मनु महाराज कहते है कि पुरुष अपनी के माध्यम से अपना ही पुनर्निर्माण करता है कि बालक अपने माता पिता के लिए दर्पण का कार्य करते है। उसी के माध्यम से वे जान सकते हैं कि वे किस कार्य करता है । उसी के माध्यम से वे जान सकते है की वे किस प्रकार के व्यक्ति हैं । इस प्रकार स्त्री अपने पति को एवं स्वयं को पहचानने में सहायता प्रदान करती है । संगठन का मूल्य क्या होता है ?

इसलिए हमारे प्राचीन प्रजनन शास्त्रियों ने स्त्री के आचार-विचार, व्यवहार, पवित्रता एवं शील पर अधिक बल दिया है । इसी सिद्धांत में आस्था रखने के कारण अर्जुन ने महाभारत में उल्ल्लिखित महायुद्ध के दुष्परिणामों के विषय में अपनी चिंता से श्रीकृष्ण को अवगत किया था । उस महान युद्ध में पुरुषों के बहु संख्या में मारे जाने से नियंत्रक तत्वों का लोप हो जायेगा और प्राय: सभी सामाजिक व्यवस्था तत्वों का लोप हो जायेगा और प्राय: सभी सामाजिक व्यवस्था, पारिवारिक मान्यताएं एवं परम्पराएँ छिन्न-भिन्न हो जाएँगी ।

इससे स्त्रियों के भ्रष्ट, और दुराचारिणी होने की आशंका रहेगी, वंश परम्परागत दूषित हो जाएगी । बाद में ऐसे उच्च सामाजिक ढांचे, राष्ट्रीय चरित्र और संस्कृति को नष्ट कर देंगे । अर्जुन की दृष्टि में इस प्रकार के महान युद्धों से सामाजिक अराजकता उत्पन्न होती है और ये अक्षम्य पाप होते है । दुसरे शब्दों में अर्जुन नारी को वंशानुगत विशेषताओं और एकता का आधार तथा राष्ट्र के सामाजिक ढांचे को बनाये रखने वाली समझते थे । इन्ही कारणों से हमारे शास्त्रों में नारी की देवी के रूप में आराधना की गई है ।

 

  • वैदिक धर्मी

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