Maharishi Dayanand Saraswati का मृत्यु रहस्य

Maharishi Dayanand Saraswati (महर्षि दयानन्द सरस्वती) विष प्रकरण

Maharishi Dayanand Saraswati:-  पूरी एक शताब्दी बीत जाने के बाद श्री ओकारसिंह Okarsingh  ने राजस्थान पत्रिका के 7 फरवरी 1984 के अंक पृष्ट संख्या 5 पर एक लेख में यह सिद्ध करने की चेष्टा की है कि “स्वामी दयानन्द सरस्वती Maharishi Dayanand Saraswati जी को विष दिए जाने की बात अत्यंत संदेहास्पद हैं और विश्वास करने योग्य नहीं हैं” । इसी वाक्यांश को लेकर श्री भवानीलाल जी भारतीय ने विविध समाचार पत्रों में अपना वक्तव्य प्रकाशित कराया तथा श्री राजेंद्र जी जिज्ञासु ने भी सार्वदेशिक के 4 मार्च सन 1984  के अंक में अपने विचार प्रकट किये।

विचारना यह है कि वस्तुस्थिति क्या हैं। Maharishi Dayanand Saraswati के स्वार्गारोहन के पश्चात ही संभवतः आघ जीवनी लेखक श्री रावगोपाल हरी ने अपने प्रसिद्द ग्रन्थ दयानद दिग्विजयार्क में कि “आश्विन कृष्णा एकादशी गुरुवार के दिन प्रथम कुछ लेष्मा अर्थात् जुकाम श्री महाराज को हुआ। उसके चौदहवें दिन अर्थात् चतुर्दशी की रात्री को घूल मिश्र पाकाध्यक्ष से जोकि शाहपुर का रहने वाला था दूध पीकर सोये। रात्री भर में तीन वमन हुये।                         कुछ ऐसे तथ्यपूर्ण सच जानने के यहाँ click करें

इसी धूल मिश्र को आगे चल कर लेखराम, देवेन्द्र बाबु Devendra Babu ने दहल मिश्र न मालूम क्यों लिखा। वास्तव में इसका नाम धूल मिश्र ही है। बोलचाल की भाषा में इधर यह नाम कई व्यक्तियों के है। धूम नाम रखना इधर आम बात हैं धौल नहीं। यह व्यक्ति संभवत सन 29 या 30 तक जिन्दा रहा। शाहपुरा Shahpura में ही रहता था। Maharishi Dayanand Saraswati के स्वर्गवास के पश्चात शाहपुर आ गया था। इसी के कथनानुसार Maharishi Dayanand Saraswati के अन्याय भक्त उदयपुराधीश के पश्चात आजीवन परोपकारिणी सभा के अध्यक्ष शाहपुरा नरेश सर नाहरसिंह के.सी.आई. ने 42 वर्ष बाद मथुरा शताब्दी में अपना वक्तव्य दिया जो निम्न प्रकार से हैं। स्मरण रहे यह जन्म शताब्दी फरवरी सन 1925 को मनाई गई थी। “Maharishi Dayanand Saraswati जी अपने लिए रसोई बनाने वाला आदमी मुझ से ले गए थे। स्वामी जी को विष दिया गया था यह बात गलत हैं। मैं खयाल भी नहीं कर सकता कि उनको विष दिया गया था। जो लोग उनके पास रोटी बनाने वाले थे वे अभी तक यहाँ नौकरी करते हैं। उनका नाम श्रीकृष्ण Shrikrishn व कूल्लू kullu हैं।“

इसी वक्तव्य को लेकर जब आर्यजगत में समाचारपत्रो में चर्चा चली तो पूज्यपाद स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज ने श्री भगवानस्वरूप जी न्यायभूषण को इस धूल मिश्र के ब्यान लेने की कही। उन्होंने इसके ब्यान लेकर स्वामी जी की सेवा में भेज दिए। जो अलंकार गुरुकुल कांगड़ी स्नातक मंडल का मुखपत्र के मई 1925 के अंक पृष्ठ 376-378 पर प्रकाशित हुआ। इस ब्यान से प्रथम जो आपतिश्रेधय भवानीलाल जी भारतीय Bhawanilal Ji Bhartiya ने उठाई वह यह है कि अब श्रीकृष्ण Shrikrishn व कुल्लू Kullu नाम के रसोइये थे तब यह धौल मिश्र कौन हैं कि जिसके बयान लिए जा रहे हैं।     www.vedicpress.com     क्या कुछ ऐसा ही हुआ था चित्तौड़ की उपरानी वीरा के साथ ?>>>>

बात ऐसी है कि जब Maharishi Dayanand Saraswati अत्यंत श्रद्धालु भक्त राजाधिराज शाहपुरा ने महर्षि का जोधपुर पधारना जाना तो उन्होंने अपना विश्वासपात्र रसोइया इसी धूला जोशी वास्तविक नाम व जात जिसको मिश्र की पदवी थी, दे दिया। इसी धूला मिश्र का नाम श्री राव गोपाल हरी Rav Gopal Hari ने धूल के बजाय धूड लिखा सो कभी-कभी वैदिक उच्चारण में भी ल के बजाय ड का उच्चारण करते हैं। जब यह रसोइया श्री Maharishi Dayanand Saraswati सेवा में राजाधिराज को कहा गया कि हमारे साथ धुला अर्थात्  मिट्टी देते हो। तो राजाधिराज ने इसका नाम बदलकर श्रीकृष्ण Shrikrishn कर दिया। लेकिन यह नाम दोनों तक यानि राजाधिराज व महर्षि तक ही सीमित रहा। आम जनता में इसका नाम धुला जोशी ही विख्यात रहा। इसी ने ही चतुर्दर्शी को दूध में संखिया दिया था। जैसाकि पीर इमाम अलीके पास दावा लाने वाले ने कहा था कि महाराज ने कहा हैं कि मुझे संखिया दिया गया हैं। कांच की कल्पना सर्वथा सृष्टि नियम के विरुद्ध हैं। क्योंकि कांच चाहे कितना ही बारीक़ क्यों न पिसा जाय दूध में धुल ही नहीं सकता। यह लिखना क्षितीश जी वेदालंकार का 11 मार्च 1984 आर्यजगत में कि कांच राजस्थान में संखिया को कहना आम बात है हास्यास्पद हैं क्योंकि प्रत्येक जीवनी लेखक कांच  व संख्या को अलग-अलग ही मानते हैं।    अभिमन्यु के चक्रव्यूह का पर्दाफास कैसे?>>>>>>>>>

अब विचारना यह है कि राजाधिराज ने जन्म शताब्दी के अवसर पर ऐसा भाषण क्यों किया जो भर्मोत्पादक हैं। इस सम्बन्ध में हमारा विचार यही हैं कि स्वयं राजाधिराज यधपि बुद्धिमान श्रद्धालु सत्संगी होते हुए भी अक्षरज्ञान से निरे शून्य थे। वे हस्ताक्षर भी करना नहीं जानते थे। अपना हस्ताक्षर लिखकर उसकी छाप बनाकर छोड़ी थी जो उनके मंजूरी के पत्रों पर स्वयं लगा देते थे। उस हाथ पर नाहरसिंह ऐसा वाक्य हैं। पत्रों में जो भी विचार प्रकाशित होते यधपि सुनाने वाले उन्हें सुनाते लेकिन जीवनी लेखकों ने दयानन्द विषप्रकरण को जीवनचरित्र तक ही सीमित रखा। किसी भी आर्यसमाजी पंडित ने राजाधिराज को यह सुझाव नहीं दिया कि इस विषय की क़ानूनी जाँच कर इसे सजा दिलाई जाय। वह इसीलिए संभवतः नहीं कहा गया था कि Maharishi Dayanand Saraswati की विचारधारा महान थी। वे हमेशा ही अपने जहर देने वाले को यह कहकर छुड़वा देते थे कि मैं संसार को कैद से मुक्त करने आया हूँ न कि कैद में डालने को। इसी सिद्धांत को मानकर किसी ने कुछ भी शिकायत राजाधिराज के पास नहीं की। न्याय का तकाजा यही है कि जब तक कोई दूसरा व्यक्ति उसके खिलाफ कुछ नहीं कहे तो जो वादी कहता है वही सत्य माना जाता हैं। इसलिए राजाधिराज ने उपर्युक्त वचन जन्मशताब्दी में कहे। www.vedicpress.com

अत: यह निर्विवाद ही हैं कि महर्षि को जहर दिया गया। वही जहर अन्य कुछ भी न होकर संखिया ही था। उसका देने वाला धूला जोशी शाहपुरा का ही था। लेकिन आगे चलकर चिकित्सक डा० अलीमदनि खां ने जो केलोमाल भिन्न-भिन्न तरीकों से 26 ग्रेन पहुंचा दिया। यही उनकी मृत्यु का मूल कारण है। अत: अब पूरी शताब्दी बाद इस प्रश्न को पुनर्विचार के लिए प्रस्तुत करना कोई औचित्य नहीं है। आज देश काल परिस्थिति को देखते हुए हमें नई पीढ़ी को आर्य बनाने पर ही कुछ करना हैं। महर्षि ने तो कहा है कि मैंने काम पूरा कर दिया हैं। सत्यार्थप्रकाश वगैरह सब कुछ जितना लिखना चाहिए लिख दिया हैं। जोधपुर के ही राजा जवानसिंह के एक प्रश्न के उत्तर केन कहा कि मेरा काम आर्यसमाज ही पूरा करेगा। इसी पर ही मेरा पूर्ण विश्वास हैं। यही महर्षि का अंतिम सन्देश हैं। हमे पूर्णतया त्याग तप बलिदानी भावनाओं से ऋषि कार्य पूरा करना हैं। इसके लिए प्रत्येक आर्यसमाज मंदिर में महर्षिकृत ग्रंथों की पढ़ाई चालू होवेगी तभी सुधार हो सकेगा। अन्यथा कुछ भी नहीं होने वाला।    महान क्रांतिकारी की भविष्यवाणी आज सच हुई जानिए कैसे ?>>>>>>>

वैदिक धर्मी

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