गोवध अंग्रेजी शासनकाल से अब तक क्यों और कितना हुआ ?

अंग्रेजी शासनकाल से अब तक प्रतिवर्ष करोड़ों गायों को क्यों काटा जा रहा  ?

गोवध:-

मुस्लिम शासकों ने एक दो को छोड़कर प्राय: सब ही ने गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगाया  परन्तु इस्लामी शासन की अन्य स्मृतियों में जैसे तंबाकू, पर्दा, घरों में शौचालय, मेहतरों का वर्ग आज भी भारत के सामाजिक जीवन में जीवित है । सुई प्रकार गौरंग महाप्रभुओं की अनेक अभारतीय स्मृतियों में गौमांस का भक्षण, उसका व्यापार और निर्दयता से गायों का वध भी आज न केवल चालू है अपितु वृद्धि पर है ।

मुसलमान ने यदि तलवार से भारत पर राज्य करने की नीति को अपनाया तो अंग्रेज ने फूट डालो और राज्य करो, के साथ अन्दर से भारत को खोखला करने के प्रयास आरम्भ से ही किये । गाय जो भारत के राष्तिर्य जीवन का एक सुदृढ़ स्तम्भ थी उसकी नस्ल को बिगाड़ने, गौचर-भूमियों को समाप्त कराना या उन पर टैक्स लगाना, मुसलमान को उभारकर गोहत्या करवाना, स्वयं मांस खाना और उन्हें भी खाने को प्रोत्साहन देना, गाय वध के प्रश्न को लेकर हुए दंगों में मुसलमानों का पक्ष लेना आदि-आदि उपायों से अंग्रेज शास्कोंने हमारे राष्ट्र के आर्थिक जीवन कोबहुत लड़खड़ा दिया जिसकी पूर्ति शताब्दियों तक भी पूरी होनी कठिन है ।

लॉर्ड मैकाले की उस योजना को क्रियान्वित करने के लिए कि इनके शरीरी में तो भारतीय हों, परन्तु दिल और दिल्माग अंग्रेजी हो, इसे ध्यान में रखकर जहाँ भारतीय इतिहास के ग्रंथों में यह अनर्गल और असंगत बातें लिखवाई- आर्य लोग यहाँ के आदिवासी नहीं है वह तो बाहर से आये है, वहां इस भयंकर झूठ को लिखवाने से भी वह न चुके कि वैदिककाल में गौमांस खाया जाता था और गाय का मांस हवन के काम में भी आता था । गाय ही माता क्यों भैंस क्यों नहीं ?

टेवर्नियर  (सन्1641-68) और डा. जानफ्रायर  (सन् 1678-81) में आये इन प्रवासियों ने हो अपनी यात्रा के वृत्तांत  लिखे है उनमें स्पष्ट उल्लेख है-बड़े-बड़े गावों में जहाँ एक आध मुसलमान अधिकारी होता है, वहां तो किसी प्रकार खसी, मुर्गी या कबूतर का मांस मिल जाता है । परन्तु हिन्दू बनियों की बस्ती में आटा, चावल, साग, पात, दूध, घी के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलता ।

वह लोग तो अंडा तक भी सेवन नहीं करते । वैदिक काल तो दूर यह तो कल-परसों की बातें है जो इन यात्रियों ने लिखी है ।परन्तु अब जरा अंग्रेज साम्राज्य के आरंभिक क्षणों को भी देखिये । मांसभक्षी तो यह जाती आरम्भ से रहती ही चली आई है ।उसी का विस्तार और भी विकराल रूप से इनके चरण शरीफ भारत में आते ही आरंभ हो गया । सन 1668 में बम्बई पर अंग्रेजों का आधिपत्य हुआ, इसके बाद छै वर्षों में ही उन्होंने मांस का इतना अधिक खाना आरंभ किया जो डा. फ्रायर को अपनी पुस्तक ‘इयरली रेकार्ड्स आफ ब्रिटिश इंडिया’ में लिखना पड़ा-सूरत जैसी घनी बस्ती के नगर में सारे मुसलमानों को जितना मांस चाहिए, बम्बई के अंग्रेज एक महीने में ही कहीं उससे अधिक मांस खा पचा जाते है । गाय के गोबर से कैसे उड़ सकता है जहाज ?

भारत की गर्म जलवायु के अनुकूल गाय और सूअर का मांस यद्यपि नहीं पचता, उसके खाने से स्वास्थ्य बिगाड़ जाता है फिर भी उन्होंने कड़ी से कड़ी गर्मी में भी गौमांस नहीं छोड़ा । मांस के साथ फिर सुरा और सुंदरी ये दो उसकी सगी बहने न आयें यह भला कैसे संभव हो सकता है? बहुत से अंग्रेज इससे वहां मर गये और बहुत से भयंकर रोगों से पीड़ित हो गए ।

दूसरा गोधन के ह्रास का मुख्य  कारण हुआ उनकी व्यापारिक मनोवती । गौमांस, जहाजों पर लाद-लादकर अंग्रेजों पोर्तुगीज, डच और फ्रेंच चलकर इतना भयंकर रूप हो  गया की करोड़ों रुपयों की आय गौमांस, चर्म आदि के निर्यात से होने लगी । परिणाम यह हुआ की गाय और बैल दिन प्रतिदिन महंगे होते चले गए और घी दूध के दर्शनों से भी भारतीय वंचित हो गए ।

फिर तीसरा प्रहार यह किया कि गोचर स्थान इन पर भारत में कभी कोई रूकावट नहीं थी उन पर अंग्रेजी सरकार ने ताले डलवाकर लगा दिया और बहुत से गौचर तुड़वाकर खेत बना दिए । इससे भी लोग पशुपालन में असमर्थ हो गए और गोधन दिन प्रतिदिन क्षय की ओर जाने लगा । जहाँ महाभारत में लिखा है :-

“अटवी पर्वतश्चैव नद्यस्तीर्थानि यानि च;

सर्वाण्यस्वामिकान्बाहुर्नास्ति तत्र विचारणा ।”

 

अर्थात्- जंगल, पर्वत, नदी, तीर्थ आदि यह सब अस्वामिक होते है इनसे सब समान रुप से लाभ उठा सकते है । अंग्रेजो ने वहां जाकर कर बाँध दिए और जंगल नीलाम किये जाने लगे तथा पर्याप्त लगान उनसे लिया जाने लगा ।

इधर फिर स्थान-स्थान पर बूचड़खाने खुलवा देने से और मुसलमानों को गोवध के लिए कुला प्रोत्साहन देने से देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगे आरम्भ हुए जिनमें अंग्रेज शासकों ने गोवध करने वाले का ही पक्ष लिए । काशी, मलेरकोटला, अमृतसर, सहारनपुर आदि स्थानों के दंगो में जो ब्रिटिश सरकार का दृष्टिकोण रहा, उससे भी यही बात स्पष्ट होती थी । देशी गाय के लाभ क्या है ?

मथुरा जैसी श्रीकृष्ण महाराज की पवित्र भूमि में भी बूचड़खाना चलाया गया और भी देश में न जाने कितने गोहत्या के केंद्र खोल दिए गए जिनमें दिन-प्रतिदिन गोवध बढ़ता ही चला गया । सर जान बुड्रफ जैसे हाई-कोर्ट के चीफ जस्टिस को गोवध के पुरे आकड़ें प्रयास करने पर भी मिलने कठिन हो गए । फिर भी उन्होंने सन् 1917 में अनुमान से आकडे दिए की लगभग एक करोड़ प्रतिवर्ष गोवध भारत में होता है ।

गत दो महायुद्धों के समय में तो फिर ठिकाना ही नहीं रहा । धर्मप्राण महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, देवतास्वरूप भाई परमानन्द, पंजाब केसरी लाला लाजपतराय, अमर शहीद स्वामी श्रद्धानंद महाराज के प्रयास गोवध बंद कराने के लिए तो इस दिशा में पर्याप्त स्तुत्य रहे ही परन्तु भारत से अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने में दिन रात एक करने वाले नेताओं में स्वामी दयानन्द सरस्वती के प्रश्न को स्वराज्य से किसी भी माने में कम महत्व नहीं दिया । जिसके कारण गोवध काफी हद तक तो रुका लेकिन अब एक बार फिर से जोरों पर है ?

 

  • वैदिक धर्मी

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