परोपकारिणी सभा का गठन किसने और क्यों किया ?

 ऋषि दयानन्द सरस्वती ने सभा का गठन क्यों व कैसे किया ?

परोपकारिणी सभा :-

ऋषि दयानन्द की दूरदर्शिनी दृष्टि अब समीप आते हुए अंत को देख रही थी । मेरठ से चलते हुए ऋषि ने आर्य पुरुषों को जो आदेश दिया था, उसके वाक्य बतलाते हैं कि ऋषि भविष्य को देख रहे थे । आपने व्याख्यान में कहा था कि “महाशयों ! मैं कोई सदा बना नहीं रहूँगा । विधाता के न्याय नियम में मेरा शरीर क्षण-भंगुर हैं । काल अपने कराल पेट में सबको चबा डालता हैं । अंत में इस देह के कच्चे घड़े को भी उसके हाथों टूटना हैं । सोचो, यदि अपने पांव खड़ा होना नहीं सीखोगे तो मेरे आँख मिचने के पिच्छे क्या करोगे ? अभी से अपने को सुसज्जित कर लो ! स्वावलंब के सिद्धांत का अवलंबन करो ! अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने योग्य बन जाओ ! किसी दूसरे के सहारे की आशा छोड़ अपने पर ही निर्भर करो !” ऋषि के ह्रदय में यह चिंता थी कि मेरेज मरने के पीछे सभाओं को संभालनेवाला कौन होगा ?

काव्य क्या है व इनमें किसका वर्णन किया गया है ?

सँभालने को बहुत कुछ था । सबसे प्रथम, ऋषि समझते थे कि आर्यसमाजें देश भर में बिखरी हुई हैं । उनका एक केंद्र भूत संगठन नहीं है । आपस में लड़ाई झगड़ों को निबटाने का कोई उपाय नहीं है । दूर दूर के प्रान्तों में स्थापित हुई आर्यसमाजें एक दूसरे से कोई सहायता नहीं ले सकतीं ।

दूसरी चिंता ऋषि को विदेश प्रचार की थी । उस समय तक प्रान्तिक प्रतिनिधि सभाएं भी नहीं थी, सार्वदेशिक अभ का तो अभी विचार ही दूर था । प्रचार का और विशेषतया विदेश प्रचार का कार्य छोटी सभाओं की शक्ति से बड़ा था । ऋषि के चित्त में यह विचार घर किये हुए था कि यदि वैदिक धर्म के योग्य प्रचारक भारत से बाहर भेजे जायं, तो उन्हें अवश्य सफलता होगी ।

इसके सिवा ऋषि ने वेदभाष्य तथा अपने ग्रन्थ छपवाने के लिए १८८० में बनारस में वैदिक प्रेस की स्थापना की थी । वह प्रेस अभी तक निराधार था । ऋषि को निरंतर भ्रमण करना पड़ता था, इस कारण हिसाब में सदा गड़बड़ रहती थी । जब सामने ही यह हाल था तो पीछे के लिए क्या भरोसा हो सकता था ? ऋषि के ग्रन्थ जहाँ-तहां छपे पड़े थे । उनका एक स्थान में संग्रह और संभालने का यत्न भी आवश्यक था ।

वेद के अंग कौन-कौन से है जो उन्हें समझने में सरल बनाते है ?

इन सब बातों पर विचार करके ऋषि ने एक ऐसी सभा का बनाना निश्चित किया जो इन त्रुटियों को पूरा कर सके । उदयपुर में  ‘परोपकारिणी सभा’ का विचार उत्पन्न हुआ और पकाया गया । वहीँ वह कार्य में परिणित हुआ । इसमें सन्देह नहीं कि महाराणा सज्जनसिंह के सुधार ने ऋषि के ह्रदय को बड़ा संतोष दिया । हिन्दुपति ले वैदिकधर्मी बन जाने पर ऋषि को यह भान होने लगा कि अब आर्यसमाज निराधार नहीं है । महाराणा की सज्जनता और दृढ़ता को देखकर ऋषि को विश्वास हो गया कि मेरे पीछे आर्यसमाज को लौकिक सहारे की कमी नहीं रहेगी । इसमें संदेह भी नहीं कि यदि ऋषि के पीछे उनके योग्यतम शिष्य शीघ्र न चल बसते तो परोपकारिणी सभा ऐसी निर्जीव संस्था न हो जाती । परोपकारिणी सभा का निर्णय एक वसीयतनामे के रूप में हुआ । वसीयतनामे का प्रारम्भ इस प्रकार था –

‘मैं स्वामी दयानन्द सरस्वती निम्नलिखित नियमों के अनुसार तेईस सज्जन आर्यपुरुषों की सभा को वस्त्र, पुस्तक, धन और यन्त्रालय आदि अपने सर्वस्व का अधिकार देता हूँ और उसको परोपकार सुकार्य में लगाने के लिए अध्यक्ष बनाकर यह स्वीकारपत्र लिख देता हूँ कि समय पर काम आवे ।’

उपांग क्या और कितने है यह विद्या का प्रमाण कैसे है ?

इस प्रकार परोपकारिणी सभा ऋषि की उत्तराधिकारिणी बनाई गई थी । 23 सभासदों में से सभापति का स्थान मेवाड़पति महाराणा सज्जनसिंह को प्रदान किया गया था । सभासदों में कई राजपूत नरेश और रईस थे । उनके अतिरिक्त देशभर के प्रसिद्द आर्यपुरुष और ऋषि के शिष्यों के नाम सभासदों की सूची में प्राप्त होते हैं । रायबहादुर रानडे, रायबहादुर पं. सुन्दरलाल, राजा जयकृष्णदास, लाला साईंदास, पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा आदि महानुभावों को सभा के सभासद बनाया गया था । परोपकारिणी सभा के सभ्यों की सूचि का ध्यानपूर्वक आलोचन हमें बतला सकता है कि जीवन-काल में ही ऋषि का प्रभाव कितना विस्तृत हो चूका था ।

सभा के अन्य उद्देश्यों पर ध्यान देने से ऋषि के महान उद्देश्य का परिचय मिलता है । पहला उद्देश्य-स्वामी जी की सम्पत्ति को वेद और वेदांग आदि के पढने पढ़ाने में और वैदिक ग्रंथों के छपवाने में व्यय करना । शिक्षा का प्रबंध और पुस्तक प्रकाशन, ये दो ही विभाग इतने है की एक सभा के लिए पर्याप्त हैं । दूसरा उद्देश्य रखा गया- देश और देशान्तर में भेजने के लिए उपदेशक मण्डलियों के प्रबंध में सम्पत्ति का व्यय करना । तीसरा उद्देश्य- भारत के दीन और अनाथ-जनों को सहायता देना । कितने विस्तृत उद्देश्य है ! लेख और वाणी द्वारा देश और विदेश में प्रचार परोपकारिणी सभा का पहला कर्तव्य हैं । दूसरा कर्तव्य है ‘वैदिक शिक्षा का प्रबंध’ । उसका अंतिम कर्तव्य दिनों और अनाथों को उठाना और उनकी सहायता कारना है । ऋषि ने परोपकारिणी सभा का बड़ा भरी प्रोग्राम बनाया था । वह परोपकारिणी सभा को अपना उत्तराधिकारी और आर्यसमाज का रक्षक बनाना चाहते थे ।

स्मृति क्या है व मनुस्मृति कौन-से संविधान पर आधारित है ?

वसीयतनामे के अंतिम भाग में सभा के साधारण नियम है । सभा में वाही रह सकेगा, जो सदाचारपूर्वक जीवन बिताएं । दुराचारी को निकाल दिया जायेगा । अधिक समय तक कोई स्थान रिक्त नहीं रह सकेगा । यदि सभा कोई झगड़ा उठे तो सभा में फैसला होने की अन्य कोई भी सूरत होने तक उसे कचहरी में नहीं ले जाना चाहिए । यदि कोई सूरत बाकी न रहे, तो न्यायलय से निर्णय होना चाहिए । ये नियम दिखलाते है कि सार्वजनिक संगठनों के निर्माण में ऋषि दयानन्द सिद्धहस्त थे और सभ्यों की शक्ति को परिमित करने के लाभों को खूब समझते थे ।

इन उद्देश्यों से और इन नियमों से ऋषि ने परोपकारिणी सभा का निर्माण किया , और अपनी सार्वजनिक सम्पत्ति सभा को सौंप दी । अपने जीवन काल में ही प्रेस, पुस्तक आदि सभा को दे दिए । ऋषि को सभा से बड़ी आशाएं थी । वह सभा द्वारा केवल अपनी सार्वजनिक सम्पत्ति को ही सुरक्षित नहीं करना चाहते थे, वह राजाओं और अन्य शिक्षित महानुभावों को इकट्ठे बिठाकर एक दूसरे के समीप लाना चाहते थे । वह राजपूताना के अशिक्षित नरेशों को भारतहित के सार्वजनिक कार्यों में लगाना चाहते थे । परोपकारिणी सभा का निर्माण उस सपने का फल था जो चित्तोड़ को चोटियों पर खड़े होकर ऋषि ने देखा था । ऋषि परोपकारिणी सभा द्वारा सोये हुए राजपूताना शेर को जगाना चाहते थे । वह आर्य-जाति द्वारा मनुष्य जाति के धार्मिक और सामाजिक उद्धार का नेतृत्व आर्य नरेशों के हाथ में देना चाहते थे ।

वेद भाष्य कौन से है और किस भाष्यकार के उत्तम भाष्य है ?

यह दूसरा प्रश्न है कि परोपकारिणी सभा को कहाँ तक सफलता हुई । पूरी सफलता न होने के कई कारण हुए । पहला कारण तो ऋषि शीघ्र ही स्वर्गवास था । दूसरा कारण के थोड़े ही समय उदयपुर नरेश का देहांत था । तीसरा कारण यह था कि आर्यसमाज का प्रतिनिधियों द्वारा संगठन बहुत शीघ्र ही बन गया, और आर्य-प्रथा की सम्पूर्ण शक्तियां उधर ही लग गई । अनेक प्रान्तों में, सैकड़ों मीलों की दूरी पर बैठे हुए रईस और समृद्ध महानुभावों के कार्य पर कड़ा निरिक्षण करने की जितनी आवश्यकता थी, आर्य-पुरुष उसे पूरा न कर सके । ये अपनी प्रतिनिधि सभाओं और धीरे धीरे सार्वदेशिक सभा में इतने लीन हो गए कि परोपकारिणी सभाओं और धीरे-धीरे सार्वदेशिक सभा में इतने लीं हो गए कि परोपकारिणी की सभा सुध न ली । परोपकारिणी सभा भी अनुकूल अवसर जानकार स्वप्नानावस्था में पड़ी-पड़ी जीवन के दिन काटने लगी ।

 

  • वैदिक धर्मी

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