भय का नाम ही भूत

भय का नाम ही भूत

एक लड़का भूत से डरा करता था। घर वालों ने डर छुटाने के लिए उसे एक साधू के पास भेजना प्रारम्भ किया; किन्तु लड़का जब साधु के पास जाता तो मार्ग में भी डरता हुआ जाता। एक दिन अंधेरी रात थी, लड़का जब साधुजी के पास पहुंचा तो पसीने से तर हो रहा था, सांस उखड़ रही थ। साधु ने पूछा – “क्यों क्या हाल है?” लड़का बोला – “महाराज! आज तो भूत मेरे सामने आकार खड़ा हो गया, बड़ी कठिनाई से बचकर आया हूँ।” साधु ने कहा- “लो यह पुड़िया ले जावो, कल यदि भूत मिले तो इसे उसके मुख पर मल देना; बस फिर भूत कभी न मिलेगा।” अगले दिन लड़के ने ऐसा ही किया और प्रसन्न होता हुआ बाबाजी की पास पहुँचकर बोला कि महाराज! मैंने भूत के मुंह पर पुड़िया मल दी। बाबाजी बोले बहुत अच्छा किया। अब भूत कभी न मिलेगा। अच्छा जरा दर्पण में अपने मुख को तो देखो। यह कहकर दर्पण हाथ में दे दिया। लड़के ने दर्पण में जो मुख देखा तो स्याही की पुड़िया अपने ही मुख पर लगी पाई। लड़का बड़ा लज्जित हुआ। तब साधु ने कहा – “बच्चा भूत-चुड़ैल कोई पदार्थ नहीं होते है। यह सब मन का वहम है। तू अपने ही में सब कल्पना करके दु:ख उठता है, यह तेरा ही मुख तुझे डराता था। मन से कल्पित भूत-प्रेत के विचार दूर कर निर्भय होकर विचार।”

ऐसे ही वहमों में आज करोड़ों मनुष्य भटक रहे है। मन से गढ़-गढ़ कोई भूत-प्रेत , पारियों को बुलाता है; कोई तीन पाओ की मेज पर जिसके चारों ओर अनेक मनुष्य बैठ जाते है और उन मनुष्यों के शरीर की बिजली से मेज का पाया बार-बार उठने और गिरने लगता है, रूहों (आत्माओं) से उठाया जाना मानते है; यह सब अपने मन के विचार हैं जो शरीर की विद्युत द्वारा मेज के पाए के उठने और गिरने से कल्पित होते है। आत्माएँ आकाश में इस प्रकार उड़ती नहीं फिरती है और न ऐसी-ऐसी तमाशे की बातों का आत्माओं से कोई लेना-देना है।

शिक्षा :- मरने वाले को भूत अर्थात बिता हुआ और शव को प्रेत कहते है। बाकी सब झूठी क्ल्पनाएँ है। भूत-प्रेत को मानने वाला दु:खी रहता है और न मानने वाला सुखी रहता है।

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