मुस्लिम धर्म परिवर्तन और स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आन्दोलन

मुस्लिम धर्म परिवर्तन और स्वामी श्रद्धानंद ‘शुद्धि आन्दोलन ‘

मुस्लिम धर्म परिवर्तन

स्वामी श्रद्धानंद उन आलाकमान नेताओ में से थे जिन्हें खिलाफत आन्दोलन के प्रसंग में बंदी बनाया गया था । सजा पूरी होने के पश्चात उन्होंने देखा की मुसलमानों ने हिन्दुओं का धर्मांतरण करने के लिए एक जेहाद-सा छेड़ दिया है । जगह-जगह हिन्दुओं का उत्पीड़न किया जा रहा है।सन 1925 में सार्वजानिक भाषण में मुस्लिम राष्ट्रवादी नेता डॉ. सैफुद्दीन किचलू ने जिस ढंग में चेतावनी दी थी, उससे मुसलमानों को जेहादी भावना को  आँका जा सकत है:- “मेरे प्यारे हिन्दू भाइयों, मेरी बात को ध्यान से सुनिएगा । यदि आप हमारे आन्दोलन की राह में रोड़े अटकते है और हमे हमारे अधिकार नहीं देते तो हम अफगानिस्तान या किसी अन्य मुसलमान शक्ति के साठग मिलकर इस देश में अपना शासन स्थापित कर लेंगे।”    मुस्लिम धर्म परिवर्तन

मौलवियों, मुल्लों और मुस्लिम धर्म परिवर्तन-अभियान धड़ल्ले से चल रहा था डॉ. अब्दुल्ला सुरहावर्दी जो आर. दास की स्वराज्य पार्टी के प्रमुख नेता और “इंडियन सेन्ट्रल कमेटी” के सदस्य रह चुके है, इसकी प्रशंसा अपनी प्रतिवेदन में इस प्रकार करते है :- ‘धर्मांतरण का क्रम जिसने भारत में मुस्लिम शासन को समाप्ति के बाद नव-शक्ति, स्फूर्ति और प्रेरणा अर्जित की, ब्रोके-टोक निरंतर चल रहा है । हर वर्ष इस्लाम में धर्मान्तरित लोग आते हैं। वे तथा उसने पूर्व-धर्मान्तरितो के वंशज सर्वाधिक उत्साही अनुयायी और समर्थक है… वे हजारों की संख्या में मक्का पहुँचते है, जो इस्लाम का गढ़ और जन्मभूमि है, और वार्षिक ‘हज’ के अनुशासन की तप्त भट्टी में तपकर वे शुद्ध और पवित्र होकर भारत लौटते हैं। अरब की रिती-रिवाजों को ओढने के बाद वे हिन्दुओं से उतने ही अलग-थलग दिख पड़ते हैं, जितने के हिन्दू, चीनियों और यहूदियों से।”  वक्फ बोर्ड से भारत इस्लामिस्तान की ओर अग्रसर कैसे ? 

शुद्धि आन्दोलन

स्वामी श्रद्धानंद के अनुभव किया कि, ‘यदि हिन्दुओं के धर्मांतरण की बढ़ को रोकने के लिए तत्काल कठोर कदम नहीं उठाया गया तो हिन्दुओं और देश का भाग्य ही फूट जायेगा’ । उन्होंने धर्मान्तरित लोगों को पुन: हिन्दुत्व की गोद में लाने के लिए ‘शुद्धि’ आन्दोलन चलाया। उनके  साहस, संत स्वभाव और ओजस्वी भाषणों के कारण हजारों धर्मान्तरित लोग, जो धमकी, दबाव या प्रलोभन के शिकार हो गए थे। उनके अनुरोध पर पुन: हिन्दू बनने लगे । 1923 की पहली छमाही में सयुंक्त प्रांत के कुछ भागों में 18,000 से भी अधिक मुसलमान पुन: हिन्दू बन गए। मुस्लिम मुल्लो को लगा कि उनके पावन तले की धरती जैसे खिसकने लगी है और वे’इस्लाम-विरोधी अभियान’ के लिए स्वामी जो को कोसने लगे । धर्म परिवर्तन में मुस्लिम लोगों का तर्क होता था कि इस्लाम में धर्मांतरण एक मजहबी कर्तव्य-भर है जो क़ुरान ने उन पर डाला है ।    मुस्लिम धर्म परिवर्तन

स्वामी श्रद्धानंद के व्यंग्य :-

धर्मांतरण के सम्बन्ध में स्वामी श्रद्धानंद ने तीखे तीर मारे है :- स्वामी जी कहते है की ’13 फरवरी, 1923 को मुझसे कहा गया की राजपूत भाई मलकाना राजपूतों का पुनरुद्धार करना चाहते है, और उस आन्दोलन का मैं नेतृत्व करूँ । मुझे आश्चर्य हुआ जब मैंने देखा की जहाँ खुलेआम ‘तब्दील’ करने वाले मुस्लिम नेताओं को कांग्रेस की नीति का मार्गदर्शन करने दिया जाता है, और उन्हें उनके अधिकृत प्रतिनिधियों के रूप में काम करने दिया जाता जाओ, वहां हिन्दू समाज को विघटन से बचाने का के काम में रत लोगों पर लांछन लगाया जाता है और उन्हें कांग्रेस कार्यकारिणी में नहीं आने दिया जाता।’   बंग भंग विरोधी आन्दोलन के खिलाफ नाकाम मुस्लिम और अंग्रेज ?

डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा श्रद्धानंद के आलोचकों का खंडन

स्वामी श्रद्धानंद के आलोचकों द्वारा अपनाये गए दोहरे मापदंड का डॉ. राजेंद्र प्रसाद निराकरण करते हुए कहते है: “राष्ट्रवादियों और मुसलमानों- दोनों ने ही स्वामी के शुद्धि-आन्दोलन की भरी आलोचना की है । उस समय विशेष में उस कार्य के लिए अक्सर ईसाई और मुसलमान उन पर किस आधार पर अंगुली उठा सकते हैं। वे बराबर सवमत के प्रसार में जुटे हुए है और हिन्दुओं का धर्म-परिवर्तन करके उन्हें अपने-अपने सम्प्रदायों में समेटते जा रहे हैं। तब यदि हिन्दू भी गैर हिन्दुओं को अपने धर्म में अन्त्रित्कारना प्रारंभ कर दे तो गैर-हिन्दुओं को आपत्ति करने का कोई भी अधिकार नहीं है, विशेषत: जब वे स्वयं धर्मांतरण के कार्य में जुटे हुए हैं । हिन्दुओं को भी दूसरों की भांति अपने धर्म का प्रचार करने का वैसा ही अधिकार मिलना चाहिए।”    मुस्लिम धर्म परिवर्तनभारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना क्यों की गई ?

वे मुसलमान, जो खिलाफत के दिनों में मस्जिद के अन्दर स्वामीजी का भरी स्वागत करते थे, अब उन्हें अपना सबसे बड़ा शत्रु समझने लगे । जिसका मुख्य कारण यह था कि पुन: धर्मांतरण मुस्लिम नेताओं के लिए सबसे बड़ा हौवा बन गया था। यदि स्वामी जी द्वारा चलाए गया  “शुद्धि आन्दोलन” बल पकड़ लेता तो न केवल हिन्दू ध्जर्म को छोड़कर मुसलमान बनने का एक हजार वर्ष से एक ही दिशा में चल रहा प्रवाह सदा के लिए थाप हो जाता, बल्कि हो सकता था की यह क्रम ही पलट जाता । धर्मांतरण की गति मन्द होने पर दारुल इस्लाम का उनका स्वप्न ही भंग हो जाता। जब तक हिन्दुओं ने स्व्युं ही धर्मातरितों के लिए अपने द्वार दण्ड कर रखे थे, मुसलमान सुरक्षित स्थिति में थे। किन्तु अब इस ‘खतरनाक’ स्वामी ने द्वार खोल दिए थे। यदि इस क्रम को चलने दिया जाता तो मुसलमानों की सभी योजनाओं पर पानी फिर जाता। अत: उन्होंने कुछ करने का निर्णय किया ।     मुस्लिम धर्म परिवर्तन

श्रद्धानंद का मुस्लिम द्वारा कत्ल

दिनांक 23 दिसम्बर, 1926 को स्वामी श्रद्धानंद बीमार थे। अब्दुल रशीद नाम का एक मुस्लिम युवक उसने मिलें आया । उसने एक गिलास पानी माँगा और जब सेवक अन्दर चला गया तो उसने अपना रिवाल्वर निकाला और स्वामिहि पर चार बार गोली चलायी । स्वामी श्रद्धानंद खून से लथपथ बिस्तर में ही स्वर्ग सिधार गए । जब रशीद पकड़ा गया और उस पर अभियोग चलाया गया तो मुसलमानों ने उसके विधिक बचाव के लिए काफी पैसा इकट्ठा किया । कांग्रेस के एक प्रमुश सदस्य आसफ अली ने उसकी पैरवी की । अंतत: रशीद का दोष सिद्ध हो गया और उसे फांसी दे दी गयी । श्रद्धानंद एक महान क्रांतिकारी 

श्रद्धानंद के हत्यारे को शहीद बनाने का प्रयास :-

हत्यारे की शवयात्रा में पचास हजार से भी अधिक मुसलमान शामिल हुए । वह एक हत्यारा था, जिसने हिन्दुओं के एक महान संत और धार्मिक नेता का कत्ल किया था। मस्जिदों में उसके लिए विशेष नमाज अदा की गयी । जमियत-उल-उलेमा के अधिकृत मुखपत्र के एक पत्रक में तरह-तरह के तर्क देकर रशीद क ‘शहीद’ के सिंहासन पर बैठाने का प्रयास किया गया । 30 नवम्बर, 1927 के ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के समाचार पत्र में छपा था कि स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे अब्दुल रशीद की आत्मा को जन्नत में स्थान दिलाने के लिए देवबंद के प्रसिद्ध इस्लामी कॉलेज के छात्रों और प्रोफेसरों ने क़ुरान की पूरी आयतों का पांच बार पाठ किया । उन्होंने दुआ मांगी, ‘अल्लाह रशीद को सातवें आसमान की चोटी पर स्थान दें ।      मुस्लिम धर्म परिवर्तन

श्रद्धानंद की हत्या के विषय में गाँधी और पट्टाभि सीतारमैया के विचार

स्वामी श्रद्धानंद की हत्या के बारे में गाँधी जी की प्रतिक्रिया भी कुछ अलग ही थी। 1926 में गोहाटी कांग्रेस अधिवेशन में स्वामीजी के प्रति श्रद्धांजलि-प्रस्ताव उन्होंने प्रस्तुत किया था इर उसका अनुमोदन उन्होंने मोहम्मद अली से करवाया था । पट्टाभि सीतारामैया ने लिखा है कि ‘गाँधी जी ने बताया की सच्चा धर्म क्या होता है और हत्या के कारणों पर प्रकाश डालते हुए कहा : ‘‘अब शायद आप समझ गए होंगे की किस कारण मैंने अब्दुल रशीद कोभी कहा है और मैं पुन: उसे भाई कहता हूँ। मैं तो उसे स्वामीजी की हत्या का दोषी भी नहीं मानता । वास्तव में दोषी तो वे है जिन्होंने एक दूसरे के विरुद्ध घृणा फैलायी ।   मुस्लिम धर्म परिवर्तन

गाँधी का रूप :-

हिंसा में प्रवृत होने के कारण भगतसिंग आदि देशभक्तों की जीवन-रक्षा चाहने वाली याचिका पर हस्ताक्षर करने से गाँधी ने इंकार कर दिया था और हिंसा के ही कारण उन्होंने शिवाजी, राणा प्रताप तथा गुरु गोविन्द सिंह को ‘पथभ्रष्ट देशभक्त’ कहा था । कांग्रेस की मिली भगत ने ही गाँधी जैसे मुस्लिम को हिन्दुओं का नेता बनाया था । अगर उस समय इस देशद्रोही की जगह अगर स्वामी श्रद्धानंद होते तो  आज इस की स्थिति कुछ ओर ही  देखने को मिलती । बलिदानियों का नाम इतिहास में दर्ज होता । भारत  के इतने भाग नहीं होते ।

  • वैदिक धर्मी

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