यज्ञ का वेदों में क्या महत्व है और इसका लाभ क्या है ?

वेदों में यज्ञ की महिमा

यज्ञ पर वेदों में अनेक जगह इसके के महत्व पर प्रकाश डाला है जिन्हें अर्थ सहित उद्धत किया गया हैं ।

 

  1. ते वो ह्रदे मनसे सन्तु यज्ञा: । ऋग्वेद 4.37.2

अग्निहोत्र तुम्हारे ह्रदय और मन की तृप्ति के लिए हों ।

  1. नासिष्वेरापिर्न सखा न जामि: । ऋग्वेद 4.45.6

अयाज्ञिक का कोई बंधु, सखा या सम्बन्धी नहीं होता ।

  1. यज्ञेयज्ञे न उदव । ऋग्वेद 5.5.9

यज्ञ-यज्ञ में हमें उत्कर्ष प्राप्त करा ।

  1. अहेलमान उप याहि यज्ञम् । ऋग्वेद 6.4.41

भक्तिभाव से यज्ञ में पहुँच।

  1. मा शिश्नदेवा अपि गुर्ऋतं न: । ऋग्वेद 7.21.2

कामक्रीड़ा करने वाले लोग हमारे यज्ञ में न आवें ।      वैदिक सम्पूर्ण संध्या विधि (संध्या कैसे करें) ?

  1. मा यज्ञो अस्य िस्त्रधद् ऋतायो: ।। ऋग्वेद 7.34.17

सत्य के पुजारी का यज्ञ विफल नहीं होता ।

  1. ईजानस्तरित द्विष: । ऋग्वेद 7.59.2

यज्ञ करने वाला द्वेषियों को जीत लेता हैं ।

  1. इच्छन्ति देवा: सुन्वन्तम् । ऋग्वेद 8.2.18

यज्ञ करने वाले से विद्वान् लोग प्रीति करते हैं ।

  1. यज्ञो वितन्तसाय्य: । ऋग्वेद  8.68.11

हवन सर्वत्र सुख फ़ैलाने वाला हैं ।

  1. चारु प्रियतमं हवि: । ऋग्वेद 9.34.5

अग्निहोत्र की हवि चारू और प्रियतम हो ।

  1. स्वाहा वयं कृणवामा हवींषि । ऋग्वेद 10.2.2

हम स्वाहापूर्ण हवियों की आहुति दें ।

  1. निषिद होत्रमृतुथा यजस्व । ऋग्वेद 10.98.4

अग्निहोत्र में बैठे, ऋतु के अनुकूल यज्ञ करें ।    किन-किन मंत्रो से हवन करना चाहिए ? हवन की सम्पूर्ण विधि 

  1. नासुन्वता सख्यं वष्टि शूर: । ऋग्वेद 10.42.2

शूर प्रभु हवन  न करने वाले से मित्रता नहीं चाहता ।

  1. यज्ञश्च भूद् विदथे चारुरन्तम: । ऋग्वेद 10.100.6

चारू अग्निहोत्र हमारे जीवन में निकटतम रहे ।

  1. नाब्रह्मा यज्ञ ऋधग् जोषति त्वे ।  ऋग्वेद 10.105.8

ब्रह्मारहित हवन अलग पड़कर प्रभु को प्रिय नहीं होता ।

  1. अरं कृण्वन्तु वेदिं समग्निमिन्धतां पुर: । ऋग्वेद 10.170.4

यज्ञवेदी अलंकृत करो, अग्नि प्रज्वलित करो ।

  1. सहस्त्रंभर: शुचिजिह्वो अग्नि: । ऋग्वेद 2.9.1

पवित्र ज्वाला वाला यज्ञाग्नि सहस्त्र लाभ पहुँचाता हैं ।

  1. जिघम्र्यग्निं हविषा घृतेन । ऋग्वेद 2.10.4

अग्निहोत्र को हवि और घृत से प्रदीप्त करता हूँ ।

  1. यज्ञेन गातुमत्पुरो विविद्रिरे । ऋग्वेद  2.21.5

कर्मपरायण लोग अग्निहोत्र से सन्मार्ग की दिशा पाते हैं ।

  1. हिरण्यवर्णं घृतमन्नमस्य । ऋग्वेद 2.35.11

पीतवर्ण घृत यज्ञाग्नि का अन्न हैं ।       गुरु शिष्य परम्परा के पतन से भारत पतन की ओर अग्रसर कैसे ?

  1. जुहोमि हव्यं तरसे बलाय । ऋग्वेद 3.18.3

वेग और बल पाने के लिए हव्य की आहुति देता हूँ ।

  1. वर्चो धा यज्ञवाहसे । ऋग्वेद 3.8.3

हे प्रभु, यज्ञकर्ता को तेज प्रदान करो ।

  1. बर्हिर्न आस्तामदिति: सुपुत्रा: । ऋग्वेद 3.4.11

सुपुत्रवती माता हमारे हवन में आकर बैठे ।

  1. विप्रो यज्ञस्य साधन: । ऋग्वेद 3.27.8

बुद्धिमान मनुष्य यज्ञ का साधक होता हैं ।

  1. यज्ञस्ते वज्रमहिहत्य आवत् । ऋग्वेद 3.32.12

यज्ञ तेरे व्रज को पाप-विनाथ के लिए प्रेरित करे ।

  1. असिक्यां यजमानो न होता । ऋग्वेद 4.17.5

रात्रि में यजमान आहुति न दे ।      The Galaxy in the Vedas 

  1. अयं यज्ञो भुवनस्य नाभि: । ऋग्वेद 1.164.35

यह यज्ञ भुवन का केंद्र हैं ।

  1. अतमेरुर्यज्ञ: । यजुर्वेद 1.23

हवन ग्लानी मिटाने वाला हैं ।

  1. ऊध्रर्वोअध्वर आस्थात् । यजुर्वेद 2.8

यज्ञ सबसे ऊपर स्थित है ।

  1. यज्ञस्य शिवे सन्तिष्ठस्व । यजुर्वेद 2.14

अग्निहोत्र के शिव कर्म में सलंग्न हो ।

  1. मेधायै मनसेअग्नये स्वाहा । यजुर्वेद 4.7

मेधा और मनोबल पाने के लिए हम अग्नि में आहुति देते हैं ।

  1. दीक्षायै तपसे अग्नये स्वाहा । यजुर्वेद 4.7

दीक्षा और तपोबल पाने के लिए हम अग्नि में आहुति देते हैं ।  Birth of Gold and Minerals in the Vedas 

  1. गंभीरमिममध्वरं कृधि । यजुर्वेद 6.30

यज्ञ को गंभीर बना ।

  1. यज्ञो देवानां प्रत्येति सुम्नम् । यजुर्वेद 4.4

यज्ञ विद्वानों को सुख पहुँचाता हैं ।

  1. प्रजानन् यज्ञमुपयाहि विद्वान । यजुर्वेद 8.20

विद्वान, तू हवन का लाभ जानता हुआ यज्ञ में आ ।

  1. अग्नये गृहपतये स्वाहा । यजुर्वेद 10.23

गृहरक्षक यज्ञाग्नि में आहुति दो ।

  1. सत्या: सन्तु यज्ञमानस्य कामा: । यजुर्वेद 12.44

यजमान की कामनाएं पूर्ण हो ।     Water Ships in the Vedas 

  1. सुब्रह्मा यज्ञ: सुशमि वसूनाम् । यजुर्वेद 15.34

उत्कृष्ट ब्रह्मा वाला अग्निहोत्र ऐश्वर्यों का सुकर्ता होता है ।

  1. भद्रो नो अग्निराहुत: । यजुर्वेद 15.38

आहुति दी हुई यज्ञाग्नि हमारे लिए भद्र हो ।

  1. स्वर्यन्तु यजमाना: स्वस्ति । यजुर्वेद17.69

यजमान लोग स्वरित तथा मोक्ष को प्राप्त करें ।

  1. तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेषम् यत्र देवा: सहाग्निना । यजुर्वेद 20.35

वह देश पुण्यवान है, जहाँ विद्वान अग्निहोत्र करते हैं ।

  1. आ जुहातो हविषा मर्जयध्वम् । साम० 63

अग्निहोत्र किया करो, हवि से पवित्रता लाओ ।

  1. इदं हविर्यातुधानान् नदी फ़ेनमिवावहत् ।  अथर्ववेद 1.8./

यह हवि यातनादायक रोगों को बहा ले जाए, जैसे नदी झाग को ।   Air Ships Science in the Vedas 

  1. सम्यञ्चोअग्निं सपर्यत । अथर्ववेद 3.30.6

सब मिलकर अग्निहोत्र किया करो ।

  1. यस्य कृणमो हविर्गृहे तमग्ने वर्धया त्वम् । अथर्ववेद  6.5.3

जिसके घर में हम अग्निहोत्र करें उसे प्रभु, तू बढ़ा ।

  1. हविष्मन्तं मा वर्धय जयेष्ठतातये । अथर्ववेद 6.39.1

हे प्रभु, मुझ हविष्मान को बढ़ा, जिससे मैं जयेष्ठ बनू ।

  1. घृतं तुभ्यं दुह्रतां गावो अस्मे । अथर्ववेद82.6

हे यज्ञाग्नि, तुझ में हवं के लिए गोएं हमें घृत देती रहे ।

  1. अग्नेर्होत्रेण प्रणुदे सपत्नान् । अथर्ववेद 6.2.6

अग्निहोत्र से मैं रोगादि शत्रुओं को दूर करता हूँ ।      तलाक के विषय में वेदों में क्या कहा गया है ?

  1. समिद्धो अग्नि: सुपुना पुनाति अथर्ववेद 12.2.11

प्रज्वलित यज्ञाग्नि अपनी सुपावकता से वायुमंडल को पवित्र करती है ।

  1. वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम     अथर्ववेद 19.55.3

हे यज्ञाग्नि, तुझे प्रज्जवलित करके हम शरीर की पुष्टि पायें ।

  1. किमु स यज्ञेन यो गामिव यज्ञं न दुहीत । मै०सं० 1.4.5

उसका अग्निहोत्र करने से क्या लाभ, जो गाय के सदृश यज्ञ से कुछ दुहे नहीं ।

  1. अग्निहोत्रे वै सर्वे यज्ञक्रतव: । मै०सं० 1.8.6

अग्निहोत्र में सब यज्ञकर्म समाविष्ट हैं ।

  1. व्रतेन यज्ञ: सन्तत: । मै०सं० 3.6.6

व्रत से अग्निहोत्र अनुष्ठित होता हैं ।

  1. स्त्रवति वै यज्ञो संस्थित: । क०क०सं०

अदृश यज्ञ चू जाता है ।     Agriculture in the Vedas 

  1. यज्ञो वै सुतर्मा नौ: । ऐ. ब्रा. 1.13

हवन आसानी से भावसगार पार कराने वाली नौका है ।

  1. नादक्षिणेन यज्ञेन यजेत। का०श०ब्रा० 3.1.8.2

बिना दक्षिणावाला यज्ञ न करें ।

  1. हवींषि ह वा आत्मा यज्ञस्य श०ब्रा० 1.6.3.39

हवियाँ ही यज्ञ का आत्मा है ।

  1. शतोन्मानो वै यज्ञ: ।  श०ब्रा० 12.7.2.13

हवन सैकड़ों उत्थान देने वाला हैं ।

  1. मुखं वा एतद् यज्ञानां यदग्निहोत्रम् ।। श०ब्रा० 14.3.1.19

अग्निहोत्र यज्ञों का मुख हैं ।

  1. यज्यौ वै श्रेष्ठमं कर्म  ।श०ब्रा० 1.7.1.5

हवन ही श्रेष्ठतम कर्म हैं ।   राजा भोज के समय में विज्ञान 

 

  • वैदिक धर्मी

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