Chanakya Niti Shloka( चाणक्य नीति श्लोक) हिंदी अनुवाद :- भाग-5 :- 81 से 100

Chanakya Niti Shloka (चाणक्य नीति श्लोक):- हिंदी व्याख्या

Chanakya Niti Shloka :-

81. हस्तीस्थूलतनु: स चाड़्कुशवश: किं हस्तिमात्रोड़्कुशो

दीपे प्रज्वलिते प्रणश्यति तम: किं दीपमात्रं तम: ।

वज्रेणापि हता: पतन्ति गिरय: किं वज्रमात्रो गिरिस्

तेजो यस्य विराजते स बलवान स्थूलेषु क: प्रत्यय: ।।

हाथी विशाल शरीर वाला होता है, परन्तु उसे अंकुश से वश में किया जा सकता हैं। जबकि हाथी के परिमाण की तुलना में अंकुश बहुत ही छोटा होता है। दीपक जलने से अंधकार नष्ट हो जाता है। क्या अंधकार दीपक के आकर का होता है? वज्र की चोट से बड़े पर्वत भी गिर जाते है, क्या पर्वत का आकार वज्र जितना होता है? अर्थात् प्रत्येक वस्तु  तेज के कारण ही बलवान होती है। लंबे चौड़े शरीर पर कोई भरोशा नहीं किया जा सकता है।(Chanakya Niti Shloka ८१)

82.   आत्मद्वेषात् भवेन्मृत्यु: परद्वेषात् धनक्षय: ।

राजद्वेषात् भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात् कुलक्षय: ।।

अपनी ही आत्मा से द्वेष रखने वाले की मृत्यु हो जाती है। दूसरों से द्वेष रखने वालो का धन नष्ट हो जाता है। राजा से द्वेष रखने वाला मनुष्य अपना नाश करता है, लेकिन ज्ञानी पुरुष व गुरुजनों से द्वेष रखने से कुल का नाश हो जाता है । (Chanakya Niti Shloka ८२)

83.  रड़्कं करोति राजानं राजानं रड़्कमेव च ।

धनिनं निर्धनं चैव निर्धनं धनिनं विधि: ।।

भाग्य सबसे प्रबल होता है। उसके ही कारण निर्धन राजा बन सकता है और राजा कंगाल। कहने का तात्पर्य है की भाग्यवश धनवान व्यक्ति निर्धन बन जाता है। और निर्धन के पास अत्यधिक धन आ जाता है।(Chanakya Niti Shloka ८३)

84.  येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मं: ।

ते मत्र्य लोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।।

जिसके पास न विद्या है, न तप है, न उसमे दान देने की प्रवृति है, न ज्ञान है, न नम्रता है, गुण और धर्माचरण की भावना नहीं है, ऐसे मनुष्य पशु के रूप में इस संसार में विचरते है।(Chanakya Niti Shloka ८४)

85.  यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।

लोभनाभ्यां विहीनस्य दर्पण: किं करिष्यति।।

जिसके पास अपनी बुद्धि नहीं है, शास्त्र उसका क्या कर सकेगा। जिस प्रकार अंधे के लिए दर्पण का क्या उपयोग है ?(Chanakya Niti Shloka ८५)

86.  बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्।

वने सिंहो मदोन्मत्त: शशकेन निपातित: ।।

जिसके पास बुद्धि है, उसके पास बल भी होता है, बुद्धिहीन व्यक्ति के पास शक्ति नहीं होती। जिस प्रकार जंगल में अपनी शक्ति के मद में मस्त सिंह को एक खरगोश ने मार डाला था ।(Chanakya Niti Shloka ८६)

87.  वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं दुमालयं पत्रफ़लाम्बुभोजनम् ।

तृषेणु शय्या शतजीर्णवल्कलं न बंधुमध्ये धनहीनजीवनम् ।।

मनुष्य सिंह और हाथियों से युक्त वन में निवास कर सकता है, किसी पेड़ पर अपना घर बनाकर वृक्षों के पत्ते और फल खाकर गुजारा कर लें, तिनकों का शय्या पर सो लें, फटे पुराने वृक्षों की छल के कपडे पहन लें, परन्तु अपने भाई-बंधुओं के साथ दरिद्र बनकर जीवन नहीं बिताना चाहिए ।(Chanakya Niti Shloka ८७)

चाणक्य नीति :- हिंदी अनुवाद

88.  विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या वेदा: शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्।

तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणियं छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ।।

ज्ञानी एक वृक्ष के समान है और संध्या अर्थात् आराधाना उस ब्राहमणरूपी वृक्ष की जड़ है, वेद उस वृक्ष की शाखाएं हैं धर्म-कर्म उसके पत्ते हैं, इसलिए उसे यत्नपूर्वक जड़ की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि जड़ के नष्ट होने पर न शाखाएं रहेंगी और न पत्ते ।(Chanakya Niti Shloka ८८)

89.  एकवृक्षसमारूढा नाना वर्णा विहड़्गमा: ।

प्रभाते दशसु दिक्षु तत्र का परिदेवना ।।

अनेक रंग-रूप वाले वृक्ष पक्षी रात्रिकाल एन एक वृक्ष पर आकर बैठ जाते है। प्रात:काल में वे सभी दसों दिशाओं में उस जाते है। इस विषय में शोक करने की आवश्यकता नहीं।(Chanakya Niti Shloka ८९)

90.   दातृत्वं प्रियवक्तृत्वं धीरत्वमुचितज्ञता ।

अभ्यासेन न लभ्यन्ते चत्वार: सहजा गुणा: ।।

दान देने की इच्छा, मधुर वचन बोलना, सहनशीलता और उचित-अनुचित का ज्ञान- ये चार बातें मनुष्यों में सहज स्वभाव से ही होती है, इन्हें अभ्यास से प्राप्त नहीं किया जा सकता ।(Chanakya Niti Shloka ९०)

91.  आत्मवर्गं परित्यज्य परवर्गं समाश्रयेत् ।

स्वयमेव लयं याति यथा राजाऽन्यधर्मत: ।।

जो मनुष्य अपने वर्ग के लोगों को छोड़कर दुसरे वर्ग का सहारा लेता है, वह उसी प्रकार स्वयं नष्ट हो जाता है जैसे अधर्म का आश्रय लेने वाला राजा ।(Chanakya Niti Shloka ९१)

92.  अन्तर्गतमलो दुष्टस्तीर्थस्नानशतैरपि ।

न शुध्यति यथा भाण्डं सुराया दाहितं च यत् ।।

जिस व्यक्ति के अंत:करण  में कामवासना, कुटिलता आदि भरी होती है, वह यदि सैकड़ों बार भी तीर्थ-स्नान करने तो भी पवित्र नहीं हो सकता । जिस प्रकार शराब रखने का बर्तन, आग पर तपाने से भी शुद्ध नहीं हो सकता है।(Chanakya Niti Shloka ९२)

93.  न वेत्ति यो यस्य गुणप्रकर्षं स तं सदा निन्दति नाऽत्र चित्रम् ।

यथा किराती करिकुम्भजाता मुक्ता: परित्यज्य बिभर्ति गुञ्जा: ।।

जिसे किसी वस्तु के गुणों का ज्ञान नहीं होता वह सदा उनकी निंदा करता रहता है। उसके ऐसा करने से किसी आश्चर्य नहीं होता है। जैसे जंगल में रहने वाली भीलनी, हाथी के मस्तक में उत्पन्न होने वाले मोतियों को छोड़कर गुंजा फल की माला पहनती है।(Chanakya Niti Shloka ९३)

94.  गृहाऽऽसक्तस्य नो विद्या नो दया मासंभोजिन: ।

द्रव्यलुब्धस्य नो सत्यं स्त्रैणस्य न पवित्रता ।।

घर-गृहस्थी में अधिक आसिक्त रखने से व्यक्ति को विद्या की प्राप्ति नहीं हो सकती। जो लोग मांस खाते हैं उनमे दया नहीं होती और जो धन के प्रति लालची होते हैं उनमें सत्य नहीं होता और भोगविलास में लगे रहने वाले मनुष्य में पवित्रता नहीं आती है।(Chanakya Niti Shloka ९४)

95.   न दुर्जन: साधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिक्ष्यमाण: ।

आमूलसिक्त: पयसा घृतेन न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति ।।

जिस प्रकार नीम के वृक्ष की जड़ को दूध और घी से सींचने पर भी उसमें मधुरता पैदा नहीं होती, उसी प्रकार दुर्जन व्यक्ति को अनेक प्रकार के उपदेश देने पर भी उसमें सज्जनता नहीं आती।(Chanakya Niti Shloka ९५)

96.   देयं भोज्यधनं सदा सुकृतिभिर्नो संचितव्यं कदा

श्री कर्णस्य बलेश्च विक्रमपतेरधापि कीर्ति: स्थिता ।

अस्माकं मधु दानभोगरहितं नष्टं चिरात्सञ्चितं

निर्वाणादिति पाणिपादयुगले घर्षन्त्यहो मक्षिका: ।।

चाणक्य के अनुसार सज्जन व्यक्तियों का धन सदा दान अकरने के लिए ही होता । वे कभी उसका संचय नहीं करते हैं। शहद का संग्रह करने वाली मधुमक्खीयों को भी पैर रगड़कर पश्चाताप करना पड़ता है, क्योंकि शहद का दान न करने से शहद नष्ट हो जाता है । इसी प्रकार कुछ लोग धन का दान नहीं करते और जब नष्ट होता है तो पश्चाताप करते है।(Chanakya Niti Shloka ९६)

चाणक्य नीति श्लोक

97.   हस्तौ दानविवर्जितौ श्रुतिपुटौ सारस्वतद्रोहिणौ

नेत्रे साधुविलोकनेन रहिते पादौ न तीर्थं गतौ ।

अन्यायार्जितवित्तपूर्णमुदरं गर्वेण तुंगं शिरो

रे रे जम्बुक मुञ्च सहसा नीचं सुनिन्घं वपु: ।।

जिसने जीवन में दोनों हाथ कभी दान न दिया हो, कानों से वेद, शास्त्रों का श्रवण नहीं किया, नेत्रों से सज्जन पुरुषों के दर्शन नहीं किए, पैरों से तीर्थयात्रा नहीं की, जिसने गलत रिती से धन इक्कट्ठा करके जीविका चाय है अभिमान से सिर उठाकर चलने वाले हे रंगे सियार! तू तो नीच लोगों से भी नीच है, जितनी जल्दी हो सके, इस शरीर को त्याग दें ।(Chanakya Niti Shloka ९७)

98.  सानन्दं सदनं सुताश्च सुधिय: कान्ता प्रियालापिनि

इच्छापूर्तिधनं स्वयोषिति रति: स्वाऽऽज्ञापरा: सेवका: ।

आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे

साधो: सड़्गमुपासते च सततं धन्यो गृहस्थाऽऽश्रम: ।।

जो घर से परिपूर्ण हो, जिसकी संतान बुद्धिमान हों, जिसकी पत्नी मृदुभाषिणी हो, इच्छापूर्ति योग्य धन हो, अच्छे मित्र हों, अपनी पत्नी के प्रति प्रेमी हो, नौकर आज्ञा पालन करने वाले हों। जहाँ अतिथियों का आदर-सम्मान होता हो, परमेश्वर की उपासना होती हो, प्रतिदिन मीठे भोजन और मधुर पेयों की व्यवस्था हो, जिस गृहस्थी को सदा सत्संगति करने का अवसर मिलता हो, ऐसा गृहस्थ आश्रम धन्य है।(Chanakya Niti Shloka ९८ )

99.  न विप्रपादोदककर्दमानि न वेदशास्त्रध्वनिगर्जितानि ।

स्वाहा-स्वधाकर-विवर्जीतानि श्मशानतुल्यानि गृहाणि तानि ।।

जिन घरों में साधु-संतों के पांव नहीं धोएं जाते, जहाँ वेद शास्त्रों के पाठ की ध्वनि न गूंजती हो, जिस घर में स्वाहा और स्वधा शब्दों का उच्चारण नहीं होता, वे घर श्मशान के समान होते हैं।(Chanakya Niti Shloka ९९)

100.   सत्यं मातापिता ज्ञानं धर्मों भ्राता दया स्वसा ।

शान्ति: पत्नी क्षमा पुत्र: षडेते मम बान्धवा: ।।

सत्य मेरी माता है, ज्ञान मेरा पिता है, धर्म मेरा भाई है और दया ही मेरी बहन हैं शांति मेरी पत्नी है और क्षमा मेरा पुत्र है- यह छ ही मेरे परिवार के सदस्य हैं।(Chanakya Niti Shloka १००)

 

  • वैदिक धर्मी

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