Chanakya Niti Sloka(चाणक्य नीति श्लोक) भाग-4; 61 से 80

Chanakya Niti Sloka  (चाणक्य नीति श्लोक):- हिंदी व्याख्या

Chanakya Niti Sloka

61.  शुचिर्भूमिगतं तोयं शुद्धा नारी पतिव्रता ।

शुचि: क्षेमकरो राजा संतोषि ब्राह्मण: शुचि: ।।

पृथ्वी के भीतर से निकलने वाला पानी पवित्र होता है। पतिव्रता नारी पवित्र होती है। प्रजा का कल्याण करने वाला राजा पवित्र होता है। और संतोषी ब्राहमण को भी पवित्र माना जाता है। (Chanakya Niti Sloka ६१)

62.  असन्तुष्टा द्विजा नष्टा: सन्तुष्टाश्च महीभृत: ।

सलज्जा गणिका नष्टा निर्लज्जाश्च कुलाड़्गना: ।।

संतोषरहित विद्वान संतुष्ट होने वाला राजा, लज्जायुक्त वेश्या और लज्जाहीन कुलीन स्त्रियाँ नष्ट हो जाती है।(Chanakya Niti Sloka ६२)

63.   न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृन्मये ।

भावे हि विद्यते देवस्तस्माद् भावो हि कारणम् ।।

परमेश्वर काठ, पत्थर या मिट्टी की मूर्ति में नहीं बसते हैं। वह तो मनुष्य की भावना में विद्यमान रहते हैं, अर्थात् मनुष्य की भावना के अनुसार ही प्रभु प्रकट होते हैं।(Chanakya Niti Sloka ६३)

64.    शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम् ।

न तृष्णाया: परो व्याधिर्न च धर्मों दयापर: ।।

शांति के सामान कोई तप नहीं, संतोष से बढ़कर कोई सुख नहीं, तृष्णा से बढ़कर कोई रोग नहीं, दया से बढ़कर कोई धर्म नहीं होता हैं।(Chanakya Niti Sloka ६४)

65.   क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी ।

विद्या कामदुघा धेनु: सन्तोषो नन्दनं वनम्।।

क्रोध यमराज की मूर्ति के समान हैं। तृष्णा नरक के बहने वाली वैतरणी हैं। विद्या कामधेनु है और संतोष नंदनवन के समान सुख देने वाला है।(Chanakya Niti Sloka ६५)

चाणक्य नीति श्लोक

66.   मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत् त्यज ।

क्षमाऽऽर्जवं दया शौचं सत्यं पियूषवद् भज ।।

यदि तुम मुक्ति चाहते हों तो बुरी आदतों का विष के सामान त्याग कर दो और क्षमा, सहनशीलता, दया, पवित्रता और सत्य को अमृत के समान ग्रहण करो।(Chanakya Niti Sloka ६६)

67.   परस्परस्य मर्माणि ये भाषन्ते नराधमाः ।

त एवं विलयं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ।।

जो लोग परस्पर की गुप्त बातों को दूसरे से कह देते हैं, वे दीमक के घर में रहने वाले सांप की तरह नष्ट हो जाते हैं।(Chanakya Niti Sloka ६७)

68.   किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनाम् ।

दुष्कुलिनोऽपि विद्वांश्च देवैरपि सुपूज्य्ते ।।

विद्याहीन व्यक्ति के कुल के विशाल होने से कोई लाभ नहीं, यदि नीच कुल में उत्पन्न हुआ व्यक्ति विद्वान् है तो देवता भी उसकी पूजा करते हैं।(Chanakya Niti Sloka ६८)

69.   विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् गच्छति गौरवम् ।

विधया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते ।।

संसार में विद्वान् की ही प्रसंशा होती है। विद्वान् को ही सम्मान सहित सब कुछ प्राप्त होता है और विद्या की ही सब जगह पूजा होती हैं(Chanakya Niti Sloka ६९)

 

चाणक्य नीति हिंदी अनुवाद

70.   मांसभक्षै: सुरापानैर्मूखैंश्चाक्षरवर्जितै: ।

पशुभि: पुरुषाकारैर्भाराऽऽक्रान्ता च मेदिनी ।।

मांस खाने वाले, शराब पीने वाले, मूर्ख और निरक्षर मनुष्य रूपी पशुओं से यह पृथ्वी पीड़ित और दबी रहती है।(Chanakya Niti Sloka ६०)

71.   अर्थांऽधीताश्च यैर्वेदास्तथा शूद्रान्नभोजिन: ।

ते द्विजा: किं करिष्यन्ति निर्विषा इव पन्नगा: ।।

जो विद्वान् धन की प्राप्ति के लिए वेदों का अध्यापन करते हैं, जो नीच मनुष्यों का अन्न खाते हैं, वे विषहीन सांप की तरह कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं।(Chanakya Niti Sloka ७१)

72.   यस्मिन् रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैव धनाऽऽगम: ।

निग्रहोऽनुग्रहो नास्ति स रुष्ट: किं करिष्यति ।।

जिसके नाराज होने का दर नहीं होता, जिसके प्रसन्न होने पर लाभ नहीं होता, जो न दण्ड दे सकता है और न दया कर सकता है उसके नताज होने से किसी को प्रभाव नहीं पड़ता हैं।(Chanakya Niti Sloka ७२)

73.    निर्विषेणाऽपि सर्पेण कर्तव्या महति फ़णा ।

विषमस्तु न चाप्यस्तु घटाटोपो भयङ्कर: ।।

विषहीन सांप को भी अपना फन फैलाकार रखना चाहिए, उसमें विष होने या न होने को  कोई नहीं जानता, पर उसके इस आडम्बर से लोग भयभीत होते सकते हैं।(Chanakya Niti Sloka ७३)

 

Chanakya Niti Satkama

74.   प्रातर्धूतप्रसंगेन मध्याह्ने  स्त्रीप्रसङ्गत: ।

रात्रौ चौर्यप्रसंगेन कालो गच्छत्यधीमताम् ।।

मूर्ख व्यक्ति प्रातःकाल का समय जुआ खेलने में, दोपहर का समय स्त्री  प्रसंग में और रात्री का समय चोरी में व्यतीत करते हैं।(Chanakya Niti Sloka ७४)

75.   सर्वोंषधीनाममृता प्रधाना सर्वेषु सौख्येष्वशनं प्रधानम् ।

सर्वेन्द्रियाणां नयनं प्रधानं सर्वेषु गात्रेषु शिर: प्रधानम् ।।

सभी औषधियों में अमृता सबसे प्रमुख है, सुख देने वाले प्रदार्थों में भोजन सबसे प्रमुख है, मनुष्य की इन्द्रियों में आँखें सबसे प्रमुख हैं तथा शरीर के सभी अंगों में अम्नुष्य का सिर अर्थात् बुद्धि सर्वश्रेष्ठ हैं।(Chanakya Niti Sloka ७५)

76.    विद्यार्थि सेवक: पान्थः क्षुधाऽऽर्तों भयकातर:

भाण्डारी प्रतिहारी च सप्त सुप्तान् प्रबोधयेत् ।।

विधार्थी, सेवक, पथिक, भूख से पीड़ित, डरा हुआ व्यक्ति, भंडारी और द्वारपाल यदि अपने काम के दौरान सौ रहे हों तो इन्हें जगा देना चाहिए ।(Chanakya Niti Sloka ७६)

77.     अहिं नृपं च शार्दूलं किटिं च बालकं तथा ।

परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान् न बोधयेत् ।।

सांप, राजा, शेर, सूअर, बालक, दुसरे कुते और मूर्ख व्यक्ति को सोते से जगाना नहीं चाहिए।(Chanakya Niti Sloka ७७)

78.    दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम् ।

शास्त्रपूतं वदेद् वाक्यं मन: पूतं समाचरेत् ।।

अच्छी तरह आँख से देखकर आगे कदम बढ़ाना चाहिए, कपडे से छानकर जल पीना चाहिए, शास्त्रों के अनुसार ही कोई बात कहनी चाहिए और कोई भी कार्य अच्छी तरह सोच-समझकर ही करना चाहिए।(Chanakya Niti Sloka ७८)

79.    सुखार्थी वा त्यजेद्विधां विद्यार्थि वा त्यजेत् सुखम् ।

सुखार्थिन: कुतो विद्या विद्यार्थिन: कुतो सुखम् ।।

यदि सुख की इच्छा हो तो विद्या अध्ययन छोड़ देना चाहिए और यदि विधार्थी विद्या सिखने की इच्छा रखता है तो उसे सुख का त्याग कर देना चाहिए, क्योंकि सुख चाहने वाला विद्या प्राप्त नहीं कर सकता और जो विद्या प्राप्त करना चाहता है, उसे सुख नहीं मिल सकता है।(Chanakya Niti Sloka ७९)

80.    दरिद्रता धीरतया विराजते कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते ।

कदन्नता चोष्णतया विराजते कुरुपता शीलतया विराजते ।।

दरिद्रता के समय धैर्य धारण करना, गंदे वस्त्र को साफ़ रखना अच्छा होता है। इसी प्रकार सामान्य भोजन को भी ताजा और गर्म-गर्म खाया जाए तो अच्छा लगता है। सुशीलता के कारण कुरूपता भी बुरी नहीं लगती ।(Chanakya Niti Sloka ८०)

. वैदिक धर्मी

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