chanakya niti चाणक्य नीतिः भाग-1; हिंदी व्याख्या 1 से 20 श्लोक

chanakya niti  चाणक्य नीतिः  (हिंदी व्याख्या सहित)

1. प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम् ।

  1.           नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम्  ।।

    अर्थ :- मैं त्रिलोक के स्वामी सर्वशक्तिमान सर्वव्यापक भगवान् को सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ । प्रभु को प्रणाम करने के पश्चात् मैं अनेक शास्त्रों से एकत्रित किये गए अमूल्य राजनीतिक ज्ञान का वर्णन करूँगा ।  (chanakya niti श्लोक १)

    1. अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्या अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च ।

    यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात् ।।

    शास्त्र अत्यंत विशाल और अनन्त हैं, विद्याएँ भी बहुत-सी हैं, मनुष्य की आयु बहुत कम है और उसके मार्ग में मुश्किलें भी बहुत हैं, इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को शास्त्रों में से सारभूत तत्व को उसी प्रकार ग्रहण कर लेना चाहिए, जिस प्रकार हंस दूध ग्रहण करके पानी को छोड़ देता है । (chanakya niti श्लोक २)

    1. आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रु-संकटे ।

    राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ।।                                           vedicpress.com

    बीमार होने पर, दुःख के समय, अकाल पड़ने पर, शत्रु की ओर से संकट आने पर, राजदरबार में तथा किसी परिजन की मृत्यु के समय आदि में जो व्यक्ति साथ नहीं छोड़ता, वास्तव में वाही सच्चा मित्र है । (chanakya niti श्लोक ३)

  2.  
    1. मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत् ।

    मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्ये चाऽपि नियोजयेत् ।।

    मन से सोचे हुए कार्य को कभी किसी से नहीं कहना चाहिए, परन्तु मननपूर्वक उसकी रक्षा करनी चाहिए और मौन रहते हुए उस बात को कार्यरूप में बदलना चाहिए । (chanakya niti श्लोक ४)

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    1. परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् ।

    वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम् ।।

    जो मित्र छिपकर आपके कार्य को बिगाड़े और सामने आने पर मीठी-मीठी बातें करे, ऐसे मित्र को उस घड़े के समान त्याग देना चाहिए, जिसके मुंह पर तो दूध लगा हो परन्तु अन्दर विष भरा हुआ हो ।  (chanakya niti श्लोक ५)

    1. शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे ।

    साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने ।।                                     Thanks Bharat On YouTube

    सभी पहाड़ों पर मणियाँ नहीं मिलती, प्रत्येक हाथी के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होते हैं । इसी प्रकार सज्जन पुरुष सब स्थानों पर नहीं मिलते और सभी जंगलों में चन्दन भी उत्पन्न नहीं होते । (chanakya niti श्लोक ७)

     

    1. माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः ।

    न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ।।

    वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दी । क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है, जैसे हंसों के झुण्ड में बगुले की स्थिति होती है ।  (chanakya niti श्लोक ७)

     

    1. दुर्जनस्य च सर्पस्य च वरं सर्पो न दुर्जनः ।

    सर्पो दंशति कालेन दुर्जनस्तु पदे पदे ।।

    दुष्ट व्यक्ति और सांप में से किसी एक को चुनना हो तो सांप को चुनना उचित रहेगा, क्योंकि सांप समय आने पर ही काटेगा, जबकि दुर्जन व्यक्ति हर समय हानि पहुँचाता रहेगा । (chanakya niti श्लोक ८)

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    1. एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम् ।

    आदिमध्याऽवसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम् ।।

    राजा लोग अच्छे खानदान वाले व्यक्तियों को अपने पास इसलिए रखते हैं, क्योंकि वे राजा का साथ उन्नति के समय तथा विपत्ति के समय भी नहीं छोड़ते । चाणक्य के अनुसार उच्च संस्कारों तथा अच्छी शिक्षा वाले व्यक्तियों का यह स्वाभाविक गुण होता है कि वे राजा के हर काम में सहायक होते हैं ।  (chanakya niti श्लोक ९)

     

    1. प्रलय भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः ।

    सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः ।।          (vedicpress.com श्लोक १०)

    प्रलय की स्थिति में समुद्र भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन कर देता है परन्तु सज्जन व्यक्ति प्रलय में भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ते है ।

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    1. रूपयौवनसम्पन्नाः विशालकुलसम्भवाः ।

    विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ।।

    सुन्दर रूप वाला, यौवन से युक्त, ऊँचे कुल में उत्पान होने पर भी विद्या से हीन मनुष्य सुगंधरहित टेसू के फूल के समान रहता है ।

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    1. कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम् ।

    विद्या रूपं कुरुपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् ।।

    कोयल का सौन्दर्य उनके स्वर में है, स्त्रियों का सौन्दर्य उसके पतिव्रत धर्म में है, कुरूप व्यक्ति का सौन्दर्य उसके विद्यावान होने में है और तपस्वियों की शोभा उनके क्षमावान होने में है ।  (chanakya niti श्लोक १२)

     

    1. लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत् ।

    प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ।।

    पांच वर्ष की आयु तक अपने पुत्र से प्यार करना चाहिए, इसके बाद दस वर्ष तक उसको ताड़ना के द्वारा अनुशासित किया जा सकता है, परन्तु सोलह वर्ष की आयु के बाद उससे मित्र के समान व्यवहार करना चाहिए ।  (chanakya niti श्लोक १३)

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    1. अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावणः ।

    अतिदानं बलिर्बद्धो अति सर्वत्र वर्जयेत् ।।

    अत्यंत सुन्दर होने के कारण ही सीता का हरण हुआ, अधिक अहंकार के कारण रावण मारा गया, अत्यधिक दान देने के कारण राजा बलि को कष्ट उठाना पड़ा । इसलिए अति का सर्वत्र त्याग कर देना चाहिए ।  (chanakya niti श्लोक १४)

     

    1. त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम् ।

    कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम् ।।

    दुष्टों की संगति को त्याग दो और सज्जन पुरुषों की संगति करो । दिन-रात धार्मिक आचरण करो और प्रतिदिन परमेश्वर का ध्यान करों ।  (chanakya niti श्लोक १५)

     

    1. कुग्रामवासः कुलहीनसेवा कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या ।

    पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाऽग्निना षट् प्रदहन्ति कायम् ।।

    अनुपयुक्त स्थान में रहना, नीच व्यक्ति की सेवा, अरुचिकर भोजन करना, झगड़ालू स्त्री, मूर्ख पुत्र और विधवा कन्या, ये छः दुःख बिना अग्नि के ही व्यक्ति को जलाते रहते हैं ।  (chanakya niti श्लोक १६)

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    1. अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम् ।

    दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम् ।।

    अभ्यास के बिना शास्त्र अर्थात् विद्या विष बन जाती है, अजीर्ण अर्थात् बिना पचा भोजन विष के समान हानिकारक होता है । निर्धन के लिए स्वजनों के समाज में रहना विष के समान होता है, इसी प्रकार बूढ़े पुरुष के लिए युवा स्त्री विष के समान होती है । www.vedicpress.com

     

    1. एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः ।

    चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पञ्चभिर्बहुभी रणः ।।

    तपस्या एकांत में, अध्ययन दो के साथ और गाने का अभ्यास तीन व्यक्तियों को मिलकर करना चाहिए, इसी प्रकार यात्रा चार लोगों के साथ, खेती आदि कार्य पांच लोगों के साथ और युद्ध बहुत लोगों के सहायता के साथ ही करना चाहिए । (chanakya niti श्लोक १८)

     

    1. अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम् ।

    प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनः ।।

    ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य – इनका देवता यज्ञ है । मुनियों के देवता उनके हृदय में निवास करते हैं । मूर्खों के लिए मूर्ति ही देवता है और जिनकी दृष्टि समान रहती है, वे सब स्थानों पर परमेश्वर को विद्यमान मानते है । (chanakya niti श्लोक १९)

     

    1. कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययाऽऽगमौ ।

    कश्चाऽहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ।।

    बुद्धिमान व्यक्ति को निम्न बातों पर हर समय विचार करते रहना चाहिए कि मेरा समय कैसा (अनुकूल या प्रतिकूल) है ? मेरे मित्र कितने और कैसे है ? मैं जिस स्थान पर रहता हूँ, वह कैसा है ? मेरी आय और व्यय कितनी है ? मैं कौन हूँ ? मेरी शक्ति क्या है यानि मैं क्या करने में समर्थ हूँ ? (chanakya niti श्लोक २०)

    – वैदिक धर्मी (Thanks Bharat On YouTube)

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