नकटों का ढोंग follow the crowd

राजा और धूर्त अपराधी (king and a artful offender)

प्राचीन काल में राजाओं के न्याय में अपराधी को हाथ, पैर, कान, नाक काटने व आँखें निकालने का दंड भी दिया जाता था। इसी प्रथा के अनुसार एक अपराधी को अपराध करने पर राजा ने उन्हें नाक कटवाने का दंड दिया। अपराधी की नाक काट दी गयी। अपराधी बड़ा ही धूर्त था। वह नाक के कटते ही कूद-कूद कर नाचने लगा और बड़ा प्रसन्न होने लगा।  लोगों ने पूछा – “तू इतना प्रसन्न क्यों होता है?” उसने कहा – “नाक की ओट में परमेश्वर(god) था, सो मुझे तो नाक कटने से परमेश्वर दिखने लगा।” यह सुनकर लोगों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि यदि नाक कटवाने से परमेश्वर मिलता है तो हम भी नाक कटवाएँगे। इस विचार से कई व्यक्ति नाक कटवाने के लिए तैयार हुए और धूर्त अपराधी पर विश्वास करके अपनी-अपनी नाकें कटवा ली। नाक काटने पर धूर्त ने तुरंत उनसे कहा – “कि अब तो आप की नाकें कट ही गई।  अब नाक फिर से जुड़ नहीं सकती, इसलिए तुम भी नाचने लगो और कह दो कि हमें भी परमेश्वर दिखने लगा है, नहीं तो दुनिया में तुम्हारी निंदा होगी।” यह सुनकर सभी मनुष्य नाचने लगे और यह कहने लगे कि हमें भी नाक कटवाने से परमेश्वर दिखने लगा है। इसी क्रम से होते-होते नकटों की संख्या बढ़ती गई और नकटों का एक समुदाय बन गया।

यह घटना जब राजा को मालूम हुई तो उसके मन में भी यही विचार आया कि यदि नाक कटवाने से परमेश्वर दीखता है तो नाक कटवाई जावे। ऐसा सोचकर राजा ने नकटों को बुलावाया। राजा को देखकर सभी नकटे ज़ोर-ज़ोर से उछलने कूदने व नाचने लगे और बोले – “महाराज, हमें परमेश्वर दीखता है।” हजारों की संख्या में मनुष्यों को नाचते देख व विश्वास कर महाराज बोले – “यदि ऐसा है तो हम भी नाक कटवाएँगे।” यह सुनकर राजा के दीवानजी को बाद आश्चर्य हुआ। दीवानजी वृद्ध थे, अनुभवी व बुद्धिमान भी थे। दरबार में उनकी काफी प्रसिद्धि थी। दीवान तुरंत राजा के दरबार में उपस्थित हुए और बोले “महाराज, मैंने सुना है की आपने नाक कटवाने का निर्णय लिया है।” महाराज बोले – ‘हाँ’। दीवान ने कहा कि महाराज मुझे इस पर कुछ संदेह हो रहा है।  यदि आपकी आज्ञा हो तो आपसे पहले मैं नाक कटवाकर परीक्षण कर लूँ, यदि मुझे परमेश्वर दिखाई पड़ा तो तत्पश्चात आप भी नाक कटवा लेना।” राजा को दीवानजी पर पूरा विश्वास था अत: उन्हें आज्ञा दे दी।

राजा ने नकटों को बुलाकर एकत्र किया और दीवानजी को बुलाकर उनसे कहा कि “लो, इनकी नाक काटो और परमेश्वर दिखाओ।” उनमें से एक ने बहुत तीक्ष्ण छुरे से दीवानजी की नाक काट दी। दीवान को बड़ा ही कष्ट हुआ। बेचारे दीवान जी हाथ में कटी नाक पकड़कर रह गए। पुन: नकटों ने दीवानजी के कान में अपना वही गुरु मंत्र दोहराया। लेकिन दीवानजी उनके कहने पर न नाचे, न ही यह कहा कि परमेश्वर दिखता है। दीवान जी सीधे राजा के पास पहुंचे और साफ-साफ कह दिया- “ये सब बड़े ही धूर्त हैं, इनहोने हजारों आदमियों की नाकें कटवा डाली। नाक कटने पर परमेश्वर नहीं दिखाई पड़ता, बल्कि नाक के कटने पर इन्होने मेरे कान में ऐसा-ऐसा कहा। उनके इस गुरुमंत्र(guru mantra) का भेद जानकार उन सबको राजा ने पकड़वाकर उचित दण्ड दिया और उस महाधूर्त अपराधी को मृत्युदण्ड मिला।

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शिक्षा :- भारत में ऐसे ही पाखंडी मतों ने प्रचार किया है, जिनकी संख्या बढ़ती जा रही है। हमें इन पाखंडी मतों से बचना चाहिए और अन्धविश्वास(superstition) नहीं करना चाहिए। हमें सच्चे पूर्ण वैज्ञानिक वैदिक धर्म(vedic religion) को अपनाकर समस्त प्राणिमात्र के सुखार्थ कर्म करने चाहिए।

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