Mansahar क्या हिन्दू धर्म में मांसाहार का विधान है ?

मांसाहार Mansahar धर्म व विज्ञान विरुद्ध है ?

मांसाहार Mansahar वैदिक धर्म में सर्वथा निषिद्ध है । मांस न खाने के पक्ष में हम अनेक हेतु रूप प्रमाणों पर आधारित ऐतिहासिक लेख प्रस्तुत कर रहे है जो तर्क सम्मत है ।

Mansahar अहिंसा और क्षात्र धर्म  

वैदिक धर्म अहिंसा को सब से बड़ा धर्म मानते हुए भी क्षात्र-धर्म व राज-धर्म की शिक्षा भी साथ-साथ देता है । क्षत्रिय-धर्म या राज-धर्म में पुलिस और सेनाओं का भी स्थान है, जेलखानों और शस्त्रास्त्रों का भी स्थान है, युद्धों का भी स्थान है । आवश्यकता होने पर किसी व्यक्ति को जेल में भी डाला जा सकता है, गोली से भी उड़ाया जा सकता है और फांसी पर भी लटकाया जा सकता है  तथा आवश्यकता पड़ने पर युद्ध करके रुधिर की नदियें भी बहाई जा सकती है । इस भांति एक प्रकार की हिंसा का भी विधान वैदिक धर्म में है । इन दोनों बातों में भी संगति या एकरूपता है क्योंकि हम अपने सुख-आराम और अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए कभी हिंसा का व्यवहार नहीं करते । जब हमारे साथ अन्याय या अत्याचार हो रहा हो तो हम आवेश में आकर अन्याय करने वाले व्यक्ति को दण्ड भी दे सकते है । इसलिए राजधर्म में उचित दण्ड का भी विधान किया गया है जो न्यायाधिकारी देता है परन्तु यदि जीवन का खतरा हो तो उस समय आत्म-रक्षा के लिए कोई व्यक्ति स्वयं भी यथोचित हिंसा का प्रयोग कर सकता है । www.vedicpress.com

अन्यायी और अत्याचारी दस्यु कोटि के लोगों से आत्म-रक्षा करने के लिए हिंसा के प्रयोग की आज्ञा वेद में है । आत्मरक्षा के लिए व्यक्ति भी हिंसा का अवलम्बन कर सकता है और समाज व राष्ट्र भी । वेद में निहित ऐसी हिंसा, हिंसा नहीं होती क्योंकि वह हिंसा, हिंसा करने की नीयत से नहीं की जाती, वह तो हिंसा को रोकने की नीयत से की जाती है तथा हिंसक को दण्ड देकर भविष्य में उसे हिंसा से रोकने की कोशिश करते है । रूपांतर से वह हिंसा अहिंसा बन जाती है ।  एक शल्य-चिकित्सक रोगी के अंगों को अपने शस्त्रों से काटता है । प्रकट में तो वह उस समय हिंसा कर रहा है- रोगी को पीड़ा दे रहा है परन्तु शल्य चिकित्सक की यह हिंसा रोगी को भविष्य में सुखी बनाने की नीयत से है । उस की वह हिंसा अहिंसा का ही अंग है । www.vedicpress.com

हमारा मुख्य धर्म अहिंसा ही है । कभी-कभी अपवाद रूप में, अहिंसा की स्थापना के लिए, हिंसा का अवलम्बन भी करना पड़ जाता है । वैदिक धर्म अहिंसा और हिंसा का इस प्रकार समन्वय संगति करता है ।

                       मांस-भक्षण के लिए हिंसा सबसे बड़ा पाप

जब वैदिक-धर्म (हिन्दू-धर्म) की दृष्टि में अहिंसा सब से बड़ा धर्म है तो वह हिंसा जो अत्याचारी से अपनी रक्षा करने के लिए न की गयी हो स्वयं ही सबसे बड़ा पाप हो जाती है और मांस का भोजन इसी प्रकार की हिंसा के द्वारा प्राप्त होता है । इसलिए मांस-भक्षण वैदिक धर्म अर्थात मानवता की दृष्टि में सबसे पड़ा पाप है । अत: मांस-भक्षण करने का यह सबसे बड़ा पाप कर्म हमें नहीं करना चाहिए ।

मांसाहारी Mansahar और शाकाहारी जीवों में अन्तर

 

Carnivorous मांसाहारी जीव

  1. रात को जागना और दिन में छिपकर रहना ।
  2. इनकी आंखे गोल होती है ।
  3. अपना भोजन बिना चबाये निगल जाते हैं ।
  4. जीब से चप-चप कर पानी पीते है।
  5. अधिक परिश्रम के समय थकावट शीघ्र होती है और अधिक थक जाते हैं, जैसे शेर, चीता, भेड़िया आदि ।
  6. मांसाहारी एक बार पेट भरकर खा लेते हैं और फिर एक सप्ताह वा इस से भी अधिक समय कु्छ नहीं खाते, सोये पड़े रहते हैं ।
  7. Mansahar मांसाहारी जीवों के चलने से आहट नहीं होती ।
  8. मांसाहार खाने वालों को रात के अंधेरे में दिखायी नहीं देता ।
  9. Mansahar मांसाहारी जीवों की अन्तड़ियों की लम्बाई अपने शरीर की लम्बाई से केवल तीन गुणी होती है ।
  10. चलने फिरने से शीघ्र हांफते हैं ।
  11. Mansahar मांसाहारी प्राणियों के वीर्य में बहुत अधिक दुर्गन्ध आती है ।
  12. Mansahar मांसाहारी प्राणियों के बच्चों की आंखें जन्म के समय बन्द होती हैं जैसे शेर, चीते, कुत्ते, बिल्ली आदि के बच्चों की ।
  13. Mansahar मांसाहारी जीव अधिक भूख लगने पर अपने बच्चों को भी खा जाते हैं (फिर मांसाहारी मनुष्य इस कुप्रवृति से कैसे बच सकता है?) जैसे सर्पिणी, जो बहुत अण्डे देती है, अपने बच्चों को अण्डों से निकलते ही खा जाती है । जो बच्चे अण्डों से निकलते ही भाग दौड़ कर इधर-उधर छिप जाते हैं, उनसे सांपों का वंश चलता है ।
  14. बिल्ली बिलाव से छिपकर बच्चे देती है और इन्हें छिपाकर रखती है । यदि बिलाव को बिल्ली के नर बच्चे मिल जायें तो उन्हें मार डालता है । मादा (स्त्री) बच्चों को छोड़ देता है, कुछ नहीं कहता । इसी प्रकार पक्षियों में तीतरी भी छिपकर अण्डे देती है । यदि नर तीतर अण्डों पर पहुंच जाये तो वह नर बच्चों के अण्डे तोड़ डालता है, मादा अंडों को रहने देता है । बिच्छू के बच्चे माता के ऊपर चढ़ जाते हैं । माता को खा कर बच्चे पल जाते हैं, माता मर जाती है ।
  15. Mansahar मांसाहारीजीवों के घाव देरी से अच्छे होते हैं और ये अन्न वा शाक खाने वाले प्राणियों की अपेक्षा बहुत अधिक संख्या में घाव के कारण मरते हैं ।
  16. पक्वाशय (मेदा) बहुत सरल (सादा) जो बहुत तेज भोजन को बड़ा शीघ्र पचाने के योग्य होता है । जिगर अपने शरीर के अनुपात से बहुत बड़ा और इसमें पित्त बहुत अधिक होता है । मुंह में थूक की थैलियां बहुत छोटी, स्वच्छ जिह्वा, बच्चे को दूध पिलाने के स्तन पेट में । ये आगे की ओर तथा सब ओर देखते हैं
  17. Mansahar मांसाहारीपशु पक्षिओं को नमक की तनिक भी आवश्यकता नहीं होती । इन्हें बिना नमक के कोई कष्ट नहीं होता ।

 

Vegetarian शाकाहारी जीव

  1. रात को विश्राम करना और दिन में जागना ।
  2. इनकी आंखे बादाम के आकार की होती है ।
  3. अपना भोजन चबाकर निगल जाते है ।
  4. होंठो से गट-गट पानी पीते है।
  5. सन्तोष, सहनशीलता और परिश्रम से कार्य करना तथा अधिक थकावट से दूर रहना जैसे घोड़ा, हाथी, उंट, बैल आदि ।
  6. मनुष्य दिन में अनेक बार खाता है । घास और शाक सब्जी खाने वाले प्राणी दिन भर चरते, चुगते और जुगाली करते रहते हैं
  7. अन्न और घास खाने वालों के चलने से आहट होती है ।
  8. अन्न और घास खाने वालों को रात के अंधेरे में दिखायी नहीं देता ।
  9. फलाहारी जीवों की अन्तड़ियों की लम्बाई अपने शरीर की लम्बाई से बारह गुणी तथा घास फूस खाने वाले प्राणियों की अन्तड़ियां उनके शरीर से तीस गुनी तक होती हैं ।
  10. दौड़ने से भी नहीं हांफते ।
  11. अन्न खाने वाले तथा शाकाहारी प्राणियों के वीर्य में साधारणतया अधिक दुर्गन्ध नहीं आती ।
  12. अन्न तथा शाकाहारी प्राणियों के बच्चों की आंखें जन्म के समय खुली रहती हैं जैसे मनुष्य, गाय, भेड़, बकरी आदि के बच्चों की
  13. सब्जी खाने वाले प्राणी चाहे मनुष्य हों अथवा पशु, पक्षी, भूख से तड़फ कर भले ही मर जायें किन्तु अपने बच्चों की ओर कभी भी बुरी दृष्टि से नहीं देखते । सांप के समान मांसाहारीमनुष्य आदि दुर्भिक्ष में ऐसा कर्ते देख गये हैं कि वे भूख में अपने बच्चे को भून कर खा गये ।
  14. शाकाहारी प्राणियों में न माता बच्चों को खाती है, न पिता बच्चों को मारता है । न बच्चे माता-पिता को मार कर खाते हैं ।
  15. निरामिषभोजी शाकाहारी जीवों के घाव बहुत शीघ्र अच्छे हो जाते हैं और मांसाहारियों की अपेक्षा कम मरते हैं ।
  16. पक्वाशय (मेदा) चारा खाने वाला, जिसमें बहुत हल्की खुराक को धीरे धीरे पचाने के गुण हैं । जिगर अपने शरीर की अपेक्षा बहुत छोटा होता है । जिह्वा स्वच्छ, बच्चे को दूध पिलाने के स्तन छाती पर और प्राअणी साधारणतया आगे को देखते हैं और बिना गर्दन मोड़े इधर-उधर नहीं देख सकते ।
  17. शाकाहारी प्राणी और मनुष्य सामान्य रूप से नमक खाये बिना जीवित नहीं रह सकते वा जीवन में कठिनाई अनुभव करते हैं ।

उपरोक्त विवरण के अनुसार मनुष्य में शाकाहारी प्राणियों के ही लक्षण पाए जाते है । वैदिक ग्रंथों तथा ऋषि-मुनियों ने मनुष्य को शाकाहारी ही बताया है । अब तो पाश्चात्य देशों के विचारक और डॉक्टर आदि भी मनुष्य का आहार शाकाहार ही बताते है । मनुष्य को शाकाहारी ही बने रहना चाहिए इसी में सरे संसार की भलाई है ।

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