मुसलमान शासकों का काल रोहतक का जाटवान

मुसलमान शासकों का काल रोहतक का जाटवान  

यह रोहतक के जाटों का एक प्रसिद्ध नेता था । शहाबुद्दीन गौरी ने जिस समय पृथ्वीराज को जीत लिया और दिल्ली में अपने एक सेनापति को , जो कि उसका गुलाम भी था , विजित देश के शासन के लिए छोड़ गया , तो जाट भाइयों ने विद्रोह खड़ा कर दिया , क्योंकि वे पृथ्वीराज के समय में भी एक तरह से स्वतंत्र से थे । अपने देश के वे स्वयं ही शासक थे , पृथ्वीराज को नाममात्र का राजा मानते थे । उन्होने देखा कि कुतुबुद्दीन जहां उनकी स्वतन्त्रता को नष्ट करेगा , वहीं वह विधर्मी भी हैं । अत: इकट्ठे होकर मुसलमानों के सेनापति को हांसी में घेर लिया । वे उसे मार भगाकर अपने स्वतंत्र राज की राजधानी हांसी को बनाना चाहते थे । इस खबर को सुनकर कुतुबुद्दीन घबरा गया और उसने रातों-रात सफर करके अपने सेनापति की हांसी में पहुँचकर सहायता की ।

जाटों की सेना के अध्यक्ष जाटवान ने दोनों दलों को ललकारा ‘ तुमुल मसीर ’ के लेखक ने लिखा है कि दोनों और से घमासान युद्ध हुआ । पृथ्वी खून से रंग गई । बड़े ज़ोर के हमले होते थे । जाट थोड़े थे , फिर भी वे खूब लड़े थे । कुतुबुद्दीन स्वयं चकरा गया, उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था ।

जाटवान ने उसे पास आकर नीचे उतर लड़ने को ललकारा , किन्तु कुतुबुद्दीन इस बात पर राजी नहीं हुआ । जाटवान ने अपने चुने हुए बीस साथियों के साथ शत्रुओं के मोल में घुसकर उन्हें तितर – बितर करने की चेष्टा की । कहा जाता है , जीत मुसलमानों की रही , किन्तु उनकी हानि इतनी हुई कि वह रोहतक के जाटों को दमन करने के लिए जल्दी ही सिर न उठा सके ।आपको यहाँ बता दें कि इस क्षत्रीय आर्य जाति ने राष्ट्र के लिए सदैव बलिदान दिये व राष्ट्र की सदैव बाहरी वैदिक धर्मविरोधियों से रक्षा की है।

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